शाहजहाँपुर के राम प्रसाद बिस्मिल व् अशफाकउल्ला ख़ान:एकता की मिसाल रख हिलाई ब्रिटिश हुकूमत

औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
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शाहजहाँपुर के राम प्रसाद बिस्मिल व् अशफाकउल्ला ख़ान:एकता की मिसाल रख हिलाई ब्रिटिश हुकूमत

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास कई शूरवीरों के रक्त से लिखा गया है। जब भी देश के स्वतंत्रता संग्राम और सशस्त्र क्रांति का ज़िक्र होता है, तो उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर ज़िले का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है। शाहजहाँपुर ने भारत माता को दो ऐसे महान सपूत दिए, जिन्होंने अपने शौर्य और बलिदान से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। ये दो नाम राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला ख़ान हैं। इन दोनों महान क्रांतिकारियों ने अपनी गहरी मित्रता और देशभक्ति से यह साबित कर दिया कि आज़ादी की लड़ाई में हिंदू-मुस्लिम एकता कितनी मज़बूत थी और देशप्रेम की वेदी पर प्राण न्यौछावर करने का जज़्बा कैसा होता है।

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राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला ख़ान का प्रारंभिक जीवन कैसा था?

बिस्मिल का जन्म 11 जून, 1897 को शाहजहाँपुर ज़िले में हुआ था। उनके पिता का नाम मुरलीधर और माता का नाम मूलमती था। अपनी युवा अवस्था में बिस्मिल ने, वर्ष 1875 में दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित किए गए आर्य समाज में शामिल होने का फैसला किया। उन्होंने एक प्रतिभाशाली लेखक और कवि के रूप में पहचान बनाई। जब उन्होंने भारतीय राष्ट्रवादी और आर्य समाज के प्रचारक भाई परमानंद को दी गई मौत की सज़ा के बारे में पढ़ा, तो उनके भीतर पहली बार देश के लिए कुछ कर गुज़रने की भावना पैदा हुई। सिर्फ 18 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पीड़ा को 'मेरा जन्म' नामक अत्यंत सशक्त कविता के माध्यम से व्यक्त किया। उन्होंने 'राम', 'अज्ञात' और 'बिस्मिल' (जिसका अर्थ घायल या बेचैन होता है) जैसे उपनामों का उपयोग करते हुए हिंदी और उर्दू में कई रचनाएं लिखीं और वे बिस्मिल के नाम से ही देश भर में प्रसिद्ध हुए। 

दूसरी ओर, अशफाकउल्ला ख़ान का जन्म 22 अक्टूबर, 1900 को शाहजहाँपुर में ही हुआ था। उनके पिता का नाम शफीक उल्लाह ख़ान और माता का नाम मजहूर-उन-निसा था। अशफाकउल्ला उस समय बड़े हो रहे थे जब देश में स्वतंत्रता की अलख जग चुकी थी। दोनों ही क्रांतिकारी शाहजहाँपुर की माटी से जुड़े थे और दोनों के भीतर देशप्रेम की गहरी भावना थी, जिसने उन्हें एक साथ ला खड़ा किया।

क्रांतिकारी विचारधारा और सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई?

महात्मा गांधी ने जब देश में असहयोग आंदोलन शुरू किया, तो उन्होंने भारतीयों से आग्रह किया कि वे सरकार को कर न दें और ब्रिटिश हुकूमत के साथ सहयोग न करें। लेकिन आंदोलन शुरू होने के लगभग 1.5 साल बाद, फरवरी 1922 में गोरखपुर में चौरी चौरा की घटना घटी। इस घटना में प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ पुलिस से भिड़ गई और पुलिस स्टेशन में आग लगा दी, जिसमें लगभग 22 पुलिसकर्मी मारे गए। इस हिंसा का कड़ा विरोध करते हुए, महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया।

आंदोलन के अचानक वापस लिए जाने से देश के युवा बहुत निराश हुए और उनका मोहभंग हो गया। अशफाकउल्ला ख़ान और राम प्रसाद बिस्मिल भी इन्हीं युवाओं में से थे। बिस्मिल का कॉन्ग्रेस पार्टी की उदारवादी विचारधारा से मोहभंग हो गया था। वे गांधीवादी अहिंसक तरीकों के विपरीत स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी तरीकों में विश्वास करते थे। उनका मानना था कि हिंसा और रक्तपात के बिना स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की जा सकती है। इसी विचारधारा के साथ, दोनों क्रांतिकारी एक-दूसरे के संपर्क में आए और सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुना। इससे पहले बिस्मिल 'मातृवेदी' नामक एक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना कर चुके थे और वर्ष 1918 के मैनपुरी षड्यंत्र में भी शामिल रहे थे।

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) का गठन क्यों किया गया था?
देश को सशस्त्र क्रांति के माध्यम से स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से, अक्टूबर 1924 में कानपुर में राम प्रसाद बिस्मिल, जोगेश चंद्र चटर्जी और सचिन सान्याल ने मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) की स्थापना की। इसके बाद इसमें अशफाकउल्ला ख़ान भी प्रमुखता से जुड़ गए। मध्य 1920 के दशक में, इसी संगठन को पुनर्गठित करके हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Socialist Republican Association) के रूप में भी जाना गया, जिसमें चंद्रशेखर आज़ाद जैसे युवा समाजवादी विचारकों ने प्रमुख भूमिका निभाई।

इस संगठन का मुख्य उद्देश्य औपनिवेशिक सरकार को उखाड़ फेंकना और उसके स्थान पर फेडरल रिपब्लिक ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया (Federal Republic of United States of India) की स्थापना करना था, जिसका मूल सिद्धांत वयस्क मताधिकार होगा। वर्ष 1925 में, इस संगठन ने द रिवोल्यूशनरी (The Revolutionary) नामक एक घोषणापत्र प्रकाशित किया। इस घोषणापत्र में स्पष्ट किया गया था कि इस गणराज्य के अंतिम संविधान को तब तैयार किया जाएगा जब भारत के प्रतिनिधियों के पास अपने निर्णय लेने की शक्ति होगी। साथ ही, इसका उद्देश्य मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त करना था। रेलवे, परिवहन, खदानों और बड़े उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करने का भी संकल्प लिया गया था।

घोषणापत्र में यह भी स्पष्ट किया गया था कि भारतीय क्रांतिकारी न तो आतंकवादी हैं और न ही अराजकतावादी। वे देश में अराजकता नहीं फैलाना चाहते। उनका उद्देश्य केवल आतंकवाद नहीं है, हालांकि वे प्रभावी प्रतिशोध के रूप में कभी-कभी इस तरीके का सहारा ले सकते हैं।

ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन एक्शन (Kakori Train Action) को अंजाम कैसे दिया गया?
हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की गतिविधियों और सशस्त्र क्रांति के लिए हथियारों की आवश्यकता थी, जिसके लिए भारी धन की ज़रूरत थी। इसके लिए संगठन ने ब्रिटिश खजाने को लूटने की योजना बनाई। 9 अगस्त, 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला ख़ान, शचींद्रनाथ बख्शी, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, चंद्रशेखर आज़ाद, मन्मथनाथ गुप्त और केशव चक्रवर्ती सहित 10 युवा क्रांतिकारियों ने एक साहसिक डकैती को अंजाम दिया। यह घटना लखनऊ के पास काकोरी नामक गाँव में घटी।

उन्होंने नंबर 8 डाउन पैसेंजर ट्रेन (Number 8 Down Passenger Train) को रोका, जो शाहजहाँपुर से लखनऊ जा रही थी। इस ट्रेन में ब्रिटिश हुकूमत का आधिकारिक खज़ाना (रेलवे का पैसा) ले जाया जा रहा था, जिसका उपयोग क्रांतिकारी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को कमज़ोर करने के लिए करना चाहते थे। क्रांतिकारियों ने ट्रेन रोककर वह सारा खज़ाना लूट लिया। इस साहसिक घटना को काकोरी ट्रेन एक्शन (Kakori Train Action) के नाम से जाना जाता है। इस घटना से संगठन को बहुत आवश्यक वित्तीय सहायता मिली, जिससे संगठन का विस्तार हुआ।

इस घटना की 100वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में उत्तर प्रदेश सरकार ने अब काकोरी और मलीहाबाद क्षेत्र के प्रसिद्ध दशहरी आमों का नाम बदलकर इस ऐतिहासिक घटना के सम्मान में काकोरी ब्रांड (Kakori Brand) कर दिया है।

गिरफ्तारी, मुकदमा और अंततः शहादत की कहानी क्या है?
काकोरी ट्रेन एक्शन के एक महीने के भीतर ही संगठन के कई सदस्य गिरफ्तार कर लिए गए। इस मामले में कुल 17 लोगों को जेल भेजा गया और 4 को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई। राम प्रसाद बिस्मिल को सितंबर 1926 में गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन अशफाकउल्ला ख़ान कुछ समय तक फरार रहे। वे कुछ समय तक अपने घर से आधा मील दूर गन्ने के खेत में छिपे रहे। उसके बाद वे बिहार गए और फिर दिल्ली चले गए, जहाँ अंततः उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

काकोरी कांड का यह मुकदमा लगभग 1.5 साल तक चला। अप्रैल 1927 में मुकदमे का फैसला आया, जिसमें राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला ख़ान, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह को मौत की सज़ा सुनाई गई, जबकि अन्य को उम्रकैद की सज़ा दी गई। 19 दिसंबर, 1927 को इन वीर सपूतों को फाँसी दे दी गई। राम प्रसाद बिस्मिल ने गोरखपुर जेल में अपने प्राणों की आहुति दी, जबकि अशफाकउल्ला ख़ान ने फ़ैज़ाबाद में हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चूम लिया। अशफाकउल्ला ख़ान को उनके पैतृक ज़िले शाहजहाँपुर में ही सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।

इन क्रांतिकारियों के बलिदान को आज भी पूरे सम्मान के साथ याद किया जाता है। हाल ही में, उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने गोरखपुर में एक प्राणी उद्यान (चिड़ियाघर) का नाम महान स्वतंत्रता सेनानी अशफाकउल्ला ख़ान के नाम पर रखने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी है। शाहजहाँपुर की भूमि हमेशा इस बात पर गर्व करेगी कि उसने आज़ादी की बलिवेदी पर अपने दो सबसे अनमोल रत्न न्यौछावर किए।

संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2xwgrznn 
2. https://tinyurl.com/28fegk2w 
3. https://tinyurl.com/25p8ule4 

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