लखनऊवासियों जानें कैसे अपनी यादों को संभालते हुए फोन की स्टोरेज बचाएं

दृष्टि I - लेंस/फोटोग्राफी
05-01-2026 09:18 AM
लखनऊवासियों जानें कैसे अपनी यादों को संभालते हुए फोन की स्टोरेज बचाएं

लखनऊवासियों हम सब अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के अनगिनत सुंदर पलों को अपने स्मार्टफोन में सहेजते हैं। चाहे पुराने लखनऊ की गलियों की महक हो या गोमती किनारे की शाम की शांति हो या हजरतगंज की रौनक हो या परिवार और दोस्तों के संग बिताए हुए खास पल हों, हर स्मृति तस्वीर या वीडियो के रूप में हमारे फोन में जगह घेरती जाती है। समय के साथ यह तस्वीरें और वीडियो हमारे फोन की स्टोरेज को तेजी से भर देते हैं और फिर फोन धीमा होने लगता है या नई तस्वीरें लेना मुश्किल हो जाता है। आज हम सरल भाषा में समझेंगे कि स्मार्टफोन तस्वीरों और वीडियो को कैसे सेव करता है, संपीड़न कैसे काम करता है और कौन सी सेटिंग्स (settings) बदलकर आप बिना यादें मिटाए अपने फोन में जगह बचा सकते हैं। इसके साथ ही हम फोटोग्राफी के इतिहास की उस यात्रा को भी जानेंगे जिसने आधुनिक कैमरा तकनीक की नींव रखी।
आज हम यह समझेंगे कि स्मार्टफोन में फोटो और वीडियो सेव होने की प्रक्रिया कैसी होती है और क्यों उनकी फाइलें धीरे धीरे बड़े आकार में बदल जाती हैं। इसके बाद हम यह जानेंगे कि हानिपूर्ण और हानिरहित संपीड़न क्या होते हैं और यह आपकी तस्वीरों की गुणवत्ता और आकार को कैसे प्रभावित करते हैं। इसके साथ ही हम यह भी देखेंगे कि लखनऊ के फोन उपयोगकर्ता एंड्रॉइड (Android) और आईओएस (iOS) की कौन सी सेटिंग्स बदलकर आसानी से अपनी स्टोरेज को हल्का कर सकते हैं। अंत में हम फोटोग्राफी के इतिहास में जाकर यह जानेंगे कि कभी कांच की प्लेटों का उपयोग कैसे होता था, पहली फिल्म का आविष्कार कैसे हुआ और बीसवीं सदी में फिल्म तकनीक किस तरह विकसित हुई।

हमारा स्मार्टफोन फोटो और वीडियो कैसे संभालता है
जब भी आप कोई तस्वीर लेते हैं, आपका स्मार्टफोन उसे एक ऐसे प्रारूप में कम्प्रेस (compress) करता है जो फाइल का आकार छोटा कर देता है। आज के कैमरे बहुत उच्च गुणवत्ता की तस्वीरें लेते हैं और बिना कम्प्रेशन के ये फाइलें बहुत बड़ी हो जातीं। इसलिए फोन उन्हें डी सी आई एम नामक फोल्डर में सेव करते समय उनका आकार कम करता है ताकि यादें भी सुरक्षित रहें और जगह भी बची रहे। यही प्रक्रिया तस्वीरों को इंटरनेट पर भेजना भी आसान बनाती है।

संपीड़न हानिपूर्ण और हानिरहित दो अलग तरीके
तस्वीरों को छोटा करने की प्रक्रिया दो प्रकार की होती है और दोनों का अपना उद्देश्य है।
हानिपूर्ण संपीड़न - इसमें तस्वीर से कुछ ऐसा डेटा हटाया जाता है जिसकी कमी आम तौर पर आपको दिखाई नहीं देती। इसका फायदा यह है कि फाइल बहुत छोटी हो जाती है और रोज की तस्वीरों के लिए इसका असर लगभग न के बराबर महसूस होता है।
हानिरहित संपीड़न - इसमें तस्वीर का हर पिक्सेल और हर रंग पूरी तरह सुरक्षित रहता है। जब तस्वीर को खोला जाता है संशोधित किया जाता है और दोबारा सेव किया जाता है तो उसकी असली गुणवत्ता बिल्कुल वैसी ही रहती है। इसकी फाइलें आकार में बड़ी होती हैं लेकिन यह तरीका पेशेवर फोटो एडिटिंग (photo editing) और उन सभी कार्यों के लिए उपयोगी है जहां गुणवत्ता बहुत महत्वपूर्ण होती है।

लखनऊवासियो फोटो और वीडियो को बहुत ज्यादा जगह लेने से कैसे रोकें
आज के फोन बहुत अच्छे कैमरे देते हैं लेकिन बड़ी फाइलें स्टोरेज जल्दी भर देती हैं। कुछ छोटे बदलाव इस समस्या को आसानी से हल कर सकते हैं।
एंड्रॉइड उपयोगकर्ताओं के लिए आसान उपाय
अपने फोन के कैमरा ऐप में सेटिंग खोजें और फोटो का रिजॉल्यूशन (resolution) कम कर दें। इससे तस्वीरें हल्की होंगी लेकिन सामान्य उपयोग में कोई कमी महसूस नहीं होगी। वीडियो मोड (video mode) में जाकर कम रिजॉल्यूशन और कम फ्रेम रेट (frame rate) चुनें इससे वीडियो की फाइलें काफी छोटी हो जाती हैं। अगर आपको तुरंत स्टोरेज खाली करनी है तो गूगल फोटोज ऐप (Google Photos App) में उपलब्ध स्थान खाली करें विकल्प का उपयोग करें। यह उन फाइलों को फोन से हटा देता है जिनका बैकअप (backup) क्लाउड (cloud) में सुरक्षित रूप से बन चुका होता है।
आईफोन उपयोगकर्ता क्या करें
सेटिंग्स में कैमरा और फिर फॉर्मेट्स (formats) पर जाकर हाई एफिशिएंसी (efficiency) चुनें। इससे आपका फोन एचईआईएफ (HEIF) और एचईवीसी (HEVC) फॉर्मेट का उपयोग करता है जो फाइलों को छोटा बनाता है। रिकॉर्ड वीडियो विकल्प में जाकर कम रिजॉल्यूशन चुनें। इससे वीडियो की फाइलें बहुत कम जगह घेरती हैं। फोटो ऐप में जाएं और आईफोन (iPhone) स्टोरेज को ऑप्टिमाइज़ (optimize) करें विकल्प चुनें। इससे फोन में आपकी फोटो की छोटी प्रतियां रखी जाती हैं जबकि फुल रिजॉल्यूशन की प्रतियां आईक्लाउड (iCloud) में सुरक्षित रहती हैं।

फोटोग्राफी की दुनिया का सफर कांच की प्लेटों से आधुनिक फिल्म तक
आज हम डिजिटल तस्वीरें एक क्लिक में ले लेते हैं लेकिन ऐसा हमेशा नहीं था। शुरुआती वर्षों में तस्वीरें कागज तांबे की प्लेटों और यहां तक कि चमड़े पर रसायन लगाकर बनती थीं। उन्नीसवीं सदी में कांच की प्लेटों का उपयोग होने लगा जिन पर सिल्वर हैलाइड क्रिस्टल (Silver Halide Crystal) की परत चढ़ी होती थी।सन अठारह सौ पचासी में जॉर्ज ईस्टमैन ने पहली लचीली रोल फिल्म बनाई और अठारह सौ नवासी में पारदर्शी प्लास्टिक फिल्म आई। बाद में कोडक (Kodak) ने एक सुरक्षित फिल्म तैयार की जिसने फोटोग्राफी के क्षेत्र में बड़े बदलाव की शुरुआत की।रंगीन तस्वीरें बनाने वाली पहली प्लेटें अठारह सौ पचपन में आईं लेकिन बीसवीं सदी के तीसरे दशक में जो रंगीन फिल्में बनीं वे बहुत गहरे रंगों वाली थीं। उन्नीस सौ छत्तीस में कोडक ने कोडाक्रोम (Kodachrome) पेश किया जिसने आधुनिक रंगीन फोटोग्राफी का आधार बनाया।

File:Undeveloped 35 mm film.jpg

फिल्मों का विकास अठारह सौ नवासी से उन्नीस सौ छत्तीस तक
बीसवीं सदी की शुरुआत फिल्म तकनीक के तेजी से बदलते दौर का समय था। वर्ष 1889 में पहली व्यावसायिक रोल फिल्म बाजार में आई, जिसने आगे होने वाले विकास की नींव रखी। इसके बाद 1909 से 1912 के बीच सुरक्षित फिल्मों और 22 मिलीमीटर की नई फिल्मों की शुरुआत हुई, जिससे फिल्म निर्माण में स्थिरता और सुविधा बढ़ी। वर्ष 1916 से 1921 के दौरान ऑर्थोक्रोमैटिक (Orthochromatic) फिल्मों और कई रंगों में उपलब्ध नए विकल्प सामने आए, जिन्होंने छवियों को और अधिक जीवंत बनाया। इसके बाद 1922 और 1923 में पैनक्रोमैटिक (Panchromatic) फिल्मों के साथ साथ 16 मिलीमीटर फिल्मों की लोकप्रियता बढ़ी, जिसने शौकिया और पेशेवर दोनों तरह की फिल्म निर्माण प्रक्रियाओं को आसान किया। वर्ष 1926 से 1929 के बीच डुप्लिकेटिंग (duplicating) फिल्मों और साउंड फिल्मों का विकास हुआ, जिसने फिल्मों में आवाज और प्रतिकृति की संभावनाओं को साकार किया। अंत में 1930 से 1936 के बीच तकनीकलर और कोडाक्रोम जैसी रंगीन फिल्मों की शुरुआत ने फिल्म निर्माण को एक बिल्कुल नई दिशा दी और आधुनिक रंगीन सिनेमा की नींव मजबूत की।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/bd7d9k6j
https://tinyurl.com/2c45t7t5 
https://tinyurl.com/rt8t5zds 
https://tinyurl.com/aeshexhu 
https://tinyurl.com/dnr6735h 

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