दुनिया भर में शांति बनाए रखने का दावा करने वाले संयुक्त राष्ट्र को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि अमेरिका इसका सबसे बड़ा ख़र्च क्यों उठाता है। आम तौर पर लोगों को लगता है कि बाइस प्रतिशत का भारी भरकम बजट देकर अमेरिका शायद कोई घाटे का सौदा कर रहा है। लेकिन असलियत इसके बिल्कुल उलट है। अकेले न्यूयॉर्क शहर को संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय की मेज़बानी करने से हर साल लगभग तीन अरब अड़सठ करोड़ डॉलर का सीधा आर्थिक फ़ायदा होता है और पंद्रह हज़ार से ज़्यादा लोगों को रोज़गार मिलता है। सिर्फ़ पैसा ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे ताक़तवर कूटनीतिक मंच के अपने देश में होने से अमेरिका को ख़ुफ़िया जानकारी और वैश्विक राजनीति पर ऐसा नियंत्रण मिलता है जिसे किसी भी क़ीमत पर ख़रीदा नहीं जा सकता। दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की राख से निकालकर आज के आधुनिक दौर तक पहुँचाने वाली इस विशाल संस्था का इतिहास, इसकी ताक़त और इसकी कमज़ोरियों को समझना आज के दौर में बेहद ज़रूरी है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र का गठन क्यों हुआ?
बीसवीं सदी में दुनिया ने दो भयानक महायुद्ध देखे थे। पहले विश्व युद्ध के बाद शांति बनाए रखने के लिए साल 1919 में लीग ऑफ नेशंस नाम की संस्था बनाई गई थी। लेकिन यह संस्था दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की आग में जलने से नहीं रोक सकी और साल 1946 में इसे भंग कर दिया गया। इसी विफलता से सबक लेते हुए दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने एक नया और ज़्यादा मज़बूत वैश्विक संगठन बनाने का फ़ैसला किया। इसकी पहली सुगबुगाहट अगस्त 1941 में तब हुई जब अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूज़वेल्ट और ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने अटलांटिक चार्टर पर हस्ताक्षर किए। बाद में डंबार्टन ओक्स और याल्टा सम्मेलनों में अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ के नेताओं ने इसकी रूपरेखा तैयार की। आख़िरकार 25 अप्रैल 1945 को सैन फ्रांसिस्को में दुनिया भर के पचास देशों के प्रतिनिधि जमा हुए। पोलैंड जो इस सम्मेलन में नहीं आ सका था, उसे भी बाद में संस्थापक सदस्य के रूप में शामिल किया गया। इस तरह 24 अक्टूबर 1945 को इक्यावन संस्थापक देशों के साथ संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक तौर पर स्थापना हुई। इसका मुख्य मक़सद आने वाली पीढ़ियों को युद्ध के ख़तरे से बचाना, मानवाधिकारों की रक्षा करना और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का पालन सुनिश्चित करना है।
सुरक्षा परिषद कैसे काम करती है और यह वीटो पावर क्या है?
संयुक्त राष्ट्र के भीतर सबसे ताक़तवर हिस्सा उसकी सुरक्षा परिषद है। यही वह इकलौती संस्था है जो अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने के लिए सैन्य बल के इस्तेमाल की मंज़ूरी दे सकती है और इसके फ़ैसले सदस्य देशों पर क़ानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं। इस परिषद में कुल पंद्रह सदस्य होते हैं जिनमें से पाँच स्थायी सदस्य हैं और दस अस्थायी सदस्य होते हैं जिन्हें दो साल के लिए चुना जाता है। ये पाँच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन हैं। इन पाँचों देशों के पास एक बेहद ख़ास ताक़त है जिसे वीटो पावर कहा जाता है। किसी भी बड़े और ग़ैर-प्रक्रियागत फ़ैसले को पास करने के लिए पंद्रह में से नौ सदस्यों की हाँ ज़रूरी है, लेकिन इसके साथ ही यह भी ज़रूरी है कि पाँचों स्थायी सदस्यों में से कोई भी इसके ख़िलाफ़ वोट न करे। अगर एक भी स्थायी सदस्य न में वोट देता है तो वह प्रस्ताव रद्द हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र बनाते समय इन बड़े देशों को डर था कि कहीं बहुमत उनके ख़िलाफ़ न इस्तेमाल होने लगे। अगर इन्हें यह ताक़त न दी जाती तो ये देश इस संस्था में शामिल ही नहीं होते और पुरानी संस्था लीग ऑफ नेशंस की तरह यह भी नाकाम हो जाती। हालाँकि अब यह वीटो पावर एक बड़ी समस्या बन चुकी है। स्थायी सदस्य अक्सर अंतरराष्ट्रीय शांति के बजाय अपने आर्थिक और राजनीतिक फ़ायदों के लिए या अपने सहयोगी देशों को बचाने के लिए इस ताक़त का इस्तेमाल करते हैं। अगर कोई स्थायी देश किसी प्रस्ताव को रोकना नहीं चाहता लेकिन उसका समर्थन भी नहीं करना चाहता, तो वह वोटिंग में हिस्सा न लेने का विकल्प चुन सकता है।

भारत सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य क्यों नहीं है?
भारत जैसे विशाल और प्रभावशाली देश का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य न होना आज के समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी बहस का विषय है। दुनिया भर के तमाम मंचों और रेडिट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के एशिया केंद्रित फ़ोरम पर यह सवाल लगातार उठता रहता है कि आख़िर भारत इसका स्थायी हिस्सा क्यों नहीं है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अब तक दुनिया काफ़ी बदल चुकी है लेकिन सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता आज भी उन्हीं पाँच देशों तक सीमित है। इस मुद्दे पर वैश्विक कूटनीति में लगातार चर्चा होती रहती है और भारत की दावेदारी को लेकर विभिन्न देशों और जानकारों के बीच एक लंबी बहस जारी है।
दुनिया के कितने देश संयुक्त राष्ट्र का हिस्सा हैं और कौन बाहर है?
इस समय दुनिया भर के एक सौ पचानवे देश संयुक्त राष्ट्र के दायरे में गिने जाते हैं। इनमें से एक सौ तिरानवे देश इसके पूर्ण सदस्य हैं जबकि दो देशों को स्थायी ग़ैर-सदस्य पर्यवेक्षक का दर्जा मिला हुआ है। ये दो देश वेटिकन सिटी और फ़िलिस्तीन हैं। पर्यवेक्षक होने के नाते वे महासभा की बैठकों में हिस्सा ले सकते हैं लेकिन उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं है। वेटिकन सिटी दुनिया का इकलौता ऐसा आज़ाद देश है जिसने ख़ुद ही पूर्ण सदस्य बनने के लिए आवेदन नहीं किया क्योंकि वहां के सर्वोच्च धर्मगुरु पोप अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सीधा दख़ल नहीं देना चाहते। दूसरी तरफ़ फ़िलिस्तीन को एक सौ अड़तीस देशों ने संप्रभु राष्ट्र माना है लेकिन इज़रायल के साथ चल रहे विवाद के कारण अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश उसे पूर्ण सदस्य बनने से रोकते हैं। इनके अलावा ताइवान, कोसोवो और पश्चिमी सहारा जैसे कई इलाक़े हैं जो पूर्ण देश की मान्यता पाना चाहते हैं। ताइवान तो शुरुआत में संस्थापक सदस्य था लेकिन चीन में हुए गृह युद्ध के बाद जब वहाँ कम्युनिस्ट सरकार आई तो संयुक्त राष्ट्र ने पुरानी सरकार को निकालकर नई चीनी सरकार को मान्यता दे दी। अब चीन अपने वीटो की ताक़त से ताइवान को कभी सदस्य नहीं बनने देता। किसी भी नए देश को सदस्य बनने के लिए सुरक्षा परिषद के पाँचों स्थायी सदस्यों की सहमति और फिर महासभा में दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होती है।

इस विशाल वैश्विक संस्था को पैसा कहाँ से मिलता है?
संयुक्त राष्ट्र को चलाने का ज़्यादातर ख़र्च इसके एक सौ तिरानवे सदस्य देश उठाते हैं। संस्था के मुख्य रूप से दो बजट होते हैं जिनमें एक नियमित बजट है और दूसरा शांति स्थापना बजट है। हर देश को कितना पैसा देना है यह उसकी भुगतान क्षमता के आधार पर तय होता है। इसके लिए उस देश की कुल राष्ट्रीय आय, जनसंख्या और बाहरी कर्ज़ जैसे आँकड़े देखे जाते हैं। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है इसलिए वह सबसे ज़्यादा बाइस प्रतिशत पैसा देता है जो कि लगभग अस्सी करोड़ डॉलर से ज़्यादा बैठता है। इसके बाद चीन बीस प्रतिशत और जापान लगभग सात प्रतिशत का योगदान देते हैं। शांति स्थापना के काम में भी अमेरिका छब्बीस प्रतिशत से ज़्यादा का ख़र्च उठाता है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि कई देश समय पर पैसा नहीं चुकाते। इस साल के शुरुआती आँकड़ों के मुताबिक़ बानवे देशों ने अपना पूरा बकाया नहीं चुकाया है। अमेरिका पर ख़ुद डेढ़ अरब डॉलर का भारी बकाया है और चीन पर भी लगभग साठ करोड़ डॉलर का कर्ज़ है। अगर कोई देश लगातार दो साल तक अपना ज़रूरी बकाया नहीं चुकाता है तो संयुक्त राष्ट्र महासभा में उसका वोट देने का अधिकार छीना जा सकता है। अफ़ग़ानिस्तान और वेनेज़ुएला जैसे देशों को ऐसी ही कार्रवाई का सामना करना पड़ा है।
अमेरिका को अपने यहाँ मुख्यालय होने का क्या फ़ायदा मिलता है?
साल 1946 में संयुक्त राष्ट्र ने अपने मुख्यालय के लिए अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर को चुना था। बहुत से अमेरिकियों को लगता है कि उनके देश का पैसा इस वैश्विक संस्था पर बेवज़ह ख़र्च हो रहा है और इसीलिए वहाँ की सरकार भी कई बार बजट में कटौती की बात करती है। लेकिन मुख्यालय का अमेरिका में होना उसके लिए एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो दुनिया के किसी और देश के पास नहीं है। हर साल होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में दुनिया भर के नेता और बड़े अधिकारी न्यूयॉर्क आते हैं। इन विदेशी प्रतिनिधियों के बच्चे अमेरिका में पढ़ाई करते हैं और छुट्टियाँ बिताते हैं जिससे अमेरिका का कूटनीतिक दबदबा बढ़ता है। साल 2009 में विकीलीक्स के दस्तावेज़ों से यह बात सामने आई थी कि यह मुख्यालय अमेरिका के लिए दुनिया भर की ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने का एक बहुत बड़ा केंद्र है। इसके अलावा वीज़ा जारी करने का अधिकार अमेरिका के पास है। वह कई बार इसका इस्तेमाल अपने राजनीतिक मक़सद के लिए करता है। हाल ही में अमेरिका ने फ़िलिस्तीन के प्रतिनिधिमंडल को वीज़ा न देने की धमकी दी थी। अगर अमेरिका अपने बजट में कटौती करता है या पीछे हटता है तो चीन जैसे देश इस ख़ाली जगह को भरने के लिए पूरी तरह तैयार बैठे हैं। जानकार मानते हैं कि अगर अमेरिका से यह संस्था किसी और देश में चली गई तो अमेरिका दुनिया के एजेंडे को तय करने की अपनी सबसे बड़ी ताक़त खो देगा।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/ybhgprqy
2. https://tinyurl.com/255f3fy7
3. https://tinyurl.com/28n22sh3
4. https://tinyurl.com/2d5hlhdt
5. https://tinyurl.com/2at2pq5z
6. https://tinyurl.com/225xx2zo
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