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आज के लेख में हम महात्मा गांधीजी के साप्ताहिक प्रकाशन – ‘इंडियन ओपिनियन’ तथा ‘यंग इंडिया’ के बारे में पढ़ेंगे। हम समझेंगे कि, विचारों को साझा करने और जनमत को आकार देने के लिए इसका उपयोग कैसे किया जाता था। फिर हम गांधीजी द्वारा पहचाने गए सात सामाजिक गुनाहों एवं उनके द्वारा उजागर किए गए मूल्यों को देखेंगे। फिर, हम गांधीजी के पोते श्री अरुण गांधी द्वारा, इसमें जोड़े गए आठवें सामाजिक गुनाह की जांच करेंगे। अंत में, हम यह पता लगाएंगे कि, तेज़ तकनीकी विकास, सूचना भार और स्वार्थी लाभ के लिए ज्ञान के दुरुपयोग जैसी आधुनिक चुनौतियां, दुनिया में कैसे अशांति पैदा कर रही हैं।
महात्मा गांधीजी द्वारा अपने दक्षिण अफ्रीकी कार्यकाल में शुरू की गई साप्ताहिक पत्रिका - इंडियन ओपिनियन (Indian Opinion) ने, उन्हें सत्य की खोज में लगे एक पत्रकार के रूप में उजागर किया। जब यह पत्रिका उनके नियंत्रण में थी, तब उसकी रचना उनके स्वयं के जीवन के परिवर्तनो का संकेत देती थी। सप्ताह-दर-सप्ताह गांधीजी ने इसके लेखन व संपादन पर मेहनत की, और उसमें सत्याग्रह के सिद्धांतों और अभ्यास की व्याख्या की। वास्तव में यह पत्रिका उनके लिए आत्म-संयम का साधन, जबकि, जनता के लिए उनके विचारों के संपर्क में रहने का माध्यम बन गई। वस्तुतः इंडियन ओपिनियन की भाषा ने, गांधीजी के आलोचकों को अपनी कलम पर अंकुश लगाने के लिए भी बाध्य कर दिया। इंडियन ओपिनियन के बिना शायद ही सत्याग्रह संभव होता। इस लेखन के दौरान, समुदाय पर बनी गांधीजी की पकड़ ने उनके आगे के अभियान को व्यावहारिक, सम्मानजनक और अनूठा बना दिया।

अफ्रीका से लौटने के बाद, गांधी जी ने भारत में अपनी संपादकीय परंपरा को जारी रखा, और ‘नवजीवन’, ‘यंग इंडिया (Young India)’ और ‘हरिजन’ तक इसे विस्तारित किया। इन पत्रिकाओं ने न केवल हमारे देश की स्वतंत्रता के लिए विभिन्न आंदोलनों को बढ़ावा दिया, बल्कि उन्हें समृद्ध और मजबूत भी किया। इन पत्रिकाओं के माध्यम से महात्मा गांधीजी ने न केवल पत्रकारिता के दायरे और शक्ति, बल्कि इसके खतरों का भी पता लगाया।
महात्मा गांधीजी के दर्शन के अनुसार, सात चीजें हमें नष्ट कर सकती हैं। इन सभी का संबंध सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों से है। ये सामाजिक गुनाह निम्नलिखित हैं –
1.काम के बिना धन
यह बिना कुछ काम करके, कुछ पाने या फल की अपेक्षा करने को संदर्भित करता है। उदाहरण के तौर पर, चीज़ों में हेरफेर करके, अपने काम में कामचोरी करना या उसे न्यूनतम करना। वर्तमान में, कुछ ऐसे पेशे हैं, जो बिना काम किए धन कमाने; करों का भुगतान किए बिना अधिक पैसा कमाने; वित्तीय बोझ का उचित हिस्सा उठाए बिना मुफ्त सरकारी कार्यक्रमों से लाभ उठाने; और देश की नागरिकता एवं सदस्यता के सभी लाभों का आनंद लेने के आसपास बने हैं।
2.विवेक के बिना आनंद
लालची, स्वार्थी और कामुक लोग अक्सर केवल अपने लाभ और सुख पर ध्यान देते हैं। कई लोग विवेक और जिम्मेदारी की भावना के बिना ही इन सुखों की चाह रखते हैं, जिससे वे अपने प्रियजनों की उपेक्षा करने लगते हैं। ऐसे समय में उदारता अपनाना, निस्वार्थ भाव से जीना, संवेदनशील और विचारशील बनना हमारी प्रमुख चुनौतियाँ बन जाती हैं।
3.चरित्र के बिना ज्ञान
कम या अधूरा ज्ञान जितना खतरनाक है, उससे भी अधिक खतरनाक एक अच्छे चरित्र के अभाव में बहुत अधिक ज्ञान होना है। हमारे आंतरिक चरित्र विकास के बिना, बौद्धिक विकास अर्थपूर्ण नहीं होता है। फिर भी, शैक्षणिक जगत में हम युवाओं के चरित्र विकास पर ध्यान नहीं हैं।
4.नैतिकता के बिना व्यवसाय
हमारे व्यवसाय प्रणालियों की सफलता के लिए, नैतिक आधार बहुत महत्वपूर्ण है। हम एक-दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, तथा परोपकार, सेवा, व योगदान की क्या भावना रखते हैं, यह काफ़ी मायने रखता है। यदि हम नैतिक आधार की उपेक्षा करते हैं, और आर्थिक प्रणालियों को नैतिक आधार के बिना संचालित करते हैं, तो हम अनैतिक समाज और व्यवसाय का निर्माण करेंगे। आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्थाएँ अंततः नैतिक आधार पर आधारित होती हैं।
5.मानवता के बिना विज्ञान
यदि विज्ञान पूरी तकनीक और प्रौद्योगिकी बन जाए, तो यह मानवता के विरुद्ध बदल जाता है। यदि कोई प्रौद्योगिकी, जिन मानवीय उद्देश्यों को पूरा करने का प्रयास करती है, उनके बारे में हमें कम समझ है, तो हम अपने ही तकनीकी लोकतंत्र के शिकार बनते हैं।
6.त्याग रहित धर्म
अपना समय देने, आर्थिक समर्पण, या अपने स्वाभिमान को त्याग कर के सेवा में, हम धर्म के सामाजिक पहलू और धार्मिक प्रथाओं की पवित्रता की ओर बढ़ते हैं। परंतु आज अपनी क्षमता से अधिक प्रयास करने; या उन सामाजिक समस्याओं को हल करने की बहुत कम कोशिश की जाती है।
7.सिद्धांत विहीन राजनीति
यदि कोई सिद्धांत नहीं है, तो कोई सच्चा मार्गदर्शक भी नहीं बन सकता है। व्यक्तित्व नैतिकता पर संपूर्ण ध्यान, केवल नाम के लिएं एक ऐसी छवि का निर्माण करता है, जो सामाजिक और आर्थिक बाज़ार में दिखावे के लिएं अच्छा लगता है

गांधीजी द्वारा बताई गई इन सात चीज़ों पर मंथन करते हुए, उनके पोते – श्री अरुण गांधी जी एक अन्य सामाजिक गुनाह बताते है। उनका विश्वास है कि कोई लोकतंत्र तभी जीवित रह सकता है, जब हमारे पास अधिकार और जिम्मेदारियां हों। उनके मुताबिक, लोकतंत्र में हम हमेशा अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहते हैं, लेकिन कभी भी अपनी जिम्मेदारियों के लिए नहीं लड़ते। इस कारण, ‘जिम्मेदारियों के बिना अधिकारों की अपेक्षा करने’ को उन्होंने आठवां गुनाह बताया है।
चरित्र के बिना ज्ञान, बौद्धिक क्षमता और नैतिक पूर्णता के बीच मौजूद अंतर का वर्णन करता है। गांधीजी ने तर्क दिया कि, ‘अधिक बुद्धिमत्ता या उन्नत शिक्षा, जब ईमानदारी, सहानुभूति और सत्यनिष्ठा से रहित हो जाती है, तो वह व्यक्ति को "चतुर शैतान" बना देती है।’ इस दृष्टि से ज्ञान एक तटस्थ उपकरण है; और इसका मूल्य इसे पूरी तरह से इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति के चरित्र से निर्धारित होता है।
निरंतर बढ़ते ज्ञान के कारण उत्पन्न हो रही वर्तमान ‘समस्याएं’ कई आधुनिक कारकों से उत्पन्न होती हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं -
1. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) और जीनोमिक्स (Genomics) जैसे क्षेत्रों में हो रही प्रगति, नैतिक सुरक्षा उपाय बनाने की तुलना में तेजी से आगे बढ़ रही है। यह व्यक्तियों या संगठनों द्वारा उन्हें जिम्मेदारी से संभालने के ज्ञान के बिना, शक्तिशाली उपकरणों का उपयोग करने की अनुमति देती है। इससे स्वायत्त हथियार या आनुवंशिक शोषण जैसे जोखिम पैदा होते हैं।
2. हम वर्तमान में काफ़ी अधिक डेटा संसाधित कर रहे हैं। हमारा मस्तिष्क, अक्सर इस प्रवाह को संसाधित करने के लिए संघर्ष करता है, जिससे चिंता बढ़ जाती है। इससे उच्च गुणवत्ता वाले तथ्यों एवं फर्जी खबरों के बीच अंतर करने की क्षमता भी कम हो जाती है।

3. आधुनिक ज्ञान का उपयोग अक्सर कानूनी दायित्वों में कमियां ढूंढने; वित्तीय बाजारों में हेरफेर करने; या अपने लाभ के लिए व्यक्तिगत डेटा का शोषण करने के लिए किया जाता है। इस प्रकार, उचित चरित्र के बिना आई विशेषज्ञता, सामाजिक कल्याण की कीमत पर व्यक्तिगत लाभ के लिए हथियार बन जाती है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/mtcs3852
2. https://tinyurl.com/5n6vc683
3. https://tinyurl.com/4n9txyfs
4. https://tinyurl.com/5n6vc683