हाल ही में एमवी होंडियस (MV Hondius) नामक एक क्रूज शिप (cruise ship) पर एक जानलेवा संक्रमण फैलने से पूरी दुनिया के स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ गई हैं। यह क्रूज शिप अर्जेंटीना से केप वर्डे की यात्रा पर था, जहां कई यात्रियों में गंभीर श्वसन संबंधी बीमारियां देखी गईं। जांच में यह बात सामने आई कि यह संक्रमण हंता वायरस के एंडीज स्ट्रेन (Andes strain) के कारण फैला है। इस वायरस की चपेट में आने से एक डच महिला की मृत्यु हो गई, जबकि ब्रिटिश और स्विस यात्री गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हुए। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2025 में ऑस्कर विजेता अभिनेता जीन हैकमैन (Gene Hackman) की पत्नी बेट्सी अराकावा (Betsy Arakawa) का निधन भी इसी वायरस से जुड़ी सांस की बीमारी के कारण हुआ था, जिसके बाद उनके घर के आस-पास चूहों के घोंसले पाए गए थे। इस खतरनाक वायरस ने वैश्विक स्तर पर यह बहस छेड़ दी है कि क्या चूहों से फैलने वाली यह बीमारी एक नई महामारी का रूप ले सकती है।
हंता वायरस क्या है और यह कैसे फैलता है?
हंता वायरस कोई एक अकेला वायरस नहीं है, बल्कि यह वायरसों का एक पूरा समूह है जो मुख्य रूप से चूहों और कृंतकों द्वारा फैलता है। इस वायरस का नाम दक्षिण कोरिया की एक नदी के नाम पर रखा गया है। यह वायरस बुन्याविरालेस ऑर्डर (Order Bunyavirales) के हंताविरिडे फेमिली (Family Hantaviridae) से संबंधित है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जो चूहे इस वायरस को अपने शरीर में लेकर घूमते हैं, वे खुद कभी बीमार नहीं पड़ते। यह वायरस चूहों के मल, मूत्र और लार में मौजूद होता है।

जब चूहे किसी बंद जगह पर मल-मूत्र करते हैं और वह सूख जाता है, तो सफाई करते समय या हवा के झोंके से उसके कण हवा में मिल जाते हैं। जब इंसान इस दूषित हवा में सांस लेता है, तो यह वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसे एरोसोलाइज्ड ट्रांसमिशन (aerosolized transmission) कहा जाता है। इसके अलावा, चूहों द्वारा खाए गए या जूठे किए गए भोजन का सेवन करने, वायरस से दूषित सतहों को छूने के बाद उन्हीं हाथों से अपनी आंख, नाक या मुंह को छूने, या संक्रमित चूहे के काटने और खरोंचने से भी यह संक्रमण इंसानों में फैल सकता है।
क्रूज शिप पर यह आउटब्रेक कैसे हुआ और एंडीज स्ट्रेन क्यों है खतरनाक?
एमवी होंडियस क्रूज शिप का मामला चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यह शिप एक अप्रैल 2026 को अर्जेंटीना के उशुआइया से निकला था और पहला मामला छह अप्रैल को सामने आया। चूंकि इस वायरस का इन्क्यूबेशन पीरियड (incubation period) आमतौर पर लंबा होता है, इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि पहले यात्री को यह संक्रमण क्रूज पर चढ़ने से पहले ही अर्जेंटीना में बर्ड-वाचिंग (पक्षियों को देखने) की किसी गतिविधि के दौरान चूहों के संपर्क में आने से हुआ होगा।
चिंता का असली कारण एंडीज स्ट्रेन है। आमतौर पर हंता वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में नहीं फैलता है। लेकिन दक्षिण अमेरिका (विशेषकर अर्जेंटीना और चिली) में पाया जाने वाला एंडीज स्ट्रेन इसका एकमात्र अपवाद है। जब कोई व्यक्ति इस स्ट्रेन से संक्रमित होता है, तो बहुत करीबी और लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले परिवार के सदस्यों या देखभाल करने वालों में यह वायरस फैल सकता है। क्रूज शिप पर दूसरा मामला पहले मरीज के बेहद करीबी संपर्क वाले व्यक्ति का ही था, जो इस बात का प्रबल संकेत देता है कि यह वायरस इंसान से इंसान में फैला है। इससे पहले 2018 में भी अर्जेंटीना में एक पार्टी के दौरान एक ही संक्रमित व्यक्ति से 34 लोग संक्रमित हुए थे, जिनमें से 11 की मौत हो गई थी।
हंता वायरस से संक्रमित होने पर शरीर में क्या लक्षण दिखाई देते हैं?
वायरस के संपर्क में आने और बीमारी के लक्षण दिखने के बीच का समय (इन्क्यूबेशन पीरियड) एक से आठ सप्ताह तक का हो सकता है। यह वायरस दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दो तरह की गंभीर बीमारियां पैदा करता है।
उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में यह हंता वायरस पल्मोनरी सिंड्रोम (Hantavirus Pulmonary Syndrome - एचपीएस) का कारण बनता है। शुरुआती दौर में मरीज को तेज बुखार, सिरदर्द, थकान, ठंड लगना और शरीर की बड़ी मांसपेशियों (जैसे जांघ, कूल्हे और पीठ) में तेज दर्द होता है। कुछ लोगों को पेट दर्द, मतली, उल्टी और डायरिया की शिकायत भी होती है।

चार से दस दिन बीत जाने के बाद, यह बीमारी अपने दूसरे और अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश करती है। वायरस फेफड़ों की छोटी रक्त वाहिकाओं (केपिलरीज - capillaries) पर हमला करता है, जिससे उनमें रिसाव होने लगता है और फेफड़ों में पानी भर जाता है। इसके कारण मरीज को भयानक खांसी आती है, सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई होती है और शरीर में ऑक्सीजन की कमी से उसकी जान जा सकती है। एचपीएस बेहद घातक है और इसमें मृत्यु दर 30 से 50 प्रतिशत तक होती है।
वहीं दूसरी ओर, यूरोप और एशिया में यह वायरस हेमोरेजिक फीवर विद रीनल सिंड्रोम (hemorrhagic fever with renal syndrome - एचएफआरएस) का कारण बनता है। इसमें बुखार, धुंधली दिखाई देना और पीठ दर्द के साथ-साथ गंभीर मामलों में लो ब्लड प्रेशर, आंतरिक रक्तस्राव और एक्यूट किडनी फेलियर (acute kidney failure) की समस्या उत्पन्न हो जाती है। एचएफआरएस में मृत्यु दर आमतौर पर 1 से 15 प्रतिशत के बीच होती है।
जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय बदलाव कैसे बढ़ा रहे हैं इसका खतरा?
शोधकर्ताओं का मानना है कि हंता वायरस जैसे जूनोटिक रोगों (जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियां) के बढ़ने के पीछे जलवायु परिवर्तन और बेतरतीब शहरीकरण एक बहुत बड़ा कारण है। जैसे-जैसे जंगलों की कटाई हो रही है और इंसान कृषि और रिहायशी मकसदों के लिए वन्यजीवों के आवास में अतिक्रमण कर रहा है, इंसानों और चूहों के बीच का संपर्क तेजी से बढ़ रहा है।
तापमान में वृद्धि और अनियमित बारिश के कारण चूहों के खाने की उपलब्धता में बदलाव आता है। जब भोजन प्रचुर मात्रा में होता है, तो चूहों की आबादी में विस्फोट होता है। आबादी बढ़ने पर ये चूहे भोजन और आश्रय की तलाश में इंसानों के घरों, खलिहानों और भंडारण स्थलों में घुस जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे महाद्वीप में जहां अब तक हंता वायरस का कोई मानव मामला दर्ज नहीं किया गया है, वहां भी कुछ चूहों में इसके एंटीबॉडी पाए गए हैं। यह इस बात का संकेत है कि वायरस पर्यावरण में खामोशी से मौजूद है और परिस्थितियां अनुकूल होने पर कभी भी प्रकोप फैला सकता है।
क्या भारत को भी हंता वायरस से सतर्क रहने की आवश्यकता है?
यद्यपि वर्तमान में हंता वायरस का केंद्र दक्षिण अमेरिका और यूरोप रहा है, लेकिन भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए यह एक मूक खतरा बन सकता है। भारत में मानसून के दौरान बाढ़, जलभराव और सीवेज ओवरफ्लो के कारण चूहों का आतंक बढ़ जाता है। मुंबई, दिल्ली और कोलकाता जैसे महानगरों में पुरानी इमारतों, रेलवे नेटवर्क और घनी बस्तियों के कारण इंसानों और चूहों का संपर्क बहुत अधिक है।

भारत में हंता वायरस को लेकर सबसे बड़ी चुनौती इसके लक्षणों का अन्य बीमारियों से मेल खाना है। इसके शुरुआती लक्षण बिल्कुल डेंगू, मलेरिया, लेप्टोस्पायरोसिस (leptospirosis), इन्फ्लूएंजा (influenza) और वायरल बुखार जैसे होते हैं। इस कारण अधिकांश डॉक्टर प्रारंभिक जांच में हंता वायरस पर संदेह ही नहीं करते। अतीत में दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में हंता वायरस के एंटीबॉडी और संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (Indian Council of Medical Research - आईसीएमआर) ने कोविड-19 के बाद अपनी निगरानी प्रणाली को मजबूत किया है, लेकिन ग्रामीण और छोटे शहरों के अस्पतालों में अभी भी इस दुर्लभ बीमारी की सटीक जांच (आरटी-पीसीआर (RT-PCR)और आईजीएम एंटीबॉडी टेस्ट (IgM Antibody Test)) के लिए बुनियादी ढांचे का अभाव है। यदि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में मौजूद चूहों में इस वायरस का प्रसार होता है, तो खराब स्वच्छता और घनी आबादी के कारण यह तेजी से फैल सकता है।
इस जानलेवा वायरस से बचाव और रोकथाम के क्या उपाय हैं?
चूंकि हंता वायरस मुख्य रूप से चूहों से फैलता है, इसलिए उनसे बचाव ही इस बीमारी की सबसे अच्छी रोकथाम है। स्वास्थ्य एजेंसियों द्वारा कुछ सख्त दिशानिर्देश जारी किए गए हैं।
अगर घर, गैराज या गोदाम में चूहों का मल-मूत्र दिखाई दे, तो उसे कभी भी सूखी झाड़ू या वैक्यूम क्लीनर से साफ न करें। ऐसा करने से वायरस हवा में उड़ने लगता है। सफाई से पहले चूहों के मल पर ब्लीच और पानी का घोल (या कोई मजबूत कीटाणुनाशक) छिड़कें और उसे पांच मिनट तक भीगने दें। इसके बाद पेपर टॉवल से पोंछकर उसे कचरे में फेंक दें। सफाई करते समय हमेशा रेस्पिरेटर मास्क और रबर या प्लास्टिक के दस्ताने पहनें। सफाई के बाद हाथों को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोना अनिवार्य है।
घरों में चूहों के प्रवेश को रोकने के लिए दीवारों और दरवाजों के सभी छेदों (एक चौथाई इंच तक के) को स्टील वूल, जाली या सीमेंट से बंद करें। घर के बर्तन तुरंत धोएं और खाने-पीने की चीजों व पालतू जानवरों के भोजन को एयर-टाइट डिब्बों में बंद करके रखें। जिन केबिनों, स्टोरेज शेड या कमरों का लंबे समय से उपयोग नहीं हुआ है, वहां जाने से पहले दरवाजे और खिड़कियां खोलकर आधे घंटे तक ताजी हवा आने दें।
इसके अलावा, गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों (5 वर्ष से कम) और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को पालतू चूहों (पेट रैट्स) से दूर रहना चाहिए। चूहों को पालने वालों को लगातार पिंजरे की सफाई और जानवरों के परीक्षण का ध्यान रखना चाहिए।
क्या हंता वायरस का कोई सटीक इलाज या वैक्सीन उपलब्ध है?
वर्तमान में हंता वायरस संक्रमण के लिए पूरी दुनिया में कोई भी प्रमाणित विशिष्ट एंटीवायरल उपचार या व्यापक रूप से उपलब्ध वैक्सीन नहीं है। इस बीमारी का इलाज मुख्य रूप से लक्षणों के आधार पर (सपोर्टिव केयर) किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति को चूहे वाले वातावरण में रहने के बाद तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ होती है, तो उसे तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए।
अस्पताल में मरीजों को ऑक्सीजन थेरेपी दी जाती है। गंभीर एचपीएस मामलों में मरीजों को इंट्यूबेशन (intubation) या वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ सकती है। वहीं, एचएफआरएस के मरीजों में किडनी फेल होने की स्थिति में डायलिसिस का सहारा लिया जाता है, ताकि शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकाला जा सके और तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखा जा सके। सही समय पर आईसीयू (सघन चिकित्सा कक्ष) में भर्ती होने से मरीज की जान बचने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/25vrvc27
2. https://tinyurl.com/22hl9j78
3. https://tinyurl.com/24fymyog
4. https://tinyurl.com/2486aeho
5. https://tinyurl.com/23tpwyja
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