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प्रकृति ने जौनपुर शहर को गोमती नदी के रूप में एक अमूल्य और जीवनदायिनी धरोहर प्रदान की है। लेकिन उचित देखरेख के अभाव और मानवीय लापरवाही के कारण यह अनमोल नदी आज गंभीर प्रदूषण की चपेट में आ चुकी है। स्थिति यह है कि गोमती का पानी अब न चाहते हुए भी मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बनता जा रहा है। जौनपुर ज़िले का अधिकांश भूभाग रेतीली, दोमट और चिकनी मिट्टी से घिरा है। यहां औसत वार्षिक तापमान लगभग 44.30 डिग्री सेल्सियस (Celsius) से 44.60 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है, जबकि औसत वार्षिक वर्षा लगभग 987 मिलीमीटर (millimeter) दर्ज की जाती है। गोमती नदी, जो गंगा नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है, उत्तर प्रदेश के पीलीभीत ज़िले के माधोगनी टांडा गाँव के पास गोमठ ताल से निकलती है और जौनपुर शहर के बीचो-बीच से होकर बहती है। आज गोमती में बढ़ता प्रदूषण जौनपुर की सबसे गंभीर समस्याओं में शामिल हो चुका है। यह नदी वाराणसी के पास गंगा नदी में मिलने से पहले लगभग 940 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए उत्तर प्रदेश के नौ ज़िलों से होकर गुजरती है। वर्तमान हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि नदी में स्नान करने या इससे मछली पकड़कर खाने वालों के लिए यह जानलेवा साबित हो सकती है। गोमती नदी के प्रदूषण का मुख्य कारण औद्योगिक अपशिष्ट और अनुपचारित सीवेज डिस्चार्ज (Untreated Sewage Discharge) है। दुर्भाग्यवश, इस समस्या से निपटने के लिए जौनपुर में आज भी कोई ठोस सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (Sewage Treatment Plant) मौजूद नहीं है।
जौनपुर में शाही पुल और सद्भावना पुल के बीच गोमती नदी का प्रदूषण विशेष रूप से चिंता का विषय बन गया है। सीवेज में मौजूद जैविक कचरे के अपघटन के कारण इस क्षेत्र में नदी का पानी काले रंग में बदल गया है। नदी के किनारों पर मानव और पशु अपशिष्ट, प्लास्टिक और अन्य हानिकारक कचरा जमा हो चुका है। हालात ऐसे हो गए हैं कि नदी का पानी न तो मानव उपयोग के योग्य रहा है और न ही जलीय जीवों के लिए सुरक्षित। आसपास के खुले और बंद नालों का प्रदूषित पानी सीधे नदी में छोड़ा जा रहा है। हनुमान घाट के पास नदी किनारे पड़े जंग लगे ऑटोरिक्शा (Auto Rickshaw) बरसात के दिनों में जंग को पानी के साथ नदी में घोल देते हैं। वहीं शाही पुल के पास बना एक छोटा तालाब कचरा डंप और खुले में शौच का केंद्र बन चुका है। नदी को स्वच्छ रखने के लिए लगाए गए साइन बोर्ड (Signboard) और चेतावनियों के बावजूद हालात में कोई ठोस सुधार नहीं दिखता। भारी प्रदूषण के बावजूद कई लोग आज भी गोमती में स्नान करते हैं और इसके किनारे स्थित मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं, बिना यह समझे कि वे अपने स्वास्थ्य के साथ कितना बड़ा जोखिम उठा रहे हैं। मछुआरे, जिनकी आजीविका इसी नदी पर निर्भर है, प्रदूषित पानी में समय बिताने को मजबूर हैं और इसी पानी में पली मछलियों को बेचते हैं।
गोमती नदी का प्रदूषण केवल जौनपुर तक सीमित नहीं है। लखनऊ और सुल्तानपुर जैसे शहरों से भी मानव, कृषि और औद्योगिक कचरे के निर्वहन के कारण नदी की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। गोमती नदी के रासायनिक और जैविक प्रदूषण पर केंद्रित कई अध्ययनों में पानी और तलछट में पारा और सीसा (Mercury and Lead), कीटनाशकों और अन्य हानिकारक प्रदूषकों की उच्च मात्रा पाई गई है।
नदी प्रदूषण के साथ-साथ भूजल संदूषण भी आज एक गंभीर समस्या बन चुका है। भूमि के भीतर मौजूद जल में हानिकारक पदार्थों की मौजूदगी को भूजल संदूषण कहा जाता है।
यह समस्या विभिन्न मानवीय गतिविधियों के कारण उत्पन्न होती है, जैसे—
भूजल संदूषण के दुष्प्रभाव दूरगामी होते हैं। इससे स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुँचता है और आर्थिक क्षति भी होती है।
भूजल संदूषण को रोकने के लिए कुछ आवश्यक उपाय अपनाए जा सकते हैं, जैसे—
इन उपायों के साथ-साथ भारत सरकार और कुछ निजी कंपनियाँ भी नदियों और भूजल की सफाई के लिए प्रभावी तकनीकों के साथ आगे आ रही हैं। बेंगलुरु की कंपनी एल्फेमॅर्स लिमिटेड (Alphamers Ltd.) इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण है। इस कंपनी ने नदियों की सफाई के लिए स्टील (Steel) की जाली और जंजीरों से बने फ्लोटिंग बैरियर (Floating Barrier) की एक अनूठी तकनीक विकसित की है। इसे नदी के बहाव के विपरीत दिशा में लगाया जाता है, जिससे कचरा स्वतः नदी के किनारे इकट्ठा हो जाता है। इसके बाद भूमि आधारित उत्खननकर्ताओं द्वारा इस कचरे को हटाकर ट्रकों के माध्यम से ले जाया जाता है। यह तकनीक नावों के आवागमन को भी बाधित नहीं करती।
यह फ्लोटिंग बैरियर तकनीक भारी मानसून के दौरान भी प्रभावी ढंग से काम करती है और उथली तथा तेज़ बहाव वाली नदियों या नालों में भी तैनात की जा सकती है। इसे देश के आठ भारतीय शहरों में लागू किया जा चुका है और अपने पहले ही वर्ष में इस तकनीक की मदद से नदियों से 2200 टन प्लास्टिक कचरा हटाया गया है। साथ ही यह समाधान लागत प्रभावी भी सिद्ध हुआ है।
भारतीय प्रयासों के साथ-साथ नदियों की सफाई के लिए विदेशों से भी सहयोग मिल रहा है। इस दिशा में डेनमार्क (Denmark) सबसे आगे है, जिसने गंगा नदी की सफाई में भारत की सहायता करने की पेशकश की है। डेनिश (Danish) सरकार इस परियोजना के लिए तकनीकी सहायता और वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराएगी। गंगा नदी सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र मानी जाती है और करोड़ों लोगों के लिए जल का प्रमुख स्रोत भी है, लेकिन आज यह भी औद्योगिक कचरे, सीवेज और कृषि अपवाह से बुरी तरह प्रदूषित हो चुकी है। भारत सरकार वर्षों से गंगा की सफाई के प्रयास कर रही है, हालांकि यह एक जटिल चुनौती बनी हुई है। जल प्रबंधन में डेनमार्क के व्यापक अनुभव और प्रदूषित नदियों की सफाई में उनके सफल ट्रैक रिकॉर्ड (Track Record) को देखते हुए यह सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे न केवल लाखों लोगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, बल्कि पर्यटन उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा। यह पहल भारत और डेनमार्क के बीच मज़बूत होते संबंधों का भी प्रतीक है। प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए सरकारों और व्यवसायों द्वारा उठाए जा रहे कदम इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा हैं। अब समय आ गया है कि इन प्रयासों को और तेज़ किया जाए, सख़्त मानदंड और नीतियाँ अपनाई जाएँ और एक परिपत्र अर्थव्यवस्था की दिशा में ठोस बदलाव लाया जाए।
संदर्भ
https://rb.gy/ab71a
https://rb.gy/8it5n
https://rb.gy/1jn0l
https://tinyurl.com/fdcfby2x
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