भोपाल गैस त्रासदी में टैंक E610 में उस रात क्या हुआ जिसने लाखों जिंदगियां तबाह कर दीं?

शहरीकरण - नगर/ऊर्जा
30-04-2026 09:26 AM
भोपाल गैस त्रासदी में टैंक E610 में उस रात क्या हुआ जिसने लाखों जिंदगियां तबाह कर दीं?

साल 1984 की 2 दिसंबर की आधी रात, जब मध्य प्रदेश के भोपाल शहर के लाखों निवासी गहरी नींद में सो रहे थे, तब एक कीटनाशक कारखाने से लगभग 40 टन ज़हरीली मिथाइल आइसोसाइनेट (methyl isocyanate) गैस का रिसाव हुआ। इस भयंकर रिसाव ने तुरंत कम से कम 3,800 लोगों की जान ले ली और आने वाले समय में हज़ारों अन्य लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इस गैस से 5 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए थे, जिस कारण इसे इतिहास की सबसे भीषण औद्योगिक आपदाओं में गिना जाता है। जौनपुर और पूर्वांचल के पाठकों के लिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर एक कारखाने की लापरवाही ने कैसे लाखों ज़िंदगियां तबाह कर दीं, इसके क्या दूरगामी परिणाम हुए और इस एक घटना ने कैसे पूरे भारत के औद्योगिक सुरक्षा कानूनों को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।  
 


यूनियन कार्बाइड के कारखाने में उस रात असल में क्या हुआ था?
यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (Union Carbide India Limited) का यह कारखाना 1969 में भोपाल में स्थापित किया गया था, जिसका उद्देश्य कीटनाशक बनाना था। इस कारखाने का 50.9 प्रतिशत हिस्सा अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन (Union Carbide Corporation) के पास था, जबकि 49.1 प्रतिशत हिस्सा भारतीय निवेशकों और बैंकों के पास था। साल 1979 में इस कारखाने में मिथाइल आइसोसाइनेट के उत्पादन के लिए एक नई इकाई जोड़ी गई। 1980 के दशक की शुरुआत में कीटनाशकों की मांग कम होने के कारण कारखाने में बिना इस्तेमाल की गई मिथाइल आइसोसाइनेट गैस जमा होने लगी थी। यह कारखाना शहर के घनी आबादी वाले इलाके और रेलवे स्टेशन के ठीक बगल में स्थित था, जो 1975 की भोपाल विकास योजना का सीधा उल्लंघन था। 1982 में ही कंपनी के ऑडिटरों (auditors) ने एक भयानक रासायनिक प्रतिक्रिया (chemical reaction) की चेतावनी दी थी। अक्टूबर 1984 के अंत तक कारखाने के ई610 (E610) नामक टैंक में 42 टन मिथाइल आइसोसाइनेट भरा हुआ था, लेकिन उसमें दबाव बनाने वाली नाइट्रोजन (nitrogen) गैस का रिसाव हो गया था जिससे तरल गैस को बाहर नहीं निकाला जा सकता था। 2 दिसंबर की रात को पाइपों की सफ़ाई के दौरान पानी गलती से इस ई610 टैंक में चला गया। पानी और गैस के मिलने से टैंक का तापमान और दबाव भयानक रूप से बढ़ गया। इस रिसाव को रोकने के लिए लगाए गए सुरक्षा उपकरण जैसे प्रशीतन इकाई (Refrigeration Unit), फ्लेयर टावर (Flair Tower) और वेंट गैस स्क्रबर (Vent Gas Scrubber) या तो बंद पड़े थे या ख़राब थे। नतीजतन रात के समय महज़ 45 से 60 मिनट के भीतर लगभग 30 टन ज़हरीली गैस हवा में फैल गई और पूरे शहर को अपनी चपेट में ले लिया।  

इस ज़हरीली गैस का लोगों और पर्यावरण पर कितना भयानक असर पड़ा?
गैस के संपर्क में आते ही लोगों को खांसी, दम घुटना, आँखों में तेज़ जलन और उल्टी जैसी भयंकर परेशानियां होने लगीं। जान बचाने के लिए लोग बदहवास होकर भागने लगे। मिथाइल आइसोसाइनेट गैस हवा से दोगुनी भारी होती है, इसलिए यह ज़मीन के क़रीब ही रही, जिसकी वजह से कम ऊँचाई वाले बच्चों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ा। अगली सुबह तक हज़ारों लोग दम घुटने और फेफड़ों में पानी भर जाने से मर चुके थे। मध्य प्रदेश सरकार ने गैस रिसाव से 3,787 लोगों की मौत की पुष्टि की थी, जबकि एक अन्य अनुमान के मुताबिक पहले दो हफ़्तों में 8,000 लोग मारे गए और बाद में गैस जनित बीमारियों से 8,000 और लोगों की मौत हुई। सरकार के एक हलफनामे के अनुसार इस रिसाव से 5,58,125 लोग घायल हुए, जिनमें से 3,900 लोग हमेशा के लिए गंभीर रूप से विकलांग हो गए। जो लोग बच गए वे आज भी अंधापन, फेफड़ों की गंभीर बीमारियों, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी और मनोवैज्ञानिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। गर्भवती महिलाओं के गर्भपात की दर कई गुना बढ़ गई और पैदा होने वाले बच्चों में भी गंभीर जन्मजात बीमारियां देखी गईं। पर्यावरण की बात करें तो घटना के कुछ ही दिनों में आस-पास के पेड़ सूख गए और हज़ारों मृत जानवरों को दफ़नाना पड़ा। कारखाने के अंदर आज भी ख़तरनाक रसायनों का कचरा पड़ा हुआ है, जिससे वहाँ की मिट्टी और भूजल बुरी तरह प्रदूषित हो चुके हैं।1 जनवरी 2025 को भारी सुरक्षा के बीच 377 टन ज़हरीले कचरे को भोपाल से पीथमपुर ले जाकर जलाया गया है।

 

त्रासदी के बाद कंपनी का रवैया और कानूनी लड़ाई कैसी रही?
हादसे के तुरंत बाद यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन ने अपनी ज़िम्मेदारी से भागने की पूरी कोशिश की। कंपनी ने सारा दोष अपनी भारतीय इकाई पर मढ़ दिया और यह झूठी कहानी भी रची कि यह हादसा किसी असंतुष्ट कर्मचारी या सिख चरमपंथियों की साज़िश का नतीजा था। गैस रिसाव के तुरंत बाद कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी वारेन एंडरसन (Warren Anderson) भोपाल आए, जिन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। लेकिन उन्हें ज़मानत दे दी गई और वे सरकारी विमान से देश छोड़कर अमेरिका भाग गए। भारत सरकार ने उनके प्रत्यर्पण की बहुत कोशिश की, लेकिन अमेरिका ने सबूतों की कमी का हवाला देकर उन्हें भारत को सौपने से इनकार कर दिया। सालों तक चले मुकदमों के बाद 1989 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की मध्यस्थता में यूनियन कार्बाइड ने 470 मिलियन डॉलर का मुआवज़ा देने पर सहमति जताई। यह रक़म बहुत कम थी क्योंकि इसमें लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों और प्रभावित लोगों की असली संख्या को कम आँका गया था। इस समझौते के बाद कंपनी ने अपनी भारतीय इकाई को बेच दिया। सालों बाद 2010 में सात भारतीय अधिकारियों को लापरवाही से मौत के मामले में दोषी ठहराया गया और उन्हें दो साल की जेल व ज़ुर्माने की सज़ा सुनाई गई, लेकिन उन्हें तुरंत ज़मानत भी मिल गई। मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन कभी भारतीय अदालत में पेश नहीं हुए और 2014 में अमेरिका में उनकी मौत हो गई। 

इस भीषण हादसे ने भारत के औद्योगिक सुरक्षा कानूनों को कैसे बदल दिया?
भोपाल गैस त्रासदी से पहले भारत में औद्योगिक सुरक्षा का माहौल बहुत लचर था। तब केवल 1948 का फैक्ट्री अधिनियम लागू था, जिसमें ख़तरनाक रसायनों से निपटने के लिए कोई कड़े नियम नहीं थे। लेकिन इस महाविनाश ने भारत सरकार को नींद से जगा दिया। सबसे बड़ा बदलाव 1986 में आया जब पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू किया गया, जिसने सरकार को पर्यावरण सुरक्षा और ख़तरनाक उद्योगों पर नियंत्रण रखने के लिए भारी अधिकार दिए। इसके बाद 1987 में फैक्ट्री अधिनियम में संशोधन करके ख़तरनाक रसायनों के उपयोग, सुरक्षा ऑडिट (Security Audit) और आपातकालीन योजनाओं को अनिवार्य बना दिया गया। साल 1991 में सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम लाया गया, जिसके तहत ख़तरनाक सामग्री संभालने वाली कंपनियों के लिए बीमा कराना अनिवार्य कर दिया गया ताकि दुर्घटना होने पर पीड़ितों को तुरंत मुआवज़ा मिल सके। साल 1989 में ख़तरनाक कचरे के प्रबंधन और निपटान के लिए भी सख़्त नियम बनाए गए। इन कानूनों को लागू कराने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (State Pollution Control Boards) को बहुत ताक़तवर बनाया गया, जो अब कारखानों का निरीक्षण कर सकते हैं और नियम तोड़ने वालों पर जुर्माना लगा सकते हैं। उद्योगों में भी सुरक्षा को लेकर सोच बदली है। अब ज़्यादातर ख़तरनाक प्रक्रियाओं को स्वचालित कर दिया गया है ताकि इंसानों को कम ख़तरा हो। तापमान और रसायनों के दबाव को मापने के लिए अब कारखानों में रियल टाइम निगरानी प्रणाली लगाई जाती है। यद्यपि आज भारत आर्थिक रूप से बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन भोपाल की इस घटना ने पूरी दुनिया और भारत को यह सिखा दिया है कि बिना सुरक्षा नियमों के किया गया औद्योगिक विकास अंततः महाविनाश ही लाता है। 

संदर्भ 
https://tinyurl.com/28k6z64l
https://tinyurl.com/28k6z64l
https://tinyurl.com/c2lqplf
https://tinyurl.com/26hr3g4a 

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