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जौनपुरवासियों, खेती केवल हमारी आजीविका का साधन नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र की पहचान और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी है। धान की उपज के लिए पहचाने जाने वाले जौनपुर की दोमट मिट्टी ने वर्षों तक किसानों का साथ दिया है, लेकिन रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की सेहत और पर्यावरण - दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे समय में जैविक उर्वरक एक ऐसे विकल्प के रूप में सामने आते हैं, जो न केवल फसलों को पोषण देते हैं, बल्कि मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता को भी बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं।
इस लेख में हम सबसे पहले यह समझेंगे कि जैविक उर्वरक क्या होते हैं और वे रासायनिक उर्वरकों से किस प्रकार भिन्न हैं। इसके बाद, हम जैविक उर्वरकों के प्रमुख स्रोतों और उनके निर्माण की विधियों पर चर्चा करेंगे। आगे बढ़ते हुए, मिट्टी की उर्वरता, जैव विविधता और फसल उत्पादकता पर इनके प्रभाव को जानेंगे। फिर, चावल उत्पादन से जुड़े बांग्लादेश के एक अध्ययन के माध्यम से जैविक उर्वरकों की उपयोगिता को समझेंगे। इसके साथ ही, अजोला पिन्नाटा (Azolla pinnata) जैसे आदर्श जैविक उर्वरक और जौनपुर की दोमट मिट्टी में इसके परिणामों पर भी चर्चा होगी। अंत में, जैविक उर्वरकों को बढ़ावा देने में सरकार और निजी क्षेत्र की भूमिका पर विचार किया जाएगा।
जैविक उर्वरक क्या हैं और ये रासायनिक उर्वरकों से कैसे भिन्न हैं?
जैविक उर्वरक प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त ऐसे उर्वरक होते हैं, जो पौधों की वृद्धि और विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्वों को धीरे-धीरे मिट्टी में उपलब्ध कराते हैं। ये उर्वरक पशु अपशिष्ट, पौधों के अवशेष, खनिज पदार्थ और राख जैसे प्राकृतिक स्रोतों से बनाए जाते हैं। रासायनिक उर्वरकों के विपरीत, जैविक उर्वरक तुरंत असर दिखाने के बजाय लंबी अवधि में मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखते हैं। इनका सबसे बड़ा लाभ यह है कि ये मिट्टी की संरचना को नुकसान नहीं पहुँचाते और पोषक तत्वों को संतुलित रूप से छोड़ते हैं, जिससे अति-निषेचन का खतरा कम हो जाता है। यही कारण है कि जैविक उर्वरक खेती को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बनाने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।

जैविक उर्वरकों के प्रमुख स्रोत और निर्माण की विधियाँ
जैविक उर्वरकों के प्रमुख स्रोतों में खाद, घोल, गुआनो, मुर्गी पालन लिटर (Poultry Litter), घोड़े की खाद, मछली और चमगादड़ से प्राप्त खाद शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, जानवरों की हड्डियों और रक्त का उपयोग भी उर्वरक निर्माण में किया जा सकता है। हालांकि, इन सभी स्रोतों का सीधे उपयोग करने से पहले उन्हें सही तरीके से तैयार करना आवश्यक होता है। विशेष रूप से कंपोस्टिंग (composting) की प्रक्रिया इसलिए ज़रूरी होती है, ताकि ताज़ी खाद में मौजूद अधिक अमोनिया (ammonia) और हानिकारक जीवाणुओं का प्रभाव कम किया जा सके। सही ढंग से तैयार की गई जैविक खाद मिट्टी को नाइट्रोजन (nitrogen), फास्फोरस (phosphorous), पोटेशियम (potassium), कैल्शियम (calcium) और मैग्नीशियम (magnesium) जैसे आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करती है, जिससे फसलों का विकास संतुलित रूप से हो पाता है।
मिट्टी की उर्वरता, जैव विविधता और फसल उत्पादकता पर प्रभाव
जैविक उर्वरक मिट्टी में पोषक तत्वों की धीमी लेकिन निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं, जिससे पौधों को लंबे समय तक पोषण मिलता रहता है। यह विशेषता फसलों के लिए लाभकारी होती है, क्योंकि इससे अति-निषेचन की समस्या नहीं होती और पौधों की जड़ें अधिक स्वस्थ बनती हैं। जैविक उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी के भीतर रहने वाले जीवों की संख्या और सक्रियता बढ़ती है, जिनमें फंगल माइकोराइजा (Fungal mycorrhizae) जैसे सूक्ष्म जीव भी शामिल हैं, जो पौधों को पोषक तत्वों के अवशोषण में सहायता करते हैं। इसके साथ-साथ, जैविक उर्वरक मिट्टी में कार्बन (carbon) के भंडारण को बढ़ाकर उसकी जैव विविधता और दीर्घकालिक उत्पादकता को बेहतर बनाते हैं।

चावल उत्पादन में जैविक उर्वरकों की भूमिका: बांग्लादेश का अध्ययन
बांग्लादेश में किए गए एक अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि जैविक उर्वरकों का उपयोग चावल उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार ला सकता है। अध्ययन के अनुसार, जैविक खाद का प्रयोग करने से चावल की उपज में 16.67% की वृद्धि दर्ज की गई। इसके साथ ही, जैविक उर्वरक उपयोग करने वाले किसान गैर-जैविक उर्वरक उपयोगकर्ताओं की तुलना में अधिक कुशल पाए गए और उन्हें श्रम, अन्य कृषि आदानों और पूंजी की कम आवश्यकता पड़ी। यह अध्ययन दर्शाता है कि जैविक खाद न केवल उत्पादन बढ़ाने में सहायक है, बल्कि खेती को अधिक लागत-प्रभावी और टिकाऊ बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
अजोला पिन्नाटा: चावल की खेती के लिए एक आदर्श जैविक उर्वरक
अजोला पिन्नाटा एक छोटा, तैरता हुआ जल पौधा है, जो साइनोबैक्टीरिया (Cyanobacteria) के साथ सहजीवी संबंध के कारण मिट्टी में नाइट्रोजन संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। इसके लंबे, शाखाओं वाले तनों और महीन जड़ों के कारण यह चावल के खेतों में आसानी से फैल सकता है। सदियों से अजोला का उपयोग चावल की खेती में जैविक उर्वरक के रूप में किया जाता रहा है। हालांकि, इसकी तेज़ी से फैलने की क्षमता के कारण इसे कभी-कभी खरपतवार भी माना जाता है, इसलिए इसका उपयोग संतुलित और नियंत्रित ढंग से करना आवश्यक होता है, ताकि इसके लाभों का पूरा उपयोग किया जा सके।

जौनपुर की दोमट मिट्टी में जैविक उर्वरकों की उपयोगिता और परिणाम
जौनपुर की दोमट मिट्टी में अजोला पिन्नाटा से बने जैविक उर्वरकों के प्रयोग से सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। इनके उपयोग से धान के पौधों में शुष्क पदार्थ के उत्पादन में वृद्धि हुई है, साथ ही पौधों द्वारा पोषक तत्वों की खपत भी बेहतर हुई है। इसके परिणामस्वरूप अनाज की उपज में सुधार देखा गया है। इसके अतिरिक्त, पुआल की उपज में हुई वृद्धि पशुपालन से जुड़े किसानों के लिए अतिरिक्त लाभ प्रदान करती है, जिससे जैविक उर्वरक जौनपुर की कृषि के लिए एक उपयोगी विकल्प के रूप में उभरते हैं।
जैविक उर्वरकों को बढ़ावा देने में सरकार और निजी क्षेत्र की भूमिका
जैविक उर्वरकों को किसानों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने के लिए उनके व्यवसायीकरण की दिशा में ठोस प्रयास किए जाने आवश्यक हैं। सरकार और निजी क्षेत्र को मिलकर उत्पादन बढ़ाने, आपूर्ति व्यवस्था को सुदृढ़ करने और किसानों को जैविक खाद के लाभों के प्रति जागरूक करने की दिशा में काम करना चाहिए। रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और खेती को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए यह सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे प्रयासों से जौनपुर जैसे कृषि-प्रधान क्षेत्रों में न केवल मिट्टी की सेहत सुधरेगी, बल्कि किसानों का भविष्य भी अधिक सुरक्षित हो सकेगा।
संदर्भ
https://bit.ly/3VjOYFx
https://bit.ly/3VjP0gD
https://bit.ly/3juH1Ag
https://tinyurl.com/23jaed37
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