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लखनऊ, चलिए आज रक्षाबंधन के अवसर पर इस त्योहार के बारे में जानते हैं। संस्कृत शब्द ‘रक्षा बंधन’ का अर्थ, ‘सुरक्षा का एक पावन बंधन’ है। यह आधुनिक त्योहार हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन, आमतौर पर अगस्त के महीने में मनाया जाता है। कई अन्य भारतीय त्योहारों की तरह, रक्षाबंधन की जड़ें भी प्राचीन पौराणिक कथाओं में मिलती हैं, और प्रत्येक कथा इसके अर्थ में एक नई परत जोड़ती है।
रक्षाबंधन को लेकर, श्रीकृष्ण एवं द्रौपदी की कहानी शायद महाभारत की सबसे प्यारी और लोकप्रिय कहानी है। जब युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण की उंगली कट गई, तो द्रौपदी ने बिना एक पल गँवाए अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर, उनकी उंगली पर बाँध दिया। इस भाव से द्रवित होकर कृष्ण ने हमेशा के लिए उनकी रक्षा करने का संकल्प लिया। देखभाल और पारस्परिकता का यह सरल कार्य, आगे चलकर रक्षाबंधन का एक दिव्य रूप बन गया, जिसका जैविक भाई-बहन के रिश्ते से परे प्रेम, निश्छलता और सम्मान से गहरा नाता है।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, मृत्यु के देवता यम एक वर्ष से अधिक समय से अपनी बहन यमुना से मिलने नहीं जा पाए थे। जब वे अंततः उनसे मिलने गए, तो यमुना ने उनकी कलाई पर राखी बाँधी और स्वादिष्ट मिठाइयों से उनका स्वागत किया। इस आत्मीयता से प्रसन्न होकर, यम ने उन्हें अमरता का वरदान दिया और हर वर्ष मिलने आने का संकल्प लिया। इससे रक्षाबंधन पर बहनों से मिलने और इस दिन को केवल राखी बाँधने तक सीमित न रखकर स्नेह का उत्सव बनाने की परंपरा को बढ़ावा मिला।
दूसरी ओर, भविष्य पुराण के अनुसार, देवताओं के राजा इंद्र की पत्नी शची ने युद्ध में जाने से पहले उनकी विजय और सुरक्षा के लिए उनकी कलाई पर एक पवित्र धागा बाँधा था। उस समय इसे ‘राखी’ नहीं कहा जाता था, लेकिन इसके पीछे की भावना अपने प्रिय व्यक्ति को अपनी शुभकामनाओं की ताकत और सुरक्षा का आशीर्वाद देना थी।
रक्षाबंधन केवल पौराणिक कथाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने भारतीय इतिहास में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 16वीं शताब्दी में, जब चित्तौड़गढ़ पर गंभीर खतरा मंडरा रहा था, तब मेवाड़ की साहसी रानी कर्णवती ने अपनी रक्षा की गुहार लगाते हुए मुगल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजी थी। उनके इस निश्छलता भरे भाव से प्रभावित होकर हुमायूँ अपनी सेना के साथ मदद के लिए दौड़ पड़े, भले ही इसके परिणामस्वरूप उन्हें अपने राजनीतिक सहयोगियों के खिलाफ ही क्यों न जाना पड़ा। यह इस बात का एक शक्तिशाली प्रमाण है कि राखी, कैसे धर्म, क्षेत्र और यहाँ तक कि राजनीतिक सीमाओं को भी पार कर सकती है।
यद्यपि रक्षाबंधन से जुड़ी कई लोककथाएँ और दंतकथाएँ प्रचलित हैं, किंतु भविष्य पुराण में उल्लिखित कथा सबसे अधिक प्रामाणिक मानी जाती है। भविष्य पुराण की इस कथा का उल्लेख ‘व्रतराज’ में भी मिलता है। युगों पहले, देवताओं और राक्षसों के बीच एक भीषण युद्ध हुआ था, जो पूरे बारह वर्षों तक चला। अंततः देवता युद्ध हार गए और राक्षसों ने इंद्र के स्वर्गलोक के साथ-साथ तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। तब देवराज इंद्र ने, देवताओं के गुरु बृहस्पति से परामर्श किया। गुरु बृहस्पति ने उन्हें रक्षा विधान का सुझाव दिया और इसके विशेष मंत्र बताए। श्रावण पूर्णिमा के दिन गुरु बृहस्पति ने रक्षा विधान का अनुष्ठान संपन्न किया। इस अनुष्ठान के दौरान रक्षा पोटली को पवित्र मंत्रों से अभिमंत्रित किया गया था। पूजा के पश्चात इंद्र की पत्नी शची ने इंद्र के दाहिने हाथ पर वह रक्षा पोटली बाँध दी। उस रक्षा पोटली की असीम शक्ति के कारण ही इंद्र राक्षसों को पराजित करने और अपना खोया हुआ राज्य वापस पाने में सक्षम हुए। तभी से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन का अनुष्ठान करने की परंपरा चली आ रही है।
आज, हालांकि इस त्योहार ने आधुनिक रूप लिया है। क्या आप जानते हैं कि हमारे शहर लखनऊ की प्रसिद्ध ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करते हुए, शहर के निवासियों ने रक्षाबंधन के पावन पर्व पर सभी सांस्कृतिक और धार्मिक बाधाओं को पार कर आपसी प्रेम का संदेश दिया है। 32 वर्षीय सुमुल सानिया पिछले दो दशकों से अपने पड़ोसी विनय प्रकाश मौर्य को राखी बाँधती आ रही हैं। उनकी माताएँ घनिष्ठ दोस्त थीं और वे इस बात पर विशेष जोर देती थीं कि उनके बच्चों के मन में हमेशा प्रेम और भाईचारे की भावना बनी रहे।

इसी प्रकार, शहर के एक अन्य निवासी अब्दुल सबूर की पत्नी को अपनी एक सहकर्मी में, एक ऐसी बहन मिल गई है, जो पिछले छह वर्षों से लगातार उन्हें राखी बाँधती आ रही है। इसके अलावा, 24 वर्षीय आशीष सिंह की मुलाकात एक संवाद कार्यक्रम के दौरान इरम नाज से हुई थी। वे तब से नाज को अपनी बहन मानते हैं। नाज ने भी इस त्योहार से जुड़ी सभी परंपराओं की पूरी जानकारी हासिल की है ताकि वे इसे पूरी पारंपरिक निष्ठा के साथ मना सकें।
दूसरी ओर, 47 वर्षीय सनोबर, अपनी शादी के बाद से ही अपने पति के दोस्त गौरव सरीन को राखी बांधती आ रही हैं। उनका कोई सगा भाई नहीं है, लेकिन जब भी उन्हें मदद की ज़रूरत होती है, सरीन हमेशा उनके साथ खड़े रहते हैं। जबकि उनके पति मोहम्मद हैदर ने, लखीमपुर खीरी के बौधिया कलां गांव के निवासियों के साथ वर्चुअल (ऑनलाइन) राखी मनाई है। हैदर ने कुछ दशक पहले इस गांव को गोद लिया था और इस गांव के कुछ लोगों के साथ उनके प्यारे संबंध हैं।
रक्षाबंधन के त्योहार की शुरुआत होने से एक महीने पहले ही, बाज़ार रंग-बिरंगी राखियों से गुलज़ार हो जाते हैं। लोग अपने भाइयों और बहनों के लिए फैंसी राखियाँ, प्यार भरे संदेश वाले कार्ड और सार्थक उपहार चुनते हैं। जैसे ही उस दिन सुबह के अनुष्ठान शुरू होते हैं, बहनें आरती करने और अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाने में आगे रहती हैं। इसके बाद, वे अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, जो उसकी समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और समग्र कल्याण के लिए की गई प्रार्थनाओं का एक प्रतीक है। इसके बदले में, भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं और हर परिस्थिति में उनके रक्षक बने रहने का वादा करते हैं। यह दिन हँसी, खुशी और स्नेह के एक सामंजस्यपूर्ण माहौल के साथ आगे बढ़ता है।
भारत में कोई भी उत्सव विशेष व्यंजनों का आनंद लिए बिना पूरा नहीं होता है और रक्षाबंधन इसका कोई अपवाद नहीं है! पारंपरिक मिठाइयां इस आनंदमय अवसर का मुख्य आकर्षण हैं। नारियल और मोतीचूर के स्वादिष्ट लड्डुओं से लेकर खीर, पायसम, घेवर और हलवे की तिकड़ी जैसे प्रत्येक व्यंजन, न केवल हमारी जिव्हा को तृप्त करते हैं, बल्कि भाइयों और बहनों के बीच साझा प्रिय बंधन की अंतर्निहित मिठास का भी प्रतीक है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/4tk9776e
2. https://tinyurl.com/y3s6vjnh
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