अफ्रीका में तबाही मचाने वाले इबोला वायरस से भारत कितना सुरक्षित?

बैक्टीरिया, प्रोटोज़ोआ, क्रोमिस्टा और शैवाल
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अफ्रीका में तबाही मचाने वाले इबोला वायरस  से भारत कितना सुरक्षित?

दुनिया भर में संक्रामक बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले कुछ दशकों में कई ऐसी महामारियां सामने आई हैं जिन्होंने मानव सभ्यता को झकझोर कर रख दिया है। इन्हीं जानलेवा बीमारियों में से एक इबोला वायरस डिसीज है। यह एक गंभीर और अक्सर जानलेवा साबित होने वाली बीमारी है जो मुख्य रूप से उप-सहारा अफ्रीका में पाई जाती है। जब यह वायरस इंसान के शरीर में प्रवेश करता है तो यह रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है जिससे गंभीर रक्तस्रावी बुखार होता है। इस बीमारी की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें मृत्यु दर 25 से 90 प्रतिशत के बीच रहती है और औसतन 50 प्रतिशत संक्रमित मरीजों की मौत हो जाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इस बीमारी से बचाव के लिए इसके लक्षणों, फैलने के कारणों और रोकथाम के उपायों को समझना बेहद जरूरी है।

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इबोला वायरस आखिर क्या है और इसकी शुरुआत कहाँ से हुई? 
इबोला रोग आर्थोइबोलावायरस जीनस (Orthoebolavirus Genus) के वायरसों के कारण होता है। इस बीमारी का पहला मामला साल 1976 में सामने आया था जब दो अलग-अलग जगहों पर एक साथ इसका प्रकोप देखा गया था। पहला मामला वर्तमान दक्षिण सूडान के नज़ारा में और दूसरा कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य के याम्बुकु में सामने आया था। कांगो में यह प्रकोप इबोला नदी के पास स्थित एक गांव में हुआ था और इसी नदी के नाम पर इस जानलेवा वायरस का नाम इबोला रखा गया। वैज्ञानिकों ने अब तक आर्थोइबोलावायरस की छह प्रजातियों की पहचान की है। इनमें से जायरे इबोलावायरस (Zaire Ebolavirus), सूडान इबोलावायरस (Sudan Ebolavirus), ताई फॉरेस्ट इबोलावायरस (Tai Forest Ebolavirus) और बुंदीबुग्यो इबोलावायरस (Bundibugyo Ebolavirus) इंसानों में बीमारी पैदा कर सकते हैं। इसके अलावा रेस्टन वायरस (Reston Virus) और बॉम्बाली वायरस (Bombali Virus) भी पाए गए हैं, लेकिन ये मुख्य रूप से जानवरों को प्रभावित करते हैं। जायरे इबोलावायरस सबसे आम है और इसी के कारण दुनिया में इबोला की सबसे बड़ी महामारियां फैली हैं।

यह बीमारी एक इंसान से दूसरे इंसान में कैसे फैलती है?
यह एक गलत धारणा है कि इबोला हवा से फैलता है। खांसने या छींकने से इबोला का संक्रमण नहीं होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि फ्रूट बैट यानी फल खाने वाले चमगादड़ इस वायरस के प्राकृतिक वाहक होते हैं। जब इंसान जंगल में बीमार या मरे हुए जानवरों जैसे चमगादड़, चिंपैंजी, गोरिल्ला, बंदर या साही के खून या उनके शरीर के तरल पदार्थों के सीधे संपर्क में आते हैं तो यह वायरस इंसानों में प्रवेश कर जाता है। एक बार जब कोई इंसान संक्रमित हो जाता है तो यह बीमारी दूसरे इंसानों में बहुत तेजी से फैल सकती है। यह संक्रमण मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के खून, पसीने, उल्टी, मल, मूत्र, स्तन के दूध, लार और वीर्य के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। इसके अलावा उन वस्तुओं या सतहों को छूने से भी संक्रमण हो सकता है जो किसी बीमार व्यक्ति के तरल पदार्थों से दूषित हो गई हों। यौन संबंध बनाने से भी इबोला का वायरस फैल सकता है क्योंकि ठीक होने के महीनों बाद भी यह वायरस वीर्य में जीवित रह सकता है।

इस बीमारी के शुरुआती और गंभीर लक्षण क्या हैं?
इबोला वायरस के शरीर में प्रवेश करने से लेकर लक्षण दिखने तक का समय 2 से 21 दिनों का हो सकता है। औसतन आठ से दस दिनों के भीतर मरीज बीमार पड़ने लगता है। शुरुआत में इबोला के लक्षण फ्लू जैसे होते हैं जिन्हें ड्राई या सूखे लक्षण कहा जाता है। इनमें अचानक तेज बुखार आना, अत्यधिक थकान, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द, गले में खराश और ठंड लगना शामिल है। कुछ ही दिनों बाद बीमारी दूसरे चरण में पहुंच जाती है और मरीज को उल्टी, पेट दर्द और खूनी दस्त होने लगते हैं। शरीर पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं और आंखें लाल हो जाती हैं। गंभीर मामलों में मरीज के शरीर के अंगों से खून बहना शुरू हो जाता है। मल या उल्टी में खून आ सकता है और मसूड़ों, नाक तथा त्वचा के छिद्रों से भी रक्तस्राव हो सकता है। यह वायरस केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर भी हमला करता है जिससे मरीज भ्रम का शिकार हो जाता है और उसे दौरे भी पड़ सकते हैं। अंततः लिवर और किडनी जैसे अंग काम करना बंद कर देते हैं, जिससे मरीज की मौत हो सकती है।

क्या इस बीमारी का परीक्षण और सटीक इलाज संभव है? 
शुरुआती चरण में इबोला की पहचान करना मुश्किल होता है क्योंकि इसके लक्षण मलेरिया या टाइफाइड जैसी अन्य बीमारियों से मिलते-जुलते हैं। इसकी सटीक पहचान करने के लिए डॉक्टर पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (Polymerase Chain Reaction) परीक्षण करते हैं। रक्त नमूनों का परीक्षण अत्यधिक सुरक्षित प्रयोगशालाओं में किया जाता है क्योंकि इबोला के नमूने बेहद खतरनाक होते हैं। इलाज की बात करें तो वर्तमान में जायरे इबोलावायरस के लिए दो विशेष उपचार मौजूद हैं जिन्हें अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने मंजूरी दी है। इनमें इनमाजेब (Inmazeb) और इबांगा (Ibanga) शामिल हैं जो मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज (monoclonal antibodies) हैं और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को वायरस से लड़ने में मदद करते हैं। इसके अलावा मरीजों को ऑक्सीजन देना, नसों के जरिए तरल पदार्थ चढ़ाना और उनके रक्तचाप को संतुलित रखना उनके बचने की संभावना को काफी बढ़ा देता है।

इबोला वायरस से बचाव के लिए कौन सी वैक्सीन उपलब्ध है?
इबोला से बचाव के लिए अब विश्व स्तर पर वैक्सीन उपलब्ध हैं। जायरे इबोलावायरस (Zaire Ebolavirus) के लिए एर्वेबो वैक्सीन को मंजूरी दी गई है जो केवल एक खुराक में दी जाती है। यह वैक्सीन महामारी के दौरान प्रतिक्रिया स्वरूप इस्तेमाल की जाती है। इसके अलावा एक अन्य वैक्सीन ज़ब्डेनो (Zabdeno) और म्वाबीया (Mwabia) भी मौजूद हैं जो दो खुराकों में दी जाती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन महामारी फैलने पर रिंग वैक्सीनेशन की रणनीति अपनाता है। इसके तहत मरीज के सीधे संपर्क में आने वाले लोगों और उनके करीबियों का टीकाकरण किया जाता है ताकि वायरस के प्रसार को वहीं रोका जा सके। कई मामलों में पूरे गांव या इलाके का भी टीकाकरण किया जाता है, जिसे भौगोलिक टीकाकरण कहते हैं।

अफ्रीका में इबोला महामारी ने कैसा आर्थिक और सामाजिक कहर बरपाया था? 
साल 2013 से 2016 के बीच पश्चिमी अफ्रीका में इबोला का अब तक का सबसे बड़ा प्रकोप देखा गया था। गिनी, लाइबेरिया और सिएरा लियोन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे। इस दौरान दुनिया भर में 28 हजार से ज्यादा मामले सामने आए और 11 हजार से अधिक लोगों की जान चली गई। इस महामारी ने पश्चिमी अफ्रीका के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को पूरी तरह तोड़ दिया था। व्यापार और यातायात पर प्रतिबंध के कारण भारी आर्थिक नुकसान हुआ। सिएरा लियोन में निजी क्षेत्र के 50 प्रतिशत कर्मचारियों का रोजगार छिन गया। महामारी के प्रबंधन पर अरबों डॉलर खर्च हुए। स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई और कई अस्पतालों को बंद करना पड़ा। इबोला का इलाज करते हुए सैकड़ों स्वास्थ्य कर्मियों की भी जान चली गई। लाखों बच्चों की पढ़ाई छूट गई क्योंकि महीनों तक स्कूल बंद रहे। लाइबेरिया और सिएरा लियोन में जंगली जानवरों के मांस पर प्रतिबंध लगने से कई परिवारों के सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया। जिन लोगों ने इस बीमारी को मात दी, उन्हें समाज में कलंक का सामना करना पड़ा। अवसाद, घबराहट और आत्महत्या के प्रयास जैसे मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी देखे गए।

विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य संस्थाओं ने महामारी को कैसे नियंत्रित किया? 
महामारी की शुरुआत में प्रतिक्रिया धीमी थी लेकिन बाद में विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य वैश्विक संस्थाओं ने इसे नियंत्रित करने के लिए युद्ध स्तर पर काम किया। इंसिडेंट मैनेजमेंट सिस्टम की स्थापना की गई जिसके जरिए प्रभावित देशों में मरीजों को अलग-थलग करने, उनका इलाज करने और मृतकों के सुरक्षित अंतिम संस्कार की व्यवस्था की गई। इबोला से मरने वालों का अंतिम संस्कार भी एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि अफ्रीकी संस्कृति में शवों को छूने की परंपरा है। इससे संक्रमण बहुत तेजी से फैला। बाद में सुरक्षित और सम्मानजनक दफन के नियम बनाए गए और समुदायों को जागरूक किया गया। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर कांटेक्ट ट्रेसिंग (contact tracing) की गई। हर उस व्यक्ति को 21 दिनों तक निगरानी में रखा गया जो किसी मरीज के संपर्क में आया था। सीमा नियंत्रण को सख्त किया गया और हवाई अड्डों पर यात्रियों की स्क्रीनिंग शुरू की गई।

कोविड महामारी और इबोला के अनुभवों से दुनिया ने क्या सीखा? 
इबोला महामारी ने दुनिया को यह सिखाया कि किसी भी संक्रामक बीमारी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसके बाद जब कोविड महामारी आई तो अफ्रीकी देशों और दुनिया भर ने इबोला के दौरान सीखी गई रणनीतियों का इस्तेमाल किया। आइसोलेशन सेंटर बनाना, कांटेक्ट ट्रेसिंग करना और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों का उपयोग करना इबोला के ही सबक थे। इन महामारियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि हर देश के पास पर्याप्त टेस्टिंग किट, प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी और एक मजबूत स्वास्थ्य ढांचा होना चाहिए। सूचनाओं के सही आदान-प्रदान और समुदाय की भागीदारी के बिना किसी भी महामारी को हराना असंभव है।

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क्या भारत में इबोला वायरस के फैलने का कोई भारी खतरा है? 
अंतरराष्ट्रीय यात्राओं के कारण भारत में इबोला वायरस के प्रवेश का कुछ जोखिम जरूर हो सकता है लेकिन एक बड़ी महामारी फैलने की संभावना बहुत कम है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इबोला कोविड की तरह हवा से नहीं फैलता है। यह केवल संक्रमित शारीरिक तरल पदार्थों के सीधे संपर्क में आने से ही फैलता है। पिछले वैश्विक स्वास्थ्य संकटों के बाद भारत ने हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग, रोग निगरानी, क्वारंटाइन सिस्टम और अस्पतालों की तैयारियों को काफी मजबूत कर लिया है। यदि कोई संदिग्ध मामला सामने आता है तो भारतीय स्वास्थ्य एजेंसियां उसे तुरंत आइसोलेट करने में सक्षम हैं। हालांकि किसी भी भविष्य के खतरे से बचने के लिए निरंतर जागरूकता, त्वरित प्रतिक्रिया और मजबूत स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली बनाए रखना हमारे देश के लिए अत्यंत आवश्यक है।

संदर्भ

1. https://tinyurl.com/y24gcxvg 

2. https://tinyurl.com/2kbvwzsm 

3. https://tinyurl.com/yua3zmjb 

4. https://tinyurl.com/237tetdk 

5. https://tinyurl.com/27rgabmn 

6. https://tinyurl.com/25paj4wh 

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