क्या 1970 के दशक की उस एक बगावत ने हमेशा के लिए बदल दिया क्रिकेट का इतिहास?

गतिशीलता और व्यायाम/जिम
12-05-2026 09:38 AM
क्या 1970 के दशक की उस एक बगावत ने हमेशा के लिए बदल दिया क्रिकेट का इतिहास?

साल 1977 की बात है, जब क्रिकेट की दुनिया के सबसे बड़े और रूढ़िवादी अधिकारियों के सामने एक व्यक्ति ने खड़े होकर निडरता से कहा था कि "हम सभी के अंदर थोड़ा बहुत लालच होता है, आपकी कीमत क्या है?" जब उन क्रिकेट अधिकारियों ने उसकी बात नहीं मानी, तो उस व्यक्ति ने एक बेहद आक्रामक रास्ता अपनाया और दुनिया के 50 से अधिक बेहतरीन क्रिकेटरों को अपनी ही एक अलग क्रिकेट प्रतियोगिता के लिए गुप्त रूप से साइन कर लिया। यह कोई और नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया के अरबपति मीडिया टाइकून (media tycoon) केरी पैकर (Kerry Packer) थे। पैकर का शुरुआती जीवन चुनौतियों से भरा था। बचपन में पोलियो के कारण वे नौ महीने अस्पताल में रहे, लेकिन इस बीमारी से उबरकर वे अपने स्कूल के हैवीवेट बॉक्सिंग चैंपियन (Heavyweight Boxing Champion) बने। पैकर को पढ़ने-लिखने में दिक्कत होती थी, जिसे अनजानी बीमारी डिस्लेक्सिया (dyslexia) कहा जाता है, और उनके पिता उन्हें परिवार का सबसे बेवकूफ सदस्य मानते थे। लेकिन इसी लड़ाकू स्वभाव ने आगे चलकर उन्हें व्यापार और क्रिकेट की दुनिया में अलग पहचान दिलाई। उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया जिसने सफेद कपड़ों और दिन के उजाले में खेले जाने वाले इस पारंपरिक खेल को रंगीन कपड़ों, दूधिया रोशनी और खिलाड़ियों को मिलने वाले भारी वेतन के एक बिल्कुल नए युग में धकेल दिया।  

केरी पैकर कौन थे और उन्होंने पारंपरिक क्रिकेट से इतनी बड़ी बगावत क्यों की?
केरी पैकर ऑस्ट्रेलिया के एक बेहद ताकतवर मीडिया घराने से ताल्लुक रखते थे। साल 1974 में उनके पिता की मृत्यु के बाद उन्हें विरासत में 100 मिलियन डॉलर का साम्राज्य मिला था, जिसे उन्होंने अपनी कुशाग्र व्यापारिक बुद्धि से अपनी मृत्यु तक 6.5 बिलियन डॉलर के विशाल साम्राज्य में बदल दिया था। 1976 के मध्य में, पैकर अपने टीवी चैनल 'चैनल नाइन' (Channel Nine) के लिए ऑस्ट्रेलिया के घरेलू टेस्ट मैचों के प्रसारण के विशेष अधिकार चाहते थे। उन्होंने इसके लिए तीन साल के 1.5 मिलियन डॉलर की भारी-भरकम पेशकश की, जो कि पिछले प्रसारण अनुबंध से पूरे आठ गुना अधिक थी। लेकिन ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट बोर्ड (Australian Cricket Board) ने उनके इस आकर्षक प्रस्ताव को खारिज कर दिया और सरकारी चैनल को तरजीह दी। पैकर को यह महसूस हुआ कि यह फैसला एक पुराने नेटवर्क की आपसी मिलीभगत का नतीजा है। इस अपमान से पैकर को इतनी नाराज़गी हुई कि उन्होंने खुद की एक क्रिकेट प्रतियोगिता शुरू करने की ठान ली, जिसे 'वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट' (world series cricket) का नाम दिया गया। 1977 की शुरुआत में ही उन्होंने इंग्लैंड के तत्कालीन कप्तान टोनी ग्रेग (Tony Greig) और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान इयान चैपल (Ian Chappell) की मदद से दुनिया भर के दिग्गज खिलाड़ियों को अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाना शुरू कर दिया। इयान चैपल ने बाद में कहा था कि यह उनके जीवन का सबसे कठिन क्रिकेट था क्योंकि इसमें दुनिया के सभी सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी शामिल थे।
दुनिया भर के क्रिकेट प्रशासकों और अदालतों ने इस बड़े बदलाव पर कैसी प्रतिक्रिया दी?
मई 1977 में जब पैकर की इस गुप्त योजना का खुलासा हुआ, तो क्रिकेट जगत में जैसे भूचाल आ गया। क्रिकेट प्रशासकों ने इसे पैकर का सर्कस करार दिया और खिलाड़ियों को भाड़े का टट्टू कहकर अपमानित किया। इंग्लैंड के टोनी ग्रेग से उनकी कप्तानी छीन ली गई। इस विद्रोह को दबाने के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (International Cricket Council) ने लंदन में एक बैठक बुलाई, जिसमें बात न बनने पर पैकर ने स्पष्ट कह दिया कि अब हर कोई अपने लिए लड़ेगा। जुलाई में परिषद ने फैसला सुनाया कि पैकर के मैचों को प्रथम श्रेणी का दर्जा नहीं दिया जाएगा और इसमें हिस्सा लेने वाले खिलाड़ियों पर टेस्ट क्रिकेट खेलने से प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। इसके खिलाफ पैकर ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। अदालत में चले एक लंबे मुकदमे में जस्टिस स्लेड (Justice Slade) ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि पेशेवर क्रिकेटरों को अपनी आजीविका कमाने का पूरा हक है और क्रिकेट बोर्ड उनके रास्ते में सिर्फ इसलिए बाधा नहीं डाल सकता क्योंकि इससे उनके अपने हित प्रभावित होते हैं। इस फैसले से क्रिकेट प्रतिष्ठानों को भारी झटका लगा और उन्हें मुकदमे के खर्च के रूप में लगभग 250,000 पाउंड भी चुकाने पड़े। हालांकि, अलग-अलग देशों का रुख समय के साथ बदलता गया। वेस्टइंडीज़ का क्रिकेट बोर्ड आर्थिक रूप से बहुत कमज़ोर था, इसलिए 1979 के वसंत में उन्होंने पैकर के साथ सीरीज़ के लिए बातचीत शुरू कर दी। पाकिस्तान ने शुरुआत में सख्त रवैया अपनाया, लेकिन बाद में इंग्लैंड के खिलाफ बुरी तरह हारने पर उन्होंने व्यावहारिक सोच अपनाते हुए 1978 में भारत के खिलाफ सीरीज़ के लिए पैकर के खिलाड़ियों को टीम में वापस बुला लिया। न्यूज़ीलैंड के प्रशासक वाल्टर हैडली (Walter Hadley) शुरू से ही समझौता चाहते थे। वहीं, रंगभेद के कारण अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध झेल रहे दक्षिण अफ्रीका के खिलाड़ी भी इस मौके का फायदा उठाकर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के साथ खेलने के लिए उत्सुक थे। उस समय भारत इस विवाद से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा था, लेकिन ऐसी ज़ोरदार अफ़वाहें फैल गई थीं कि भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी (Bishan Singh Bedi) और स्टार बल्लेबाज़ सुनील गावस्कर (Sunil Gavaskar) ने भी पैकर की लीग के विकल्पों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।

दूधिया रोशनी, हेलमेट और ड्रॉप-इन पिचों ने पारंपरिक खेल को कैसे नया रूप दिया?
क्रिकेट को रात के समय फ्लडलाइट्स (floodlights) में खेलने का विचार सबसे पहले 1930 के दशक में सामने आया था, लेकिन माना जाता है कि इंग्लैंड में पहली बार फ्लडलाइट्स में क्रिकेट मैच 11 अगस्त 1952 को मिडिलसेक्स काउंटी क्रिकेट क्लब (Middlesex County Cricket Club) और आर्सेनल फुटबॉल क्लब (Arsenal Football Club) के बीच खेला गया था। लेकिन इसे नियमित रूप से शुरू करने का पूरा श्रेय केरी पैकर को ही जाता है। वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट के शुरुआती मैचों में दर्शकों की संख्या बहुत कम थी। पैकर को पारंपरिक मैदानों पर खेलने की अनुमति नहीं थी, इसलिए उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई नियमों वाले फुटबॉल स्टेडियम (Football Stadium) पट्टे पर लिए। सबसे बड़ी समस्या वहां क्रिकेट की पिच बनाने की थी। पैकर ने जॉन मै (John May) को काम पर रखा, जिन्होंने ग्रीनहाउस (greenhouse) में पिचें उगाईं और क्रेन की मदद से उन्हें स्टेडियम की सतह में स्थापित किया, जिसे आज हम ड्रॉप-इन पिच (drop-in pitch) के नाम से जानते हैं। इस तकनीक के बिना यह लीग पूरी तरह से विफल हो जाती। पैकर ने तेज़ गेंदबाज़ी के आक्रामक पहलू पर बहुत ज़ोर दिया और डेनिस लिली (Dennis Lillee), इमरान खान (Imran Khan) तथा एंडी रॉबर्ट्स (Andy Roberts) जैसे गेंदबाज़ों का भारी प्रचार किया। सिडनी (Sydney) के एक मैच में वेस्टइंडीज़ के एंडी रॉबर्ट्स की एक खतरनाक बाउंसर से ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ डेविड हूक्स (David Hookes) का जबड़ा टूट गया। इस भयानक घटना ने खिलाड़ियों को सुरक्षा के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया और इसी के बाद क्रिकेट में हेलमेट का चलन शुरू हुआ। शुरुआत में डेनिस एमिस (Dennis Amis) ने बल्लेबाज़ी करते समय अपनी सुरक्षा के लिए मोटरसाइकिल का हेलमेट पहना था। पैकर ने दर्शकों को मैदान में लाने के लिए मार्केटिंग (Marketing) पर ज़ोर दिया। नतीजा यह हुआ कि नवंबर 1978 में सिडनी क्रिकेट ग्राउंड में फ्लडलाइट्स के नीचे खेले गए एक डे-नाइट मैच को देखने के लिए 44,374 दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। रात के समय रंगीन कपड़ों में क्रिकेट का यह नया रूप दर्शकों को बहुत पसंद आया। 
 

File:Trent Bridge at Night.JPG


वनडे क्रिकेट का उदय कैसे हुआ और इसे दुनिया की सबसे बड़ी पहचान कैसे मिली?
वनडे यानी वन डे इंटरनेशनल (One Day International) सीमित ओवरों का क्रिकेट है, जो मुख्य रूप से 1970 के दशक में अस्तित्व में आया। क्रिकेट के इतिहास का पहला आधिकारिक वनडे मैच 5 जनवरी 1971 को मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड (Melbourne Cricket Ground) पर ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच खेला गया था। लेकिन इसे आज के आधुनिक, पेशेवर और तेज़-तर्रार रूप में ढालने का काम 1970 के दशक के अंत में पैकर की इसी बगावत ने किया। रंगीन जर्सी (Jersey), रात के समय मैच, सफेद गेंदें, काली साइट स्क्रीन (black site screen), अलग-अलग एंगल वाले कई टीवी कैमरे, पिच के माइक्रोफोन और टीवी स्क्रीन पर ग्राफिक्स—यह सब उसी वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट की देन हैं। 17 जनवरी 1979 को पहली बार पूरी तरह से रंगीन जर्सी में मैच खेला गया, जिसमें ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी सुनहरे पीले (golden yellow) और वेस्टइंडीज़ के खिलाड़ी कोरल पिंक (coral pink) कपड़ों में मैदान पर उतरे थे। धीरे-धीरे वनडे क्रिकेट में सफेद कपड़ों और लाल गेंद का चलन खत्म हो गया और 2001 तक इसे पूरी तरह से बंद कर दिया गया। 1979 आते-आते भारी आर्थिक नुकसान और मुकदमों से थककर ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट बोर्ड ने पैकर के साथ शांति समझौता कर लिया। पैकर के चैनल को न सिर्फ क्रिकेट के विशेष प्रसारण अधिकार मिले बल्कि खेल के प्रचार-प्रसार का दस साल का बड़ा अनुबंध भी हासिल हुआ। आज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद सभी टीमों की वनडे रैंकिंग जारी करती है। इस समय दुनिया में 12 पूर्ण सदस्य देश हैं जिन्हें वनडे क्रिकेट का स्थायी दर्ज़ा प्राप्त है, और क्रिकेट का सबसे बड़ा महाकुंभ यानी विश्व कप भी इसी 50-ओवर के प्रारूप में खेला जाता है। 

File:MCG under lights.jpg

लखनऊ के खेल प्रेमी पहली बार अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट का गवाह कब बने?
वनडे क्रिकेट और डे-नाइट मैचों के इस रोमांचक सफर ने धीरे-धीरे दुनिया भर के देशों और भारत के हर कोने को क्रिकेट के खुमार में पूरी तरह से रंग दिया। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के खेल प्रेमियों के लिए भी वह दिन बेहद खास और ऐतिहासिक था, जब उनके अपने शहर में पहली बार अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट का शानदार आगाज़ हुआ। लखनऊ के मशहूर के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम (K. D. Singh Babu Stadium) में पहला पुरुष वनडे मैच 27 अक्टूबर 1989 को खेला गया था। यह ऐतिहासिक मुकाबला एमआरएफ वर्ल्ड सीरीज़, (जिसे क्रिकेट जगत में नेहरू कप के नाम से भी जाना जाता है!) का एक अहम हिस्सा था। इस बड़े मंच पर पाकिस्तान और श्रीलंका की मजबूत टीमें आमने-सामने थीं। उस दौर में स्टेडियम की सीढ़ियों पर बैठकर दुनिया के दिग्गज खिलाड़ियों को एक दूसरे के खिलाफ कड़ा संघर्ष करते देखना लखनऊ के दर्शकों के लिए एक बिल्कुल नया, अद्भुत और रोमांचक अनुभव था। इसी मैच के साथ लखनऊ शहर ने भी विश्व क्रिकेट के नक़्शे पर एक शानदार मेज़बान के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई, जो आज भी इस शहर की समृद्ध खेल विरासत का एक बेहद अहम हिस्सा है। इस एक मैच ने लखनऊ के युवाओं में खेल के प्रति जो दीवानगी पैदा की, वह आज भी यहाँ के हर गली-मोहल्ले में खेलते बच्चों में साफ़ देखी जा सकती है। 

संदर्भ 
https://tinyurl.com/252t65tc
https://tinyurl.com/26vpbjym
https://tinyurl.com/25aorczj
https://tinyurl.com/2ak7ll6u
https://tinyurl.com/22anss5j 

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