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हम सब, प्रत्येक वर्ष जून महीने की शुरुआत में बारिश की राह देखते हैं। हमारे जौनपुर जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में बारिश जीवनदाता है। मानसून, केवल अधिक बारिश की एक बौछार नहीं है, बल्कि भूमि और महासागर के तापन के अंतर के कारण प्रचलित हवाओं में होने वाला एक बड़ा मौसमी बदलाव है। भारत में तीव्र मानसून इसलिए आता है, क्योंकि विशाल एशियाई भूभाग गर्मियों में तेजी से गर्म होकर कम वायु दाब वाला क्षेत्र बनाता है। इससे हिंद महासागर से उठी नमी से भरी हवाएँ भारतीय उपमहाद्वीप पर बहती हैं, जो फिर हिमालय से टकराकर हमारे क्षेत्र में बारिश बनकर गिरती हैं। इसके विपरीत, यूरोप में कोई वास्तविक मानसून नहीं है। हालांकि, मानसून प्रणालियाँ अन्य स्थानों पर भी मौजूद हैं, जो उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका में मौसमी वर्षा को आकार देती हैं।
व्यापक रूप से कहें तो पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में विपरीत ऋतुएँ होती हैं। जैसे-जैसे पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है, पृथ्वी के अक्ष का झुकाव बदलता रहता है। जून, जुलाई और अगस्त महीनों के दौरान पृथ्वी का झुकाव उत्तरी गोलार्ध के हिस्से को सूर्य की ओर अधिक रखता है, और दक्षिणी हिस्सा दूर झुका होता है। दिसंबर, जनवरी और फरवरी महीनों में इसके विपरीत स्थिति होती है। तब दक्षिण गोलार्ध में अधिक प्रकाश, लंबे दिन और अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त होती है। ध्यान दें कि ऋतुओं में परिवर्तन पृथ्वी के इसी झुकाव के कारण होते हैं, और न कि पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी के कारण।

भूमध्य रेखा (Equator) के निकट स्थित क्षेत्रों में आमतौर पर केवल दो ही ऋतुएँ होती हैं - वर्षा (मानसून) और शुष्क। चूंकि वे क्षेत्र भूमध्य रेखा (जहाँ सूर्य किरणें हमेशा सीधी गिरती हैं) के पास हैं, इसलिए वर्ष के दौरान उन्हें मिलने वाली प्रकाश की मात्रा में बहुत अधिक बदलाव नहीं होता है।
इतिहास में मिस्रवासियों के पास नील नदी के आधार पर तीन ऋतुएँ थीं - बाढ़, वृद्धि और कम पानी। प्रारंभिक ब्रिटेन (Britain) में बेल्टैन (Beltane) त्योहार को गर्मियों की शुरुआत और हैलोवीन (Halloween) त्योहार को इसकी समाप्ति के रूप में चिह्नित किया। रोमन लोग (Roman people)चार ऋतुएँ मानते थे; और यूनानी लोग (Greek people) अपने स्थान के आधार तीन या चार ऋतुएँ मानते थे। जबकि हिंदू कैलेंडर में छह ऋतुएँ हैं।
भारत में एक प्रभावशाली उष्णकटिबंधीय मानसून है, क्योंकि विशाल एशियाई भूभाग का तीव्र ग्रीष्मकालीन तापन एक विशाल कम दबाव का क्षेत्र बनाता है। यह क्षेत्र, गर्म हिंद महासागर से नमी से भरी हवाओं को खींचता है। यूरोप में इस प्रणाली का अभाव है, क्योंकि इसका उच्च अक्षांश, छोटा भूभाग और ठंडा अटलांटिक महासागर एक वास्तविक उष्णकटिबंधीय मानसून के लिए आवश्यक तापमान के उतार-चढ़ाव और मौसमी हवा के परिवर्तन को रोकते हैं। इस प्रकार, इन दोनों क्षेत्रों में मुख्य भौगोलिक और जलवायु संबंधी अंतर निम्नलिखित हैं:
1. भूमि तापन: भारत उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के पास स्थित है, जहाँ सीधी धूप उपमहाद्वीप और तिब्बती पठार को तीव्रता से गर्म करती है, जिससे एक विशाल गर्म क्षेत्र बनता है। यूरोप और उत्तर में स्थित क्षेत्र अधिक हल्के, क्रमिक तापमान परिवर्तनों का अनुभव करते हैं।
2. महासागर का प्रभाव: हिंद महासागर और अरब सागर का गर्म उष्णकटिबंधीय पानी, आसानी से भारी मात्रा में जल वाष्प बनाता है। यूरोप के पास स्थित उत्तर अटलांटिक महासागर ठंडा और अधिक स्थिर है, जो भारी वायुमंडलीय पलटाव को चालना देने में विफल रहता है।
3. हवा और दबाव में बदलाव: भारत, मौसमी हवाओं के पूर्ण परिवर्तन का अनुभव करता है (दक्षिण-पश्चिम से आने वाली ग्रीष्मकालीन हवाएँ व उत्तर-पूर्व से आने वाली शुष्क शीतकालीन हवाएँ)। इसके बजाय, यूरोप उष्णकटिबंधीय हवा-पैटर्न में बदलाव के बजाय, साल भर स्थिर मध्यम अक्षांश पश्चिमी हवाओं (Westerly winds) और समशीतोष्ण कम दबाव प्रणालियों के वर्चस्व में रहता है।
4. प्राकृतिक अवरोध: भारत में हिमालय ठंडी उत्तरी हवाओं को देश में प्रवेश करने से रोकता है और मानसून की नमी को अवरुद्ध करता है, जिससे वर्षा तेज होती है। यूरोप की मुख्य पर्वत श्रृंखला – आल्प्स (Alps) पश्चिम से पूर्व की ओर खड़ी है और मौसमी उष्णकटिबंधीय वायु द्रव्यमान को अवरुद्ध नहीं कर पाती है।
मानसून, केवल एशिया महाद्वीप की विशेषता नहीं है। दरअसल, विश्व में बारिश के लिए एशियाई-ऑस्ट्रेलियाई-अफ्रिकी मानसून (Asian-Australian-African Monsoon) कार्य करता है। उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका के बीच मानसून चक्रों में कुछ समानताएँ हैं, और उनके पीछे निश्चित वायुमंडलीय प्रक्रियाएँ हैं। हालांकि ये दोनों क्षेत्र भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से काफी दूर स्थित हैं, लेकिन इनमें मौसमी हवाओं के रुख में होने वाले बदलाव (Seasonal wind shifts) और वायुमंडलीय परिसंचरण (Atmospheric circulation) की प्रणालियों में गहरी समानता पाई जाती है।
दोनों ही क्षेत्रों में, मानसूनी चक्र मुख्य रूप से मौसमी हवाओं की दिशा में होने वाले बड़े पैमाने पर परिवर्तन (Reversal) पर निर्भर करते हैं। ग्रीष्म ऋतु में गर्म भूमि के ऊपर कम वायुदाब का क्षेत्र बनता है, जिससे समुद्र से नमी से भरी हवाएं जमीन की ओर बहती हैं।

अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का मौसमी स्थानांतरण, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका दोनों जगहों पर मानसूनी वर्षा को निर्धारित करने में मुख्य भूमिका निभाता है। सूर्य की स्थिति के साथ यह क्षेत्र उत्तर और दक्षिण की ओर स्थानांतरण करता है, जिससे दोनों क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से वर्षा और सूखे मौसम के चक्र उत्पन्न होते हैं।
एक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि भौगोलिक भिन्नताओं के बावजूद, वायुमंडल और महासागरों की प्रतिक्रियाओं के कारण दोनों क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा का पैटर्न समान नियमों और प्रक्रियाओं से संचालित होता है। इस प्रकार, इस कार्य में बहु-पैमाने की परस्पर क्रिया के दृष्टिकोण से, एशियाई-ऑस्ट्रेलियाई-अफ्रिकी मानसून को एक एकीकृत इकाई के रूप में माना जाता है।
मानसून में योगदान देने वाले ये वायुमंडलीय परिवर्तन, निश्चित सिद्धांतों पर आधारित है। गर्म होने पर हवा फैलती है और ठंडी होने पर संकुचित होती है। इसके परिणामस्वरूप, वायुमंडलीय दबाव में बदलाव होता है। वायुमंडलीय दबाव में अंतर उच्च दबाव से कम दबाव की ओर हवा की गति का कारण बनता है, जिससे हवा गति में आ जाती है। वायुमंडलीय दबाव यह भी निर्धारित करता है कि हवा कब ऊपर उठेगी या नीचे बहेगी।
क्षैतिज गति में चलने वाली हवा (Wind), विभिन्न अक्षांशों में गर्मी और नमी को पुनर्वितरित करती है, जिससे पूरे ग्रह के लिए एक स्थिर तापमान बना रहता है। इसके विपरीत, नम हवा के लंबवत रूप से ऊपर उठने से बादल बनते हैं और वर्षा होती है। भूमध्य रेखा के पास समुद्र तल पर हवा का दबाव कम होता है और इस क्षेत्र को भूमध्यरेखीय निम्न (Equatorial low) कहा जाता है। 30° उत्तर और 30° दक्षिण अक्षांशों के साथ उच्च दबाव वाले क्षेत्र पाए जाते हैं, जिन्हें उपोष्णकटिबंधीय उच्च (Subtropical highs) कहा जाता है। ध्रुवों की ओर 60° उत्तर और 60° दक्षिण के साथ, कम दबाव की बेल्ट को उपध्रुवीय निम्न (Subpolar lows) कहा जाता है। ध्रुवों के पास दबाव अधिक होता है और इसे ध्रुवीय उच्च (Polar high) कहा जाता है।

ये दबाव बेल्ट प्रकृति में स्थायी नहीं होते हैं। वे सूर्य की स्पष्ट गति के साथ स्थानांतरण करते हैं। वे सर्दियों में उत्तरी गोलार्ध में दक्षिण की ओर और गर्मियों में उत्तर की ओर बढ़ते हैं। उच्च और कम दबाव प्रणालियों के परिणामस्वरूप दबाव में अंतर के दो मुख्य कारण हैं – तापीय और गतिक (Dynamic)। जब हवा गर्म होती है, तो यह फैलती है, और इसलिए इसका घनत्व कम हो जाता है। इससे स्वाभाविक रूप से कम दबाव बनता है। इसके विपरीत, शीतलन से संकुचन होता है। यह घनत्व को बढ़ाता है और इस प्रकार उच्च दबाव की स्थिति पैदा करता है। भूमध्यरेखीय निम्न और ध्रुवीय उच्च का निर्माण क्रमशः तापीय निम्न और तापीय उच्च के उदाहरण हैं।
तापमान में बदलाव के अलावा, दबाव बेल्ट के गठन को दबाव प्रवणता बलों (Pressure gradient forces) और पृथ्वी के घूर्णन (कोरियोलिस बल – Coriolis force) से उत्पन्न होने वाले गतिशील नियंत्रणों द्वारा समझाया जा सकता है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/7pvpd69c
2. https://tinyurl.com/4wabrzte
3. https://tinyurl.com/462rhmm2
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