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किसी भी देश की तरक्की इस बात से मापी जाती है कि वहां के सबसे कमज़ोर और वंचित लोगों के साथ कैसा सुलूक होता है। महात्मा गांधी का पूरा जीवन और उनकी सोच इंसानियत और बराबरी की इसी मज़बूत बुनियाद पर टिकी थी। उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर की शांतिपूर्ण समाज-सुधार की परंपरा हमें याद दिलाती है कि भेदभाव और छुआछूत सिर्फ समाज की बुराइयाँ नहीं हैं, बल्कि ये हमारी आत्मा और ज़मीर पर गहरी चोट हैं। बापू का साफ़ मानना था कि जिस समाज की आधी आबादी घरों की चारदीवारी में कैद हो और जहाँ समाज के सबसे निचले तबके को बेदर्दी से नज़रअंदाज़ किया जाता हो, वह समाज कभी आज़ाद और खुशहाल नहीं हो सकता। इस लेख के ज़रिए हम गांधी जी के उन विचारों को समझेंगे, जिन्होंने भारत में सामाजिक भाईचारे, महिला सशक्तिकरण और सर्वोदय की एक नई नींव रखी।

क्या महिला केवल अबला है या फिर नैतिक शक्ति की मिसाल सबला?
भारतीय समाज में सदियों से औरतों को 'अबला' या कमज़ोर माना जाता रहा है। 23 दिसंबर 1936 को अखिल भारतीय महिला सम्मेलन में अपने ऐतिहासिक संदेश में गांधी जी ने इस ग़लतफ़हमी को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर ताक़त का मतलब सिर्फ शारीरिक बल न होकर आत्मबल, पक्के इरादे और सहनशीलता हो, तो औरतें पुरुषों से कहीं ज्यादा बेहतर हैं। जब समाज की नज़र में 'अबला' कहलाने वाली औरत 'सबला' बनेगी, तब बेसहारा कहलाने वाले सभी लोग अपने आप बलवान हो जाएँगे। बापू का यह भरोसा किसी कोरी कल्पना पर नहीं, बल्कि उनके जीवन के अपने अनुभवों पर आधारित था। उनकी माँ पुतलीबाई के कठोर व्रतों, गहरी धार्मिक आस्था और संत जैसे स्वभाव ने गांधी जी के दिल पर गहरी छाप छोड़ी थी। 15वीं सदी के समाज सुधारक नरसिंह मेहता का मशहूर भजन 'वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ पराई जाणे रे' बापू के जीवन का मूल मंत्र बन गया। इंग्लैंड (England) जाने से पहले उन्होंने अपनी माँ के सामने शराब, पराई स्त्री और माँस को न छूने की जो कसम खाई थी, उसने ज़िंदगी भर उनकी रक्षा की। दूसरी तरफ, उनकी पत्नी कस्तूरबा ने गांधी जी के हावी होने वाले पति के व्यवहार के सामने पैसिव रेज़िस्टेंस (passive resistance) यानी उपवास के आत्मबल का सहारा लिया। कस्तूरबा के इसी आत्मसम्मान ने बापू की आँखें खोल दीं और यहीं से उन्हें आज़ादी के आंदोलन में 'सत्याग्रह' की सबसे बड़ी प्रेरणा मिली। बापू ने खुद माना कि कस्तूरबा कभी दबकर नहीं रहीं और उन्होंने ही गांधी जी को उनके जीवन के असली मकसद से रूबरू कराया। एनी बेसेंट (Annie Besant), सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर, कमलादेवी चट्टोपाध्याय और पुष्पाबेन मेहता जैसी प्रमुख महिलाओं ने बापू के इस भरोसे को और पक्का कर दिया कि औरतें ही हमारे देश रूपी बड़े परिवार की असली संरक्षक हैं।
क्या घरेलू कामों का बँटवारा ही सच्ची बराबरी की शुरुआत है?
गांधी जी सिर्फ बड़े राजनीतिक मंचों से भाषण देने वाले नेता नहीं थे, बल्कि वे बातों को वास्तविक जीवन में उतारने वाले इंसान थे। उन्होंने देखा कि समाज में लड़के के पैदा होने पर खुशियाँ मनाई जाती हैं और लड़की के होने पर दुख, जिसे उन्होंने बिल्कुल गलत बताया। उनका मानना था कि दोनों भगवान के दिए हुए बराबर के तोहफे हैं और दोनों को ज़िंदगी जीने का बराबर हक़ है। संपत्ति में बेटी को बेटे के बराबर हिस्सा मिलना चाहिए और पति की कमाई पर पत्नी का भी पूरा हक़ होना चाहिए क्योंकि वह अपनी मेहनत और सेवा से उसे कमाने में मदद करती है। लड़का-लड़की में बराबरी की शुरुआत बापू ने घर की रसोई से की। काकासाहेब कालेलकर के कहने पर जब उन्होंने प्राइमरी स्कूल के बच्चों के लिए 'बालपोथी' तैयार की, तो उसमें माँ और बेटे के बीच की एक बहुत प्यारी बातचीत शामिल की। माँ अपने बेटे से कहती है कि उसे भी अपनी बहन की तरह घर के कामों में हाथ बँटाना चाहिए। जब बेटा कहता है कि वह तो लड़का है, उसे बड़ा होकर पैसे कमाने हैं और बाहर पढ़ना-खेलना है, तो माँ उसे समझाती है कि खाना पकाने, कपड़े धोने और सफ़ाई करने से शरीर और दिमाग दोनों का अच्छा विकास होता है। घर दोनों का है, इसलिए घर के कामों की सीख लड़के और लड़की दोनों को बराबर मिलनी चाहिए। बापू ने साफ शब्दों में कहा कि रसोई में औरतों को गुलाम बनाकर रखना क्रूरता है और पुरुषों को भी इसमें हाथ बँटाकर औरतों का बोझ कम करना चाहिए। 1917 में बिहार के चंपारण जिले के एक गाँव में जब बापू ने देखा कि एक औरत ने बहुत गंदे कपड़े पहने हुए हैं, तो उन्होंने कस्तूरबा को इसकी वजह जानने भेजा। उस औरत ने अपनी झोपड़ी दिखाते हुए कहा कि उसके पास पहनने के लिए बस वही एक साड़ी है, वह उसे धोए कैसे? उसने कहा कि अगर महात्मा जी उसे दूसरी साड़ी दिलवा दें, तो वह रोज़ नहाकर साफ़ कपड़े पहनेगी। इस बात ने बापू को अंदर तक झकझोर दिया और उन्होंने हर गरीब औरत को कपड़े और रोज़गार देने के लिए चरखा और खादी का देशव्यापी आंदोलन शुरू कर दिया।
छुआछूत मिटाने के लिए हरिजन सेवक संघ बनाना क्यों ज़रूरी हुआ?
गांधी जी ने छुआछूत को इंसानियत और भगवान दोनों के खिलाफ एक बड़ा पाप माना। 1932 में जब दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन के बाद ब्रिटिश सरकार ने पिछड़े वर्गों के लिए अलग से चुनाव क्षेत्र देने वाले कम्यूनल अवार्ड (Communal Award) का ऐलान किया, तो बापू ने इसे हिंदू समाज को बाँटने वाली चाल माना। इसके विरोध में उन्होंने यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। 24 सितंबर 1932 को डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ ऐतिहासिक पूना पैक्ट (Poona Pact) होने के बाद ही बापू ने अपना अनशन तोड़ा। इसके तुरंत बाद, 30 सितंबर 1932 को उन्होंने ऑल इंडिया एंटी अनटचेबिलिटी लीग (All India Anti-Untouchability League) की नींव रखी, जिसे बाद में 'हरिजन सेवक संघ' का नाम दिया गया। मशहूर उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला इसके पहले अध्यक्ष और अमृतलाल ठक्कर इसके सचिव बने। दिल्ली के किंग्सवे कैंप (Kingsway Camp) में इसका हेड ऑफिस बनाया गया, जो आज भी गांधी आश्रम के रूप में 20 एकड़ में फैला हुआ है। इस संघ ने पिछड़े और अछूत माने जाने वाले वर्गों के लिए कुओं, स्कूलों, सड़कों और सार्वजनिक जगहों के दरवाज़े खुलवाए। साथ ही, सबने मिलकर खाना खाने और अलग-अलग जातियों में शादी करने को बढ़ावा दिया। तमिलनाडु में ए. वैद्यनाथ अय्यर के नेतृत्व में हरिजन सेवक संघ ने सवर्ण हिंदुओं के भारी विरोध के बावजूद 1939 में पी. कक्कन और अन्य पिछड़े समुदाय के लोगों के साथ मदुरै के मीनाक्षी अम्मन मंदिर में प्रवेश किया, जो एक ऐतिहासिक कदम था। इस आंदोलन से प्रेरणा लेकर त्रावणकोर और तमिलनाडु के 100 से ज्यादा मंदिर सभी लोगों के लिए खोल दिए गए।
सर्वोदय के छह मूल सिद्धांत समाज को कैसे नई दिशा देते हैं?
1908 में जब गांधी जी ने जॉन रस्किन (John Ruskin) की किताब अनटू दिस लास्ट (Unto This Last) का अनुवाद किया, तो उन्होंने सर्वोदय यानी 'सबका भला' का विचार दुनिया के सामने रखा। यह उन विचारों के बिल्कुल उलट था जो सिर्फ 'ज्यादातर लोगों के सुख' की बात करते हैं। सर्वोदय का सीधा सा मतलब है कि समाज की आखिरी कतार में खड़े सबसे गरीब इंसान का भला होना ही देश की असली कामयाबी है।
यह विचार छह अहम बातों पर टिका है:

क्या आज के फेमिनिज़्म (Feminism) और गांधी जी के विचारों में कोई टकराव है?
गांधी जी के औरतों को लेकर विचारों पर आज के समाजशास्त्रियों में काफी चर्चा होती है। केतु कात्रक (Ketu Katrak) जैसे विचारकों का मानना है कि बापू ने पुरुष प्रधान समाज को पूरी तरह चुनौती नहीं दी और औरतों को उनके पारंपरिक दायरों में ही देखा। वहीं दूसरी तरफ, मधु किश्वर का मानना है कि गांधी जी ने औरतों को सिर्फ सुधार की चीज़ नहीं समझा, बल्कि उन्हें अपनी किस्मत खुद लिखने वाला माना। फिलिस मैक (Phyllis Mack) के अनुसार, गांधी जी ने महिलाओं की भावनाओं और उनकी ताक़त को अपने पूरे आंदोलन का केंद्र बनाया। हालाँकि बापू ने माँ बनने को औरत का स्वाभाविक गुण माना और कुछ पुरानी बातों को स्वीकारा भी, लेकिन उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में औरतों को एक बहुत बड़ी भूमिका दी। विदेशी कपड़ों का बहिष्कार हो, नमक सत्याग्रह हो या शराबबंदी, इन सब आंदोलनों में हज़ारों गाँव की और कम पढ़ी-लिखी महिलाएँ भी जेल गईं। आंध्र प्रदेश का शराब के खिलाफ आंदोलन और मणिपुर की 'मीरा पैबी' महिलाओं का मशाल जुलूस इस बात का सबूत हैं कि बापू के अहिंसक सत्याग्रह की ताक़त आज भी आम औरतों के हाथों में शोषण से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार है।
संदर्भ