हिंदी-उर्दू भाषा और लखनऊ के इतिहास, तहज़ीब, कारीगरी और कबाब में छिपे ईरान के गहरे राज़

ध्वनि II - भाषाएँ
18-04-2026 09:40 AM
हिंदी-उर्दू भाषा और लखनऊ के इतिहास, तहज़ीब, कारीगरी और कबाब में छिपे ईरान के गहरे राज़

क्या आपको पता है कि भारत और ईरान का रिश्ता आधुनिक राजनीति और देशों की वर्तमान सीमाओं से कहीं ज़्यादा पुराना है। जब 60,000 साल पहले इंसानों ने अफ्रीका से बाहर क़दम रखा था, तब वे फ़ारसी तटों के साथ चलते हुए ही दक्षिण एशिया तक पहुंचे थे। यह रिश्ता सिंधु घाटी सभ्यता के समय से और भी गहरा हो गया था, जो कि शुरुआती एलामाइट और मेसोपोटामिया संस्कृतियों के बिल्कुल समकालीन थी और जिनके साथ प्राचीन ईरान का सीधा संपर्क रहता था। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि डेरियस प्रथम (Darius I) के नेतृत्व में हखामनी साम्राज्य ने 516 ईसा पूर्व में उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों यानी सिंध और पंजाब पर कब्ज़ा कर लिया था और इसे अपने विशाल साम्राज्य का बीसवां प्रांत बना लिया था। यह क्षेत्र न केवल आर्थिक रूप से बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण था, बल्कि इसने यूनान के ख़िलाफ़ ज़ेरेक्सिस के सैन्य अभियानों के लिए सैनिक भी मुहैया कराए थे। भारत पर इसी ईरानी प्रभाव के साथ खरोष्ठी लिपि का भी प्रवेश हुआ, जो मूल रूप से अरामी भाषा से निकली थी और इसे उर्दू की ही तरह दाएं से बाएं लिखा जाता था। यह लिपि तीसरी शताब्दी तक उत्तर-पश्चिमी भारत में मज़बूती से मौजूद रही। यहाँ तक कि सम्राट अशोक के मशहूर शिलालेख और उनके नैतिक नियम भी इसी ईरानी शाही घोषणाओं की शैली से प्रेरित थे। अशोक के स्तंभों पर जो घंटी के आकार के शीर्ष दिखाई देते हैं, वे ईरान के पर्सिपोलिस (Persepolis) में पाए जाने वाले स्तंभों से बेहद मिलते-जुलते हैं। 

File:Persepolis تخت جمشید 26.jpg
पर्सिपोलिस 

आधुनिक आनुवंशिक शोध भी आज इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, ख़ासकर हमारे उत्तरी और मध्य क्षेत्रों में, प्राचीन ईरानी किसानों के साथ अपनी गहरी आनुवंशिक विरासत साझा करता है। आज भी रिज़वी (Rizwi), काज़मी (Kazmi) और नक़वी (Naqvi) जैसे कई प्रमुख भारतीय शिया परिवार अपनी जड़ें सीधे ईरान से ही जोड़ते हैं। ईरान में आज भी अल्पसंख्यक पूरी सुरक्षा के साथ रहते हैं। वहाँ 19वीं सदी में भारतीय व्यापारियों द्वारा बनाए गए दो हिंदू मंदिर और चार प्रमुख गुरुद्वारे आज भी मौजूद हैं जहाँ लोग शांति से पूजा करते हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान भी भारत और ईरान के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध न केवल बनाए रखे गए बल्कि उन्हें संस्थागत रूप भी दिया गया। व्यापार फला-फूला और आध्यात्मिक संबंध बने रहे। आज़ादी के बाद भी भारत और ईरान ने सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे। हालाँकि, हाल के दशकों में सामरिक बदलावों, ख़ासकर इज़राइल और अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती नज़दीकियों ने इस गतिशीलता को बहुत प्रभावित किया है। साल 2005 में एक बड़ा मोड़ तब आया जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र में ईरान के परमाणु कार्यक्रम के ख़िलाफ़ वोट दिया। इसके बावजूद व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान आज भी जारी है। 

इंडो-आर्यन और ईरानी भाषाओं के बीच क्या समानताएं हैं?
भारत की सबसे पुरानी भाषाओं में से एक संस्कृत का सीधा और गहरा संबंध इंडो-ईरानी भाषा परिवार से है। 1500 ईसा पूर्व में शुरू हुए वैदिक काल और उसके बाद के हज़ारों सालों तक भारतीय संस्कृति ने ईरान से बहुत कुछ ग्रहण किया। प्राचीन ईरानी भाषा और वैदिक संस्कृत में इतने सारे शब्द एक जैसे हैं कि भाषाविज्ञानी भी हैरान रह जाते हैं। उदाहरण के लिए, ईरानी धर्मगुरु ज़रथुस्त्र (Zarathustra) ने अहुर मज़्दा का उपदेश दिया था। यह ईरानी शब्द अहुर हमारे वेदों में असुर है। इसी तरह प्राचीन ईरान का अशा हमारे उपनिषदों के ईशा के बिल्कुल समान है। ईरानी भाषा के हवान, यस्न, जरन्य, नामन और सेना जैसे शब्द वैदिक संस्कृत के हवन, यज्ञ, हिरण्य, नामन और सेना ही हैं। दोनों महान परंपराओं की कविता के मीटर भी काफी मिलते-जुलते हैं। प्राचीन ईरानी कविता के मीटर वेदों के त्रिष्टुभ मीटर के बहुत क़रीब हैं। इतना ही नहीं, हमारी रोज़मर्रा की बातचीत में इस्तेमाल होने वाले बहुत से शब्द सीधे फ़ारसी से ही आए हैं। चादर, ज़मीन, दिल, चेहरा, ज़रूरी, दीवाना, ख़ूब, रंग, नारंगी, सफ़ेद, हमेशा, शायद, ख़राब, ख़ाली, गाय, मुर्ग़ी और चर्बी जैसे शब्द पूरी तरह से फ़ारसी के हैं, जिन्हें आज हम आम हिंदी और उर्दू में धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। इतिहास इस बात का भी गवाह है कि 17वीं शताब्दी में जब मराठा साम्राज्य के छत्रपति शिवाजी को दक्कन क्षेत्र में मुग़ल सेना के सेनापति राजस्थानी जय सिंह से कोई बातचीत करनी होती थी, तो वे संचार के लिए फ़ारसी भाषा का ही उपयोग करते थे। जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने सूरत में अपना पहला कार्यालय शुरू किया, तो सर थॉमस रो को स्थानीय भारतीय अधिकारियों के साथ संवाद करने के लिए फ़ारसी अनुवादकों को नौकरी पर रखना पड़ा था। यहाँ तक कि समाज सुधारक राजा राममोहन राय द्वारा लिखी गई सबसे पहली किताब भी फ़ारसी में ही रची गई थी। शाह, नामदार या नरीमन जैसे भारतीय नाम भी असल में फ़ारसी मूल के ही हैं। 

दोनों सभ्यताओं की काव्य और साहित्यिक परंपराएं कैसी रही हैं?
साहित्य और दर्शन के क्षेत्र में भी दोनों ही सभ्यताओं ने पूरी दुनिया को महान और कालजयी रचनाएं दी हैं। अगर हम भारतीय उपमहाद्वीप के संस्कृत साहित्य की बात करें, तो यह आर्यों द्वारा रचित एक अत्यंत विशाल और समृद्ध संग्रह है। आर्य लोग शायद दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के दौरान उत्तर-पश्चिम की दिशा से भारतीय उपमहाद्वीप में आए थे। धीरे-धीरे यह विशाल साहित्य उस ब्राह्मणवादी समाज की अभिव्यक्ति का मुख्य और सबसे ताक़तवर ज़रिया बन गया। 1500 ईसा पूर्व से शुरू हुए गौरवशाली वैदिक काल के बाद, संस्कृत साहित्य का शास्त्रीय काल 500 ईसा पूर्व से लेकर लगभग 1000 ईसवी तक चला। इस साहित्य ने पूरे क्षेत्र में एक मुख्य सांस्कृतिक शक्ति के रूप में ख़ुद को स्थापित किया। दक्षिण में शुरू हुए भक्ति साहित्य ने उत्तर भारत में ज़ोर पकड़ा और इसने वर्ण व्यवस्था पर आधारित सामाजिक पदानुक्रम के विचार को एक गंभीर चुनौती दी।

File:Mawlana ("Rumi") detail, meeting Shams-i Tabrizi. Cāmiʿü’s-siyer of Muhammed Tahir, Topkapı Palace Museum Library, Istanbul, H. 1230, fol. 121a.jpg
मौलाना जलालुद्दीन बल्खी

वहीं दूसरी ओर, फ़ारसी और सूफ़ी काव्य परंपरा में मौलाना जलालुद्दीन बल्खी (Maulana Jalaluddin Balkhi) का नाम सबसे ऊंचे मुक़ाम पर आता है, जिन्हें आज पूरी दुनिया रूमी के नाम से जानती है। उनका जन्म 30 सितंबर 1207 को फ़ारसी साम्राज्य के पूर्वी छोर पर मौजूद बल्ख प्रांत में हुआ था। जब वे युवा ही थे, तब चंगेज़ ख़ान की हमलावर सेना के खौफ़ से बचने के लिए उनके पिता अपने परिवार को लेकर पश्चिम की ओर चले गए और वर्तमान तुर्की में बस गए। 1244 में उनकी मुलाक़ात शम्स तबरीज़ नाम के एक फ़क़ीर से हुई। रूमी ख़ुद यह मानते थे कि उनकी असली कविता शम्स से मिलने के बाद ही निखर कर सामने आई। शम्स के अचानक ग़ायब होने के बाद रूमी ने उनके गहरे वियोग में 40,000 से ज़्यादा शानदार गीत और छंद लिखे। इस महान संग्रह को दीवान-ए-शम्स-ए-तबरीज़ी कहा जाता है। अपने जीवन के आख़िरी 12 सालों में रूमी ने 64,000 पंक्तियों वाली अपनी सबसे महान रचना मसनवी-ए-मानवी (Masnavi-e-manavi) भी अपने मुंशी को बोलकर लिखवाई। इस मसनवी को कुछ सूफ़ी विचारक फ़ारसी भाषा का क़ुरान भी मानते हैं। संगीत के क्षेत्र में अमीर खुसरो ने भारत की कई स्थायी संगीत परंपराओं की नींव रखी, और उन्होंने भी अपना ज़्यादातर काम फ़ारसी में ही किया था। 

लखनऊ और ईरान के बीच इस गहरे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जुड़ाव का एक और बेहद अहम पहलू ईरान के पहले सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी (Ayatollah Ruhollah Khomeini) से भी जुड़ता है। शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि 1979 की इस्लामी क्रांति के प्रणेता खुमैनी की जड़ें असल में उत्तर प्रदेश की इसी ज़मीन से जुड़ी हुई थीं। उनके दादा, सैयद अहमद मूसवी, लखनऊ से महज़ कुछ दूरी पर स्थित बाराबंकी के पास पैदा हुए थे। 1830 के दशक में जब वे भारत से इराक और फिर बाद में ईरान के खुमैन शहर में जाकर बसे, तब भी उन्होंने अपनी भारतीय जड़ों और अपनी जन्मभूमि की पहचान को कभी नहीं भुलाया। इसी पहचान को आजीवन जीवित रखने के लिए उन्होंने अपने नाम के साथ हमेशा "हिंदी" उपनाम जोड़े रखा।

अहमद हिंदी एक प्रखर विद्वान थे और उनके इसी गहरे शिया विश्वास और आध्यात्मिक मूल्यों की विरासत ने अयातुल्ला खुमैनी के वैचारिक दृष्टिकोण को इतनी गहराई से आकार दिया। यह उनके दादा से मिले इन्हीं संस्कारों का प्रभाव था जिसने खुमैनी को एक सुन्नी-बहुल मध्य पूर्व (Middle East) के बीच ईरान के शिया भविष्य को एक नई दिशा देने और उसे एक शक्तिशाली शिया राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की प्रेरणा दी। लखनऊ और बाराबंकी से जुड़ा यह एक इतना सशक्त और प्रसिद्ध ऐतिहासिक तथ्य है जिससे यहाँ के ज़्यादातर लोग भली-भांति परिचित हैं। ज़ाहिर है, इस महत्वपूर्ण कड़ी को शामिल किए बिना भारत और ईरान, ख़ासकर अवध और फ़ारस के रिश्तों की कहानी पूरी तरह अधूरी ही मानी जाएगी।

लखनऊ की नवाबी तहज़ीब और ईरान के बीच क्या गहरा नाता है?
लखनऊ की पूरी संस्कृति, वास्तुकला और मशहूर तहज़ीब पर ईरानी प्रभाव बिल्कुल साफ़ और जीवंत देखा जा सकता है। अवध के इन्हीं नवाबों ने लखनऊ को उत्तर भारत का सबसे परिष्कृत शहर बनाया था। ये शिया मुस्लिम शासक अपने पूर्वजों के तार सीधे ईरान के निशापुर शहर से जोड़ते थे। वे 15वीं शताब्दी के सैय्यद सुल्तानों के समय गंगा के मैदानी इलाक़ों में आकर बसे थे। 1707 में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद पैदा हुई राजनीतिक अराजकता का भरपूर फ़ायदा उठाते हुए ये नवाब मुग़ल साम्राज्य के कमज़ोर होने पर धीरे-धीरे स्वतंत्र शासक बन गए। नवाब आसफ़-उद्दौला और उनके बाद वाजिद अली शाह के शानदार शासनकाल में ईरान से पूरी तरह प्रभावित लखनऊ की यह कलात्मक नवाबी संस्कृति अपने चरम शिखर पर पहुँच गई। शासक और दरबारी बेहतरीन मलमल के लंबे कपड़े और उन पर खूबसूरत ब्रोकेड कोट पहना करते थे। 

आज भी लखनऊ के पुराने मोहल्लों और ऐतिहासिक इमारतों में यह खूबसूरत ईरानी झलक क़ायम है। नवाब आसफ़-उद्दौला द्वारा बनवाया गया विशाल आसफ़ी इमामबाड़ा शिया धार्मिक अनुष्ठानों का एक प्रमुख केंद्र है। मोहर्रम के दौरान पैगंबर के पोते इमाम हुसैन की शहादत की याद में जो ख़ूबसूरत ताज़िया बनाए जाते हैं, वे असल में हुसैन के मक़बरे की ही हूबहू प्रतिकृतियां होते हैं। लखनऊ की विश्व प्रसिद्ध चिकनकारी, ख़ासकर बारीक मलमल के कपड़े पर सफ़ेद धागे से की जाने वाली जादुई कढ़ाई, इसी परिष्कृत ईरानी संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। पुराने शहर की गलियों में आपको आज भी क़ुरान रखने के स्टैंड बनाने वाले, ताज़िया बनाने वाले कारीगर और पीतल का काम करने वाले आसानी से मिल जाएंगे। खान-पान की बात करें तो इदरीस की दुकान पर कोयले की धीमी आंच पर एक बड़े बर्तन में पकने वाली मटन बिरयानी, मुबीन का लज़ीज़ मुर्ग़ और निहारी कुल्चा, और मशहूर गलावटी कबाब जिसमें 160 प्रकार के विशेष मसाले पड़ते हैं, इसी समृद्ध नवाबी और ईरानी पाक कला की विरासत की देन हैं। लखनऊ, उत्तर प्रदेश और ईरान का रिश्ता केवल इतिहास तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह राजनीतिक रूप से भी अक्सर चर्चा के केंद्र में रहता है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ईरान के पहले सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी (Ayatollah Khomeini) और उत्तर प्रदेश के बीच के ऐतिहासिक संबंध को समझाने वाली ख़बरें भी प्रमुखता से छपी हैं। इन ताज़ा ख़बरों के केंद्र में ईरान की वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति और अमेरिका तथा इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए ताज़ा हवाई हमले हैं। इन भयानक हमलों में ईरान के मौजूदा सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई और उनके परिवार के कई सदस्यों के मारे जाने की बात सामने आई है। इस बड़ी घटना के बाद पूरे ईरान में 40 दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। ये तमाम आधुनिक घटनाक्रम और पुरानी ऐतिहासिक कड़ियाँ इस बात को पूरी तरह से साबित करती हैं कि भारत, ख़ासकर उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर और ईरान के बीच के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक संबंध कितने गहरे और अटूट हैं। 

सन्दर्भ 
1. https://tinyurl.com/25bjytc6
2. https://tinyurl.com/23lrv9j5
3. https://tinyurl.com/yblyj7v6
4. https://tinyurl.com/2y3r4hr4
5. https://tinyurl.com/24mnzghf
6. https://tinyurl.com/25kj4ovc 

Definitions of the Post Viewership Metrics

A. City Readerships (FB + App) - This is the total number of city-based unique readers who reached this specific post from the Prarang Hindi FB page and the Prarang App.

B. Website (Google + Direct) - This is the Total viewership of readers who reached this post directly through their browsers and via Google search.

C. Messaging Subscribers - This is the total viewership from City Portal subscribers who opted for hyperlocal daily messaging and received this post.

D. Total Viewership - This is the Sum of all our readers through FB+App, Website (Google+Direct), Email, WhatsApp, and Instagram who reached this Prarang post/page.

E. The Reach (Viewership) - The reach on the post is updated either on the 6th day from the day of posting or on the completion (Day 31 or 32) of one month from the day of posting.