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लखनऊवासियों, आज हम एक ऐसे ऐतिहासिक विषय पर बात करने जा रहे हैं जो भले ही सीधे हमारे शहर से जुड़ा न हो, लेकिन भारत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य इतिहास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है - दिल्ली सल्तनत और उसके प्रथम राजवंश, ममलूक वंश का उदय। जिस तरह लखनऊ अपनी तहज़ीब, नक़्क़ाशीदार इमारतों और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए प्रसिद्ध है, उसी तरह सल्तनत काल की इमारतों और स्थापत्य शैलियों ने भी भारत की वास्तुकला की दिशा निर्धारित की। यही कारण है कि इस विषय को समझना हमें यह जानने में मदद करता है कि सदियों पहले भारत में किस तरह की सत्ता, किस तरह की इमारतें और किस तरह की तकनीकें विकसित हुईं - और वे आगे चलकर हमारी आधुनिक कलात्मक विरासत का आधार कैसे बनीं।
आज के इस लेख में हम क्रमबद्ध रूप से पाँच महत्वपूर्ण पहलुओं को सरल भाषा में समझेंगे। सबसे पहले, हम जानेंगे कि दिल्ली सल्तनत कैसे स्थापित हुई और ममलूक वंश की शुरुआत में मुहम्मद घोरी, कुतुब-उद-दीन ऐबक और इल्तुतमिश की भूमिका क्या रही। इसके बाद, हम ममलूक शासकों की प्रशासनिक चुनौतियों और उनकी नीतियों पर नज़र डालेंगे, जिनसे सल्तनत मजबूत हुई। फिर हम समझेंगे कि सल्तनत काल की वास्तुकला कैसे भारतीय, इस्लामी और मध्य-एशियाई शैलियों का सुंदर मिश्रण बनी। इसके बाद हम उन प्रमुख इमारतों के बारे में जानेंगे - जैसे कुतुब मीनार, अलाई दरवाज़ा और तुगलकाबाद - जिन्होंने इस युग की पहचान बनाई। अंत में, हम देखेंगे कि चूना-गारा, आर्कुएट (Arcuate - धनुषाकार) तकनीक और गुम्बद-निर्माण जैसी नई तकनीकों ने भारतीय वास्तुकला में कैसे बड़ा परिवर्तन लाया।
दिल्ली सल्तनत का उदय और ममलूक (गुलाम) वंश की स्थापना
दिल्ली सल्तनत का इतिहास वास्तव में 12वीं सदी के उत्तरार्ध में घुरिद साम्राज्य के विस्तार से शुरू होता है। घुर के शासक मुहम्मद घोरी ने जब 1192 में तराइन की दूसरी लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को हराया और फिर 1194 में चंदावर की लड़ाई में जयचंद पर विजय प्राप्त की, तब उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा उनके नियंत्रण में आ गया। वे स्वयं भारत में अधिक समय नहीं रुके, इसलिए प्रशासन संचालन का दायित्व उन्होंने अपने सबसे विश्वस्त सैन्य अधिकारी कुतुब-उद-दीन ऐबक को सौंपा, जो उनका दास होने के बावजूद एक कुशल योद्धा, रणनीतिकार और संगठक था।
1206 में मुहम्मद घोरी की मृत्यु के बाद ऐबक ने दिल्ली में स्वतंत्र सत्ता स्थापित की और इसी क्षण से दिल्ली सल्तनत के प्रथम राजवंश - ममलूक वंश - का जन्म हुआ। “ममलूक” शब्द अरबी से आया है, जिसका अर्थ है “स्वामी-निर्मित दास” या प्रशिक्षित सैनिक। ये साधारण दास नहीं थे, बल्कि अत्यंत सक्षम, निष्ठावान और युद्धकला में दक्ष योद्धा होते थे।
ऐबक के बाद उसके दामाद और उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने सल्तनत को एक सुसंगठित, शक्तिशाली और स्थिर राज्य का स्वरूप दिया। कूटनीति, सैन्य-व्यवस्था और प्रशासनिक सुधारों के कारण इल्तुतमिश को वास्तव में दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

ममलूक शासकों का शासन, चुनौतियाँ और प्रशासनिक मजबूती
जब 1211 में इल्तुतमिश ने सत्ता संभाली, तब सल्तनत अभी भी नवजात अवस्था में थी और उसे कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। पहली चुनौती पश्चिमी सीमा पर मंगोलों का लगातार दबाव था, जिन्होंने मध्य एशिया में उथल-पुथल मचा रखी थी और भारत की दिशा में भी नजरें टिकाई थीं। दूसरी चुनौती तुर्की अमीरों की शक्ति थी, जो दरबार में अपने प्रभाव को बढ़ाकर सुल्तान की शक्ति को कमजोर करना चाहते थे। तीसरी चुनौती भारतीय हिंदू सरदारों की स्वतंत्रता-प्रियता थी, जिन्हें सल्तनत की अधीनता कबूल करवाना आवश्यक था। इल्तुतमिश ने शक्तिशाली सेना, संगठित प्रशासन और समझदारीपूर्ण गठबंधन-नीति के माध्यम से इन तीनों क्षेत्रों में सफलता पाई। उसके शासन के बाद उसकी योग्य पुत्री रज़िया सुल्तान ने सत्ता संभाली - जो भारतीय इतिहास की पहली मुस्लिम महिला शासक थीं। लेकिन तुर्क अमीर एक महिला को सत्ता में देखकर असंतुष्ट हुए और अंततः रज़िया को अपदस्थ कर दिया।
राजनीतिक अस्थिरता के बाद सत्ता गियास-उद-दीन बलबन के हाथों में पहुँची, जिसने शाही मर्यादा, अनुशासन और राजसत्ता की “दैवीय छवि” को अत्यधिक सुदृढ़ किया। बलबन ने मंगोलों के विरुद्ध व्यापक सुरक्षा-तंत्र तैयार किया और दरबार में कठोर “ज़ाब्ते” लागू किए। उसके शासन में सल्तनत पुनः एक मजबूत और स्थिर साम्राज्य बन गई।
सल्तनत काल की वास्तुकला: उद्भव, विशेषताएँ और सांस्कृतिक संगम
सल्तनत काल वास्तुकला के इतिहास में एक क्रांतिकारी चरण था। इस अवधि में जन्म लेने वाली इमारतें केवल धार्मिक या राजनीतिक प्रतीक नहीं थीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी, मध्य एशियाई और भारतीय कला का अनोखा संगम थीं। यह वह दौर था जब भारत में पहली बार स्पष्ट रूप से विकसित इंडो-इस्लामिक (Indo-Islamic) वास्तुकला दिखाई देती है - एक ऐसा कला-रूप जिसमें हिंदू-जैन मंदिरों की परंपरागत मूर्तिकारी और भारतीय पत्थर-शिल्प, इस्लामी जगत की मेहराबों, गुम्बदों, ज्यामितीय डिजाइन और ईंट-निर्माण तकनीकों के साथ मिश्रित होते हैं। सल्तनत काल की वास्तुकला तीन प्रमुख रूपों में विकसित हुई - दिल्ली की शाही शैली, जो मुख्यतः सुल्तानों द्वारा संरक्षित थी; प्रांतीय सल्तनती शैली, जो बंगाल, गुजरात और दक्कन में विकसित हुई; तथा हिंदू शासकों के अधीन विकसित शैली, जिसमें राजस्थानी और दक्षिण भारतीय तत्वों का प्रभाव था। यह विविधता आगे चलकर उस विशाल वास्तु-परंपरा का आधार बनी जिसने मुगल काल में अपनी चरम सुंदरता प्राप्त की।

प्रमुख इमारतें और सुल्तानों का स्थापत्य योगदान
सल्तनत काल में निर्मित इमारतों की श्रृंखला अत्यंत विस्तृत है और इनमें से कई भारत की ऐतिहासिक पहचान बन चुकी हैं। सबसे पहले कुतुब-उल-इस्लाम मस्जिद और अढ़ाई दिन का झोंपड़ा का उल्लेख किया जाता है, जिनमें हिंदू-जैन स्थापत्य की मूर्तिकारी और इस्लामी विन्यास का अद्वितीय सम्मिश्रण देखा जाता है। इसके बाद आती है कुतुब मीनार, जो ईंट-निर्मित मीनारों में विश्व के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक है। ऐबक ने इसकी नींव रखी, इल्तुतमिश ने तीन मंज़िलें बनवाईं और बाद में फ़िरोज़ तुगलक ने इसे और ऊँचा तथा भव्य बनाया।
अन्य उल्लेखनीय स्थापत्य योगदानों में शामिल हैं—
ये सभी इमारतें न केवल सुल्तानों की शक्ति, बल्कि उस समय की अभियांत्रिकी, कला और सौंदर्य-बोध को भी उजागर करती हैं।

सल्तनत काल में निर्माण तकनीकें: आर्कुएट शैली और नई सामग्रियाँ
सल्तनत काल में भारत की निर्माण-तकनीक में एक मूलभूत परिवर्तन आया। इस काल में पहली बार चूना-गारा (Lime mortar), जिप्सम (Gypsum), सुरखी, और पकी ईंटों का बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ। इन नई सामग्रियों ने निर्माण को तेज, सस्ता और टिकाऊ बना दिया। सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन था आर्कुएट तकनीक का विकास - यानी मेहराबों और गुम्बदों की मदद से विशाल, बिना स्तंभों वाले आंतरिक स्थानों का निर्माण। मेहराबों में प्रयुक्त वौसोइर (पच्चर-आकार के पत्थर) और केंद्र-पत्थर (keystone) ने इमारतों को पहले से कहीं अधिक स्थिर और ऊँचा बनाने की क्षमता प्रदान की। कम लागत और बेहतर स्थायित्व के कारण मस्जिदों, मकबरों, महलों, सरायों, बारादरियों और बाजारों के निर्माण में तेजी आई। यह तकनीकी परिवर्तन आगे मुगल काल की उच्च स्तरीय वास्तुकला की नींव बना।
भारतीय–इस्लामी प्रभावों का मिलन और उसका ऐतिहासिक महत्व
सल्तनत काल का स्थापत्य भारत की सांस्कृतिक विविधता और सह-अस्तित्व का उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रारंभिक मस्जिदें और भवन कई बार परित्यक्त हिंदू-जैन मंदिरों, संस्कृत महाविद्यालयों और अन्य संरचनाओं पर निर्मित किए गए, जिसके परिणामस्वरूप इन इमारतों में भारतीय शिल्प - जैसे आलंकरण, फूल-पत्ती के डिज़ाइन, कमल आकृति, और अलंकारिक स्तंभ - स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इससे एक नया मिश्रणात्मक स्थापत्य-रूप उभरा, जिसने न केवल सल्तनत काल बल्कि आगे के सैय्यद, लोदी और मुगल काल को भी प्रभावित किया। यही प्रभाव भारत में इस्लामी स्थापत्य को स्थानीय विशेषताओं के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सफल बना, जिसके कारण इस युग की इमारतें आज भी भारत की कला-परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं।
संदर्भ -
https://tinyurl.com/29uxyr9x
https://tinyurl.com/bdz6cbr8
https://tinyurl.com/2u3m8p29
https://tinyurl.com/38axrksh
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