हमारे कृषि प्रधान राज्य में, उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के खिलाफ क्या हो सकते हैं समाधान?

भूमि और मिट्टी के प्रकार : कृषि योग्य, बंजर, मैदान
19-05-2026 10:18 AM
हमारे कृषि प्रधान राज्य में, उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के खिलाफ क्या हो सकते हैं समाधान?

चलिए, आज समझते हैं कि ‘उर्वरक’ क्या हैं, और कृषि में उनकी क्या भूमिका है। फिर, हम देखेंगे कि उनका उत्पादन तेल और गैस उद्योग से कैसे जुड़ा है। लेख में आगे, हम पता लगाएंगे कि वैश्विक तेल संकट के दौरान उर्वरकों की कीमतें क्यों बढ़ती हैं। जबकि, अंत में हम टिकाऊ उर्वरक विकल्पों और नई प्रौद्योगिकियों की जांच करेंगे, जो जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता को कम करती हैं।

हमारे भारतवर्ष में, मिट्टी के प्रकार और मौसम की स्थिति के आधार पर विविध फसलों की खेती की जाती है। पिछले कुछ वर्षों में विविध फसल पैटर्न और पोषक तत्वों की बढ़ती मांग के कारण, खेती में उर्वरकों के इस्तेमाल में काफी वृद्धि हुई है। प्रत्येक फसल के स्वस्थ विकास के लिए उर्वरक की आवश्यकता होती है, क्योंकि यह उन्हें आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है।

दरअसल, ‘उर्वरक’ वे कार्बनिक या अकार्बनिक पदार्थ होते हैं, जो फसलों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं। आम तौर पर, वे दानेदार या तरल होते हैं। अधिकांश उर्वरकों में तीन प्राथमिक मैक्रोन्यूट्रिएंट्स (Macronutrients) होते हैं: नाइट्रोजन (Nitrogen), फास्फोरस (Phosphorus), और पोटेशियम (Potassium)। इन्हें आमतौर पर एनपीके (NPK) उर्वरक के रूप में जाना जाता है। ये पोषक तत्व पौधों की वृद्धि और विकास में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

जब फसलें बढ़ती हैं, तो वे मिट्टी से पोषक तत्व अवशोषित करती हैं। समय के साथ, मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, और मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है। उर्वरक इन पोषक तत्वों को प्रदान करने में मदद करते हैं। इसलिए पौधों को वे पोषक तत्व मिलते हैं, जो मिट्टी अकेले प्रदान नहीं कर सकती।

भारतीय फसलों में, उर्वरक ‘वृद्धि वर्धक’ के रूप में कार्य करते हैं। ऊर्वरकों से प्राप्त पोषक तत्व जड़ों की मदद से पौधे के सभी भागों में जाते हैं। तब, पोटेशियम पौधे के तने को मजबूत करता है, और अनाज की गुणवत्ता में सुधार करता है। नाइट्रोजन पत्तियों को हरा-भरा बनाता है, और जीवंत रखता है। जबकि, फॉस्फोरस मजबूत जड़ विकास को बढ़ावा देता है। आम तौर पर, ये तत्व पौधों के चयापचय कार्यों को बेहतर बनाने और तेज विकास को बढ़ावा देने के लिए मिलकर काम करते हैं।

नाइट्रोजन उर्वरक, वैश्विक कृषि उत्पादकता की रीढ़ बने हुए हैं, और यूरिया (Urea) उनमें से  सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला नाइट्रोजन उर्वरक है। लगभग 46 % नाइट्रोजन सामग्री के साथ, यूरिया गेहूं, चावल, मक्का और कई बागवानी फसलों को नाइट्रोजन की आपूर्ति करता है। हालांकि, प्रत्येक टन यूरिया के पीछे एक अत्यधिक ऊर्जा-गहन औद्योगिक प्रक्रिया निहित है। यूरिया का उत्पादन काफी हद तक प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है। प्राकृतिक गैस,यूरिया उत्पादन में रासायनिक  सामग्री और ऊर्जा स्रोत के रूप में कार्य करता है। जिन देशों में देशज गैस उत्पादन सीमित है, वहां उर्वरक विनिर्माण को बनाए रखने के लिए तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी - LNG) आवश्यक हो जाती है। प्राकृतिक गैस और उर्वरकों के बीच इस संबंध का मतलब है कि, वैश्विक ऊर्जा बाजार हमेशा ही उर्वरक उपलब्धता, उत्पादन लागत और अंततः खाद्य सुरक्षा को सीधे प्रभावित करते हैं।

यूरिया का उत्पादन अमोनिया (Ammonia) के निर्माण से शुरू होता है, जो सभी नाइट्रोजन उर्वरकों का मूलभूत निर्माण घटक है। अमोनिया का उत्पादन, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन का उपयोग करके किया जाता है। नाइट्रोजन हवा से आसानी से उपलब्ध होता है, लेकिन हाइड्रोजन का उत्पादन औद्योगिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है।

आधुनिक उर्वरक संयंत्रों में हाइड्रोजन, मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस से निकाला जाता है, क्योंकि उसमें मुख्य रूप से मीथेन (CH₄) गैस होता है। उत्पादन के पहले चरण में, प्राकृतिक गैस की लगभग 800-900 डिग्री सेल्सियस पर भाप के साथ प्रक्रिया की जाती है। इस प्रक्रिया में हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड (Carbon monoxide) उत्पन्न होते हैं। फिर कार्बन मोनोऑक्साइड को एक अन्य प्रतिक्रिया के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित किया जाता है। इस प्रक्रिया में फिर से अतिरिक्त हाइड्रोजन उत्पन्न होता है।

एक बार हाइड्रोजन का उत्पादन होने के बाद, इसे हेबर-बॉश प्रक्रिया (Haber–Bosch process) में नाइट्रोजन के साथ जोड़ा जाता है। इस चरण में, नाइट्रोजन और हाइड्रोजन अत्यधिक उच्च दबाव और तापमान में प्रक्रिया करके अमोनिया (NH₃) बनाते हैं। अमोनिया का उपयोग उर्वरक के रूप में किया जा सकता है, लेकिन इसका सुरक्षित रूप से भंडारण और परिवहन करना मुश्किल है। इसलिए, अधिकांश अमोनिया यूरिया में परिवर्तित किया जाता है।

इस प्रकार, प्रक्रिया के अंतिम चरण में, संयंत्र में पहले उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके अमोनिया को यूरिया में परिवर्तित किया जाता है। दरअसल, पहले अमोनिया और कार्बन डाइऑक्साइड प्रतिक्रिया करके अमोनियम कार्बामेट (Ammonium carbamate) बनाते हैं। यह मध्यवर्ती यौगिक, फिर यूरिया और पानी में विघटित हो जाता है। 

इसी जटिल प्रक्रिया के कारण, प्राकृतिक गैस महत्वपूर्ण हो जाती है। होर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है, जहां से लगभग एक चौथाई समुद्री तेल, तरलीकृत प्राकृतिक गैस और उर्वरकों की महत्वपूर्ण मात्रा का वहन होता है। हाल ही में बढ़े वैश्विक संघर्ष के बाद से, इस जलसंधि के माध्यम से होने वाले नौ-परिवहन में काफी गिरावट आई है। ऊर्जा बाज़ारों में इसका परिणाम दिखने लगा है। तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। और जैसे ही गैस की कीमतें बढ़ती हैं, उर्वरक उत्पादन लागत बढ़ जाती है, जिससे उनकी भी कीमतें उच्च हो जाती हैं। नतीजतन, नाइट्रोजन-आधारित उर्वरकों की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, क्योंकि उनके उत्पादन में प्राकृतिक गैस महत्वपूर्ण है।

बढ़ती कीमतें, मिट्टी के स्वास्थ्य, पानी की गुणवत्ता और पारिस्थितिकी तंत्र पर  संभावित प्रतिकूल प्रभावों के कारण, आज रासायनिक उर्वरकों का उपयोग जांच के दायरे में आ गया है। सौभाग्य से, रासायनिक उर्वरकों के कई पर्यावरण-अनुकूल विकल्प हैं, जो मिट्टी की उर्वरता को बढ़ावा देते हैं, पौधों के विकास में सहायता करते हैं, और टिकाऊ एवं धारणीय कृषि पद्धतियों में योगदान करते हैं। ये विकल्प निम्नलिखित हैं -

1. खाद और जैविक पदार्थ
कम्पोस्ट (Compost) या "काला सोना", हमारी रसोई एवं आंगन अपशिष्ट और पौधों के अवशेषों जैसे विघटित कार्बनिक पदार्थों से बनता है। यह आवश्यक पोषक तत्वों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों से भरपूर होता है, तथा मिट्टी की संरचना में सुधार करता है। जैविक कचरे को पुनर्चक्रित करके और उसे मिट्टी में लौटाकर खाद बनाने से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो जाती है।

2. हरी खाद और आवरण फसलें
आवरण फसलें (Cover crops), जिन्हें हरी खाद के रूप में भी जाना जाता है, मिट्टी के स्वास्थ्य और उर्वरता में सुधार के लिए लगाई जाती हैं। फलियां, घास और तिपतिया घास जैसी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ग्रहण करती हैं, तथा खरपतवारों और मिट्टी के कटाव को रोकती हैं। जब ये फसलें विघटित हो जाती हैं, तो वे पोषक तत्व और कार्बनिक पदार्थों से मिट्टी को समृद्ध करती हैं। इस प्रकार, वे मुख्य फसल के विकास में सहायक हैं। 

3. जैवउर्वरक और माइक्रोबियल इनोकुलेंट्स (Microbial Inoculants)
राइजोबियम (rhizobium), माइकोराइजा (mycorrhizae) और नाइट्रोजन-फिक्सिंग बैक्टीरिया (nitrogen-fixing bacteria) जैसे जैव उर्वरक, माइक्रोबियल इनोकुलेंट हैं। ये जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता और पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाते हैं। ये लाभकारी सूक्ष्मजीव, पौधों के साथ सहजीवी संबंध बनाते हैं, पोषक तत्वों के अवशोषण में मदद करते हैं, पौधों के विकास को बढ़ावा देते हैं, और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करते हैं। 

इसके अलावा, अगला बड़ा नवाचार ‘हरित अमोनिया’ का उत्पादन है। यह नाइट्रोजन उर्वरक उत्पादन के लिए कार्बन-मुक्त विकल्प प्रदान करता है, जो टिकाऊ कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हरित अमोनिया का उत्पादन, प्राकृतिक गैस के बजाय पवन, सौर या जलविद्युत ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके किया जाता है। 
सबसे पहले, नवीकरणीय बिजली से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है। फिर, वायु पृथक्करण इकाइयां वायुमंडल से नाइट्रोजन गैस अलग करती हैं। इसके पश्चात, हरित हैबर-बॉश प्रक्रिया में अमोनिया का उत्पादन करने के लिए, उत्प्रेरक का उपयोग करके हाइड्रोजन और नाइट्रोजन को दबाव में संयोजित किया जाता है। यह जीवाश्म ईंधन (प्राकृतिक गैस) के बजाय नवीकरणीय ऊर्जा द्वारा संचालित होता है। 
हरित अमोनिया, पारंपरिक अमोनिया उत्पादन से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को समाप्त करता है, तथा नाइट्रोजन उर्वरक के लिए एक स्वच्छ विकल्प प्रदान करता है। साथ ही, यह वैश्विक स्थिरता और जलवायु कार्रवाई लक्ष्यों के साथ संरेखित है।


संदर्भ  
1.    https://tinyurl.com/yzkbr6bb 
2.    https://tinyurl.com/3rtky2e4 
3.    https://tinyurl.com/2wt98vyj 
4.    https://tinyurl.com/5cjehkfw 
5.    https://tinyurl.com/4sjnpfck 
6.    https://tinyurl.com/bd6cpvtb   

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