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भारतीय संस्कृति में प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश की महिमा केवल भारत की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है। प्राचीन काल से ही व्यापारिक मार्गों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और हिंदू व बौद्ध धर्म के विस्तार के माध्यम से गणपति की आराधना संपूर्ण एशिया और उसके उपरांत प्रवासी भारतीयों के जरिए विश्व के कोने-कोने में फैल गई। तिब्बत, चीन, जापान, दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर यूरोप और अमेरिका तक, भगवान गणेश को ज्ञान, समृद्धि, सौभाग्य और बाधाओं के निवारण के देवता के रूप में पूजा जाता है। यद्यपि विभिन्न देशों में उनकी प्रतिमाओं के स्वरूप, पूजा पद्धतियों और चढ़ावे में स्थानीय संस्कृतियों के अनुसार अद्भुत विविधता दिखाई देती है, किंतु उनके प्रति अटूट श्रद्धा और भक्ति का भाव सर्वत्र एक समान है।

नेपाल में नेवार समुदाय किस अनूठी परंपरा और पकवानों के साथ करता है बप्पा का पूजन?
भारत के पड़ोसी देश नेपाल (Nepal) में गणेश चतुर्थी को स्थानीय भाषा में 'विनायक चतुर्थी' के रूप में बड़े श्रद्धाभाव से मनाया जाता है। विशेष रूप से काठमांडू घाटी का पारंपरिक नेवार समुदाय इस पर्व को अत्यंत निष्ठा के साथ मनाता है। इस दिन परिवार अपने घरों और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन की एक प्रमुख धार्मिक परंपरा यह है कि श्रद्धालु रात के समय चंद्रमा के दर्शन करने से बचते हैं, जिसे व्रत का आवश्यक अंग माना जाता है।

नेपाल में गणेश पूजन के दौरान भगवान को नेवार संस्कृति का सबसे प्रामाणिक पारंपरिक व्यंजन 'समयबजी' (Samaybaji) नैवेद्य के रूप में अर्पित किया जाता है। इस विशेष भोग में उबला हुआ अंडा, तली हुई मछली, भैंस के मांस का चोइला, भटमास (सोयाबीन), चटमरी, बारा (दाल का वड़ा), चिवड़ा (पीटकर चपटा किया गया चावल), साग और नेवारी शराब 'आयला' (Ayla) शामिल होती है। यह अनूठा भोग नेवारी जीवनशैली और उनकी धार्मिक परंपरा का प्रतीक है। पर्व के अवसर पर काठमांडू घाटी के प्रमुख गणेश मंदिरों जैसे अशोक विनायक, चंद्र विनायक, सूर्य विनायक, कमल विनायक, मारु गणेश और कमलादी गणेश मंदिर में गर्भगृह में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं। नेपाली श्रद्धालु जीवन में बुद्धि, समृद्धि और विघ्नों के नाश के लिए इस दिन निर्जला अथवा फलाहार व्रत रखते हैं।
इंडोनेशिया के सक्रिय ज्वालामुखी माउंट ब्रोमो (Mount Bromo) पर 7,000 फीट चढ़कर क्यों होती है गणेश पूजा?
इंडोनेशिया (Indonesia) के पूर्वी जावा (Java) में स्थित तेन्ग्गेर पर्वत (Tengger mountains) श्रृंखला में गणेश भक्ति का एक ऐसा विस्मयकारी दृश्य देखने को मिलता है, जो समूचे विश्व को चकित कर देता है। यहाँ तेन्ग्गेर सेमेरू नेशनल पार्क (Tengger Semeru National Park) में स्थित सक्रिय ज्वालामुखी माउंट ब्रोमो के क्रेटर (ज्वालामुखी के मुहाने) के बिल्कुल किनारे 7,641 फीट की ऊँचाई पर भगवान गणेश की एक प्राचीन पाषाण प्रतिमा स्थापित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह प्रतिमा लगभग 700 वर्ष पूर्व स्थापित की गई थी।
स्थानीय तेन्ग्गेर समुदाय और जावानी हिंदू अत्यंत कठिन चढ़ाई चढ़कर ज्वालामुखी के मुहाने तक पहुँचते हैं और बप्पा के चरणों में फल, फूल और अगरबत्तियाँ अर्पित करते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि धधकते लावे और बार-बार होने वाले विस्फोटों से यह गणेश प्रतिमा ही सदियों से उनकी रक्षा करती आ रही है। इस पर्वत का नामकरण भी भगवान ब्रह्मा के नाम पर हुआ है, जिसे स्थानीय लोग 'ब्रोमो' कहते हैं। यहाँ के लोग स्थानीय देवता 'इदा सांग ह्यांग विधी वासा' के साथ-साथ ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिमूर्ति) की पूजा हिंदू पंचांग के अनुसार करते हैं। प्राचीन काल में जावा में शैव धर्म और तांत्रिक बौद्ध धर्म के मिलन से एक विशिष्ट पंथ बना था, जहाँ गणेश जी को एक शक्तिशाली तांत्रिक देवता के रूप में पूजा जाता था, जिनके मुकुट और सिंहासन पर नरमुंडों के अलंकरण होते थे। इंडोनेशिया की संस्कृति में गणेश जी का स्थान इतना गहरा है कि वर्ष 1998 में इंडोनेशिया सरकार ने 20,000 रूपिया (rupiah) के राष्ट्रीय मुद्रा नोट पर भगवान गणेश का चित्र प्रमुखता से मुद्रित किया था। इसके अतिरिक्त, बाली द्वीप के हिंदू मंदिरों में भी गणेश चतुर्थी अत्यंत उल्लास के साथ मनाई जाती है।
जापान में मोदक की जगह डाइकॉन (daikon) मूली क्यों चढ़ाई जाती है और कांगितेन का क्या रहस्य है?
उगते सूरज की भूमि कहे जाने वाले जापान (Japan) में भगवान गणेश की उपस्थिति लगभग 1000 वर्षों से अधिक पुरानी है। बौद्ध धर्म के माध्यम से जापान पहुँचे गणपति को वहाँ कांगितेन (Kangiten) अथवा विनायकतेन (Bināyaka-ten) कहा जाता है। इसके अतिरिक्त उन्हें गणबाची, गणव्हा, शो-तेन और आर्यदेव के नामों से भी जाना जाता है। जापानी शिगोन और तेंडाई संप्रदाय में गणेश जी की एक अत्यंत दुर्लभ और अनूठी प्रतिमा पूजी जाती है, जिसे 'सोशिन कांगि-तेन' कहा जाता है। इसमें दो हाथी-मुख वाले देवता एक-दूसरे को आलिंगनबद्ध किए हुए दिखाई देते हैं, जिसे संस्कृत में नंदिकेश्वर के समान माना गया है।

जापान की राजधानी टोक्यो (Tokyo) के ऐतिहासिक असाकुसा (Asakusa) क्षेत्र में सुमिदागावा नदी (Sumidagawa river) के तट पर स्थित मात्सुचियामा शोडेन (Matsuchiyama Shoden) मंदिर भगवान गणेश (कांगितेन) का प्रमुख तीर्थ है। यह मंदिर 601 ईस्वी में स्थापित हुआ था, जो वहाँ के प्रसिद्ध सेन्सो-जी (Sensō-ji) मंदिर से भी प्राचीन है। यहाँ का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि जापानी परंपरा में बप्पा को मोदक नहीं, बल्कि सफेद डाइकॉन (daikon) मूली का भोग लगाया जाता है। मंदिर की दीवारों, छतों और लालटेनों पर डाइकॉन मूली के चित्र उकेरे गए हैं। जापानी संस्कृति में डाइकॉन मूली को वैवाहिक सौहार्द, उत्तम जीवनसाथी की प्राप्ति और संतानोत्पत्ति का प्रतीक माना जाता है।
प्रतिवर्ष 7 जनवरी को इस मंदिर में भव्य 'डाइकॉन महोत्सव' आयोजित होता है, जहाँ भक्तों को पकाई गई मूली और चावल की पवित्र मदिरा (ओमिकी) का प्रसाद दिया जाता है। मंदिर में धन की थैलियों के प्रतीक चिह्न भी बने हैं, जो व्यापारिक सफलता के सूचक हैं। इसके साथ ही, लाल बीन के मीठे पेस्ट से बने विशेष पकवान 'कांगि-दान' का भोग लगाया जाता है तथा मनोकामना पूर्ति के लिए तेल-स्नान (योकुयु कीतो) का गुप्त अनुष्ठान किया जाता है। जापान के नारा में माउंट इकोमा (Mount Ikoma) पर स्थित होजान-जी (Hōzan-ji) मंदिर और क्योटो (Kyoto) में 1372 ईस्वी में सम्राट गिकोगोन (Emperor Gikogon) द्वारा स्थापित विशाल कांगितेन प्रतिमा भी अत्यंत प्रसिद्ध है।
थाईलैंड, कंबोडिया और मलेशिया में गणेश आराधना के क्या प्राचीन साक्ष्य मिलते हैं?
दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों में भी गणेश पूजन का गौरवशाली इतिहास रहा है। थाईलैंड (Thailand) में भगवान गणेश को 'फ्रा फिकानेट' के नाम से जाना जाता है। वहाँ उन्हें कला, संगीत, साहित्य और व्यापार का संरक्षक देवता माना जाता है। थाईलैंड में 550 से 600 ईस्वी के बीच की गणेश प्रतिमाएँ पाई गई हैं। गणेश चतुर्थी पर बैंकॉक स्थित वाट फ्रा श्री उमादेवी (Wat Phra Sri Umadevi) जैसे भव्य मंदिरों में विशेष प्रार्थनाएँ और सांस्कृतिक समारोह आयोजित किए जाते हैं।
कंबोडिया (Cambodia) में गणेश जी की पूजा का इतिहास 7वीं शताब्दी और प्राचीन खमेर साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। विश्वप्रसिद्ध अंगकोर वाट (Angkor Wat) मंदिर परिसर में भगवान गणेश की प्राचीन नक्काशीदार मूर्तियाँ आज भी सुरक्षित हैं। कंबोडिया में गणेश जी के कुछ ऐसे प्राचीन स्वरूप भी मिलते हैं, जहाँ उनका मुख हाथी के बजाय मानवीय स्वरूप का दर्शाया गया है।
मलेशिया (Malaysia) में तमिल हिंदू समुदाय गणेश चतुर्थी को अत्यंत भक्तिभाव से मनाता है। राजधानी कुआलालंपुर (Kuala Lumpur) में स्थित प्रसिद्ध श्री सिथि विनयगर मंदिर में कई दिनों तक सामुदायिक प्रार्थनाएँ, शास्त्रीय भजन-कीर्तन और पारंपरिक भोज आयोजित किए जाते हैं। यहाँ गणेश जी को किसी भी नए उद्यम के शुभारंभ के देवता के रूप में विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त है।
पेरिस, लंदन, मॉरीशस और अमेरिका में कैसे गूंजते हैं गणपति बप्पा के जयकारे?
एशियाई देशों के साथ-साथ पश्चिमी और अफ्रीकी देशों में भी गणेश चतुर्थी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाई जाती है:
फ़्रांस (France): पेरिस (Paris) के 18वें एरोन्डिसमेंट (18th arrondissement) के ला चैपल (La Chapelle) क्षेत्र में श्री मणिका विनायकरालयम मंदिर द्वारा प्रतिवर्ष विशाल रथ-यात्रा निकाली जाती है। 30 अगस्त को आयोजित इस शोभायात्रा में श्रद्धालु रस्सियों से सुसज्जित रथ को खींचते हैं और पेरिस की सड़कों पर ढोल-नगाड़ों के साथ भजन गाते हुए मिठाइयाँ वितरित करते हैं।
यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom): लंदन (London) के लक्ष्मी नारायण मंदिर में 5,000 से अधिक श्रद्धालु एकत्र होते हैं। यहाँ भव्य आरती, सांस्कृतिक नृत्य और फैंसी ड्रेस (Fancy Dress) प्रतियोगिताओं के बाद 4,000 से अधिक भक्त एक विशाल जुलूस के साथ प्रसिद्ध थेम्स नदी (River Thames) में बप्पा का विसर्जन करते हैं।
मॉरीशस (Mauritius): इस द्वीपीय देश में लगभग 52 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की है। यहाँ वर्ष 1982 से गणेश चतुर्थी मनाई जा रही है और इस पावन अवसर पर वहाँ की सरकार द्वारा प्रथम दिन आधिकारिक सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाता है। घरों और मंदिरों में मिट्टी की प्रतिमाओं की स्थापना कर पारंपरिक नृत्य किए जाते हैं।

यूएसए (USA) एवं कनाडा (Canada): अमेरिका में भारतीय समुदाय द्वारा मुंबई से विशेष मूर्तियाँ मँगवाकर 11 दिनों तक यह महापर्व मनाया जाता है, जिसमें 10,000 से अधिक लोग भाग लेते हैं। कनाडा के टोरंटो (Toronto) और वैंकूवर (Vancouver) में भी प्रवासी भारतीय अत्यंत भव्यता के साथ गणपति स्थापना और विसर्जन संपन्न करते हैं। इसके अलावा फ़िजी (Fiji), सिंगापुर (Singapore) और बर्मा (Burma) में भी यह पर्व पूर्ण आस्था के साथ मनाया जाता है।
यह वैश्विक विस्तार इस बात का जीवंत प्रमाण है कि देश, काल और संस्कृतियों के भेद से परे, विघ्नहर्ता भगवान गणेश का आशीर्वाद और उनकी आध्यात्मिक प्रासंगिकता संपूर्ण मानवता के लिए सार्वभौमिक है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/222f6why
2. https://tinyurl.com/22lamdrc
3. https://tinyurl.com/2xm5b3cm
4. https://tinyurl.com/y49pnkla
5. https://tinyurl.com/28xqhlx3
6. https://tinyurl.com/2a4257ye