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जौनपुरवासियों, यह विषय भले ही हमारे जिले से सीधे जुड़ा न हो, लेकिन प्रकृति, इतिहास, विज्ञान और सांस्कृतिक विरासत में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति के लिए अत्यंत रोचक और ज्ञानवर्धक है - बाओबाब वृक्ष की अद्भुत कहानी। यह पेड़ अपने विशाल आकार, लंबे जीवन, औषधीय उपयोग और धार्मिक मान्यताओं के कारण दुनिया के सबसे अनोखे वृक्षों में गिना जाता है। अफ्रीका से लेकर मेडागास्कर (Madagascar), ऑस्ट्रेलिया और भारत तक इसकी यात्रा जितनी रहस्यमयी है, उतनी ही वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण भी है।
आज के लेख में हम सबसे पहले हम जानेंगे कि पौधों में आनुवंशिकी यानी प्लांट जेनेटिक्स (plant genetics) और डीएनए कैसे काम करते हैं और बाओबाब के शोध में क्लोरोप्लास्ट डीएनए (chloroplast DNA) क्यों सबसे अहम है। फिर हम बाओबाब के पर्यावरणीय महत्व को समझेंगे - यह पेड़ कैसे शुष्क इलाकों में पानी व जीवन दोनों को संभाले रखता है। इसके बाद हम मेडागास्कर से भारत और दुनिया तक इसके प्रसार का आनुवंशिक रहस्य जानेंगे और यह भी कि यह स्वाभाविक रूप से नहीं बल्कि मानव द्वारा भारत लाया गया। अंत में हम इसके दो ऐतिहासिक भारतीय केंद्र - प्रयागराज के झूंसी और बाराबंकी के किंटूर के सांस्कृतिक-धार्मिक महत्व पर नजर डालेंगे और यह भी देखेंगे कि इसका फल “खोरासानी इमली” भविष्य में किसानों व स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए कितना बड़ा अवसर बन सकता है।
प्लांट जेनेटिक्स — पौधों में जीन, विरासत व आनुवंशिकी का वैज्ञानिक आधार
पौधों में जीन और डीएनए यह निर्धारित करते हैं कि एक पौधा कैसा दिखेगा, कैसे बढ़ेगा, उसके फूल-फल कैसे होंगे और पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रति उसकी सहनशीलता कितनी होगी। ग्रेगर मेंडल (Gregor Mendel) के सिद्धांतों के अनुसार गुण-लक्षण पीढ़ियों के माध्यम से स्थानांतरित होते हैं और यही आनुवंशिकी का मूल आधार है। पौधों की आनुवंशिकी पशुओं से इसलिए भिन्न है क्योंकि ज्यादातर पौधों में स्वयं-परागण की क्षमता, बहु-क्रोमोसोम (multi-chromosome) की उपस्थिति और ऊतकों से नई वृद्धि की अद्भुत क्षमता होती है, जो उन्हें अधिक विविध बनाती है। बाओबाब (Baobab) जैसे पौधों में क्लोरोप्लास्ट डीएनए विशेष रुचि का विषय है, क्योंकि यह पीढ़ियों तक बहुत धीरे बदलता है और इसी कारण यह वैज्ञानिकों को विकासक्रम, भौगोलिक प्रसार और प्रजातिगत विभाजन का स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध कराता है।

बाओबाब वृक्ष की पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय महत्ता — जल संरक्षण से जैव विविधता तक
बाओबाब को “जीवन का वृक्ष” कहना केवल प्रतीकात्मक नहीं है - यह वास्तव में कठोर व शुष्क वातावरण में जीवन को बनाए रखने वाला पारिस्थितिक आधारस्तंभ है। इसके विशाल, रेशेदार तने में हजारों लीटर पानी सुरक्षित रह सकता है, जिससे यह वर्षा रहित मौसम में भी ताज़ा और हरा बना रहता है। इसके खोखले हिस्से पक्षियों, सरीसृपों और छोटे स्तनधारियों के लिए प्राकृतिक आश्रय बन जाते हैं, जबकि फूल और फल चमगादड़ों, बंदरों और कीटों के लिए भोजन का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। जब अन्य वनस्पतियाँ सूख जाती हैं, तब भी बाओबाब अनेक जीवों को संरक्षित रखकर शुष्क पारिस्थितिक तंत्र में संतुलन बनाए रखता है। इसीलिए इसे अफ्रीका और अन्य सूखे क्षेत्रों में प्रकृति के सुरक्षा कवच के रूप में माना जाता है।
मेडागास्कर से दुनिया तक — बाओबाब के विकास और भौगोलिक प्रसार का आनुवंशिक रहस्य
वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार बाओबाब की आठ मूल प्रजातियाँ मेडागास्कर में विकसित हुईं, और क्लोरोप्लास्ट डीएनए के अध्ययनों से पता चलता है कि लगभग 21 मिलियन वर्ष पहले इन प्रजातियों में क्रमिक विभाजन शुरू हुआ। समय के साथ प्राकृतिक कारकों जैसे तेज़ हवाओं, समुद्री जलधाराओं और पशुओं की गतिविधियों ने इसके बीजों को दूर-दूर तक पहुंचाया, लेकिन इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रसार मानव संपर्क द्वारा हुआ। समुद्री यात्रियों, व्यापारियों और आदिम समुदायों ने इसके पोषक फलों व औषधीय गुणों के कारण इसे अन्य क्षेत्रों तक पहुँचाया। आज भी बाओबाब की प्रजातियों में पाए जाने वाले जीन पैटर्न उसके इस लंबी यात्रा के वैज्ञानिक सबूत प्रदान करते हैं।

भारत में बाओबाब का प्रवेश — मानव द्वारा लाए जाने के वैज्ञानिक और ऐतिहासिक प्रमाण
भारत में बाओबाब का आनुवंशिक स्वरूप बेहद सीमित और लगभग एक जैसा पाया गया है, जिससे स्पष्ट है कि यह वृक्ष प्राकृतिक प्रसार से नहीं बल्कि मानव द्वारा लाया गया। जीन तुलनाओं से पता चलता है कि भारतीय बाओबाब अफ्रीकी प्रजातियों से लगभग पूरी तरह मेल खाते हैं, जिससे इसके आगमन में अफ्रीका-भारत व्यापार मार्ग की भूमिका सामने आती है। कई इतिहासकार मानते हैं कि अरब व्यापारी और सूफी संत अपने साथ इसके फल या बीज लेकर आए, क्योंकि यह औषधीय उपयोग, पोषण और धार्मिक महत्व के कारण अत्यंत मूल्यवान माना जाता था। इसके बाद यह मंदिरों, मजारों और व्यापारिक नगरों के पास स्थापित होता गया और धीरे-धीरे भारतीय भूभाग में फैल गया।
झूंसी (प्रयागराज) का ऐतिहासिक बाओबाब — धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और संरक्षण प्रयास
प्रयागराज के संगम क्षेत्र के समीप स्थित झूंसी का बाओबाब उत्तर भारत के सबसे विशाल और प्राचीन वृक्षों में गिना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह एक सूफी संत की आस्था और चमत्कार से जुड़ा है, जिसके कारण श्रद्धालु इसे पवित्र मानते हैं और वर्षों से पूजा-अर्चना करते आए हैं। इसकी ऐतिहासिक और वैज्ञानिक महत्ता को पहचानते हुए भारत सरकार के निर्देश पर बीएसआई (BSI) और वैज्ञानिक संस्थानों ने इसकी आयु व उत्पत्ति पर विस्तृत परीक्षण किया, जिसमें इसे भारत के सबसे प्राचीन बाओबाबों में एक पाया गया। आज शहरीकरण, अनियोजित निर्माण और भूमि अतिक्रमण के कारण इस वृक्ष पर खतरा बढ़ रहा है, इसलिए इसके संरक्षण के लिए स्थानीय प्रशासन और समाज दोनों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
किंटूर (बाराबंकी) का पारिजात वृक्ष — पौराणिक कथाएँ और भारतीय सांस्कृतिक पहचान में इसकी भूमिका
किंटूर (बाराबंकी) का पारिजात वृक्ष न केवल भौगोलिक दृष्टि से अनोखा है, बल्कि भारतीय संस्कृति और पौराणिक कथाओं का प्रतीक भी है। इसे कुंती, अर्जुन और भगवान कृष्ण की कथा से जोड़ा जाता है, और माना जाता है कि यह स्वर्ग से लाया गया दिव्य वृक्ष है। कई लोग इसे "कल्पवृक्ष" यानी मनोकामना पूर्ण करने वाला वृक्ष भी मानते हैं, जिसके कारण हर वर्ष हजारों श्रद्धालु और पर्यटक दर्शन के लिए यहाँ आते हैं। धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान ने इसे उत्तर भारत के सबसे चर्चित व सम्मानित वृक्षों में स्थापित किया है, जिससे इसके संरक्षण की आवश्यकता और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत में बाओबाब के आर्थिक अवसर — फल ‘खोरासानी इमली’ के जीआई टैग (GI Tag) की संभावनाएँ
भारत में बाओबाब के व्यावसायिक अवसर अभी प्रारंभिक अवस्था में हैं, लेकिन संभावनाएँ अत्यंत व्यापक हैं। इसके फल, जिसे मध्य प्रदेश के मांडू क्षेत्र में “खोरासानी इमली” कहा जाता है, में कैल्शियम (calcium), पोटेशियम (potassium), आयरन (iron), फाइबर (fiber), एंटीऑक्सिडेंट (antioxidant) और विटामिन सी अत्यधिक मात्रा में पाए जाते हैं, जिसके कारण यह दवा, पोषण, हर्बल ड्रिंक्स (herbal drinks) और स्वास्थ्य उत्पाद उद्योगों के लिए अत्यधिक मूल्यवान है। यदि इस फल को जीआई टैग प्राप्त होता है, तो न केवल इसकी आर्थिक पहचान मजबूत होगी, बल्कि किसानों और स्थानीय समुदायों को बड़ा बाज़ार लाभ मिल सकता है। साथ ही बाओबाब के वृक्षों के संरक्षण, रोपण और सतत उपयोग को भी बढ़ावा मिलेगा, जिससे प्रकृति और अर्थव्यवस्था दोनों साथ-साथ आगे बढ़ेंगे।
संदर्भ
https://tinyurl.com/4uzac757
https://tinyurl.com/4tbzffc6
https://tinyurl.com/mrysxbh7
https://tinyurl.com/4syf94y2
https://tinyurl.com/5n6nktt8
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