क्या आप हिंदू गणित को बचाने में लखनऊ विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक योगदान को जानते हैं?

विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
21-08-2026 09:40 AM
क्या आप हिंदू गणित को बचाने में लखनऊ विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक योगदान को जानते हैं?

महान भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि शुद्ध गणित अपने आप में तार्किक विचारों की कविता है। गणित केवल संख्याओं और गणनाओं का विषय नहीं है, बल्कि यह वह भाषा है जिससे ब्रह्मांड को समझा जा सकता है। इसका इतिहास उन प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ा है, जिन्होंने व्यापार, खगोल विज्ञान और दैनिक जीवन की समस्याओं को सुलझाने के लिए सबसे पहले संख्याओं का प्रयोग किया था। समय के साथ, इस विषय ने दर्शन, तर्कशास्त्र और विज्ञान की नींव रखी।

प्राचीन सभ्यताओं में गणित की शुरुआत कैसे हुई?
गणित का इतिहास हज़ारों साल पुराना है। आधुनिक युग से बहुत पहले, लगभग 3000 ईसा पूर्व में, सुमेर, अक्कद, असीरिया और प्राचीन मिस्र जैसी मेसोपोटामियाई (Mesopotamian) सभ्यताओं ने कराधान, वाणिज्य, व्यापार और खगोलीय रिकॉर्ड रखने के लिए अंकगणित, बीजगणित और ज्यामिति का उपयोग करना शुरू कर दिया था। मेसोपोटामिया और मिस्र से प्राप्त सबसे पुराने ज्ञात गणितीय ग्रंथों में बेबीलोनियन 'प्लिम्पटन 322' (Babylonian ‘Plimpton 322’), मिस्र का 'राइंड मैथमेटिकल पेपिरस' (The Rhind Mathematical Papyrus) और 'मास्को मैथमेटिकल पेपिरस' (The Moscow Mathematical Papyrus) शामिल हैं। इन ग्रंथों में पाइथागोरस ट्रिपल्स (Pythagorean Triples) का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि बुनियादी अंकगणित के बाद पाइथागोरस प्रमेय गणित के सबसे पुराने विकासों में से एक था।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में, प्राचीन यूनानियों ने गणित को एक दार्शनिक और प्रदर्शनकारी अनुशासन के रूप में खड़ा किया। पाइथागोरस ने ज्यामिति की नींव रखी। लगभग 300 ईसा पूर्व में यूक्लिड ने 'एलिमेंट्स' नामक ग्रंथ का संकलन किया, जो दो हज़ार से अधिक वर्षों तक गणित का मानक पाठ्यपुस्तक बना रहा। यूक्लिड को ज्यामिति का पिता भी कहा जाता है। इसी तरह आर्किमिडीज़ (Archimedes) ने भौतिकी और इंटीग्रल कैलकुलस (Integral Calculus) में महान योगदान दिया।

वेदों और प्राचीन भारत में गणित का विकास कैसे हुआ?
भारत में गणित की जड़ें 1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व तक फैले वैदिक काल और उससे भी पहले सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2600 ईसा पूर्व) तक जाती हैं। सिंधु घाटी के लोग व्यापार और निर्माण के लिए बुनियादी संख्याओं और आकारों का उपयोग करते थे। भारत के प्राचीन ज्ञान के स्रोत वेदों में गणितीय सिद्धांतों की गहरी समझ मिलती है। ऋग्वेद में खरबों तक की बड़ी संख्याओं की अवधारणा मौजूद है। यजुर्वेद में ज्यामितीय आकारों, वृत्त की परिधि, वर्ग के विकर्ण और यहां तक कि पाई के मान का भी संदर्भ मिलता है। अथर्ववेद में जोड़, घटाव, गुणा और भाग जैसी गणितीय संक्रियाओं के तरीके शामिल हैं, जिनका उपयोग वैदिक अनुष्ठानों में किया जाता था। शुल्ब सूत्र, जो वेदों के परिशिष्ट हैं, अनुष्ठानों के लिए वेदियों के निर्माण हेतु सटीक ज्यामितीय माप प्रदान करते हैं।

भारतीय गणितज्ञों ने दुनिया को क्या सिखाया?
आधुनिक गणितीय प्रणाली, जिसका हम आज उपयोग करते हैं, उसकी उत्पत्ति प्राचीन भारत में हुई थी। 5वीं शताब्दी में महान भारतीय गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने 'शून्य' की क्रांतिकारी अवधारणा पेश की। अपनी प्रसिद्ध कृति 'आर्यभटीय' में उन्होंने शून्य के लिए एक प्रतीक पेश किया जिसे उन्होंने 'शून्य' कहा जिसका अर्थ था 'खाली'। शून्य के बिना बड़ी संख्याओं को लिखना और समझना असंभव था। आर्यभट्ट ने खगोल विज्ञान और त्रिकोणमिति में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

7वीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त ने गणित में बड़ा बदलाव किया। उन्होंने अपने ग्रंथ 'ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त' में शून्य और ऋणात्मक संख्याओं सहित अंकगणितीय संक्रियाओं के नियम दिए और द्विघात समीकरणों को हल करना सिखाया। मध्ययुगीन काल में, 14वीं से 16वीं शताब्दी के बीच, केरल स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी ने त्रिकोणमिति, बीजगणित और कैलकुलस में उल्लेखनीय प्रगति की। उन्होंने अनंत श्रृंखलाओं के लिए अग्रणी योगदान दिया जिसने आधुनिक कैलकुलस के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आधुनिक युग में, श्रीनिवास रामानुजन जैसे गणितज्ञों ने दुनिया को हैरान कर दिया। रामानुजन ने संख्या सिद्धांत और अनंत श्रृंखलाओं में ऐसे सूत्र दिए जो आज भी दुनिया भर के गणितज्ञों के लिए शोध का विषय हैं। शकुंतला देवी, जिन्हें 'ह्यूमन कंप्यूटर' के नाम से जाना जाता है, ने अपनी अद्भुत मानसिक गणना क्षमताओं से अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की।

वैश्विक स्तर पर आधुनिक गणित ने कैसे आकार लिया?
8वीं से 14वीं शताब्दी के इस्लामी स्वर्ण युग के दौरान, अल-ख्वाज़िमी और इब्न अल-हयथम जैसे गणितज्ञों ने उत्कृष्ट योगदान दिया। अल-ख्वाज़िमी को बीजगणित का पिता माना जाता है। यूरोप में पुनर्जागरण काल के दौरान लियोनार्डो पिसानो (Leonardo Pisano), जिन्हें फाइबोनैचि (Fibonacci) के नाम से जाना जाता है, ने यूरोप में हिंदू-अरबी अंक प्रणाली की शुरुआत की, जिसने गणनाओं में क्रांति ला दी। इसी दौर में जोहान्स केप्लर (Johannes Kepler) ने ग्रहीय गति के नियम दिए। कला के लिए मशहूर लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci) ने भी ज्यामिति और अनुपात पर काम किया।

17वीं शताब्दी में आइजैक न्यूटन और गॉटफ्रीड विल्हेम लाइबनिज़ (Gottfried Wilhelm Leibniz) ने स्वतंत्र रूप से कैलकुलस का विकास किया। न्यूटन के गति और सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण के नियमों ने शास्त्रीय यांत्रिकी को नया रूप दिया। 18वीं और 19वीं शताब्दी में लियोनहार्ड यूलर (Leonhard Euler) और कार्ल फ्रेडरिक गॉस (Carl Friedrich Gauss) जैसे दूरदर्शी गणितज्ञ सामने आए। गॉस ने संख्या सिद्धांत और सांख्यिकी में बड़ा योगदान दिया। 19वीं और 20वीं सदी में जॉर्ज कैंटर (Georg Cantor) ने सेट थ्योरी पेश की, अल्बर्ट आइंस्टीन ने सापेक्षता का सिद्धांत दिया, मैरी कार्टराइट (Mary Cartwright) ने नॉन-लीनियर डिफरेंशियल समीकरणों पर काम किया और एंड्रयू विल्स (Andrew Wiles) ने फर्मा की अंतिम प्रमेय को सिद्ध किया।

'प्रिंसिपिया मैथेमेटिका' ने गणितीय तर्कशास्त्र को कैसे बदला?
गणित और तर्कशास्त्र के दर्शन में 'प्रिंसिपिया मैथेमेटिका' (Principia Mathematica) एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्मारकीय ग्रंथ है। इसे ब्रिटिश दार्शनिकों बर्ट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) और अल्फ्रेड नॉर्थ व्हाइटहेड (Alfred North Whitehead) द्वारा लिखा गया था और 1910 से 1913 के बीच तीन खंडों में प्रकाशित किया गया। इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य गणित की तार्किक नींव को उजागर करना था। इसे 'लॉजिज़्म' (Logism) कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि गणित को पूरी तरह से शुद्ध तर्क के आधार पर सिद्ध किया जा सकता है।

रसेल ने अपनी पिछली पुस्तक 'द प्रिंसिपल्स ऑफ मैथमेटिक्स' (The Principles of Mathematics) में तर्क दिया था कि संपूर्ण गणित को कुछ सरल स्वयंसिद्धों से प्राप्त किया जा सकता है, जो संख्या जैसी गणितीय धारणाओं के बजाय विशुद्ध रूप से तार्किक धारणाओं तक सीमित हों। बाद में रसेल को पता चला कि जर्मन गणितज्ञ गॉटलोब फ्रेगे (Gottlob Frege) ने अपनी पुस्तक 'द फाउंडेशंस ऑफ अरिथमेटिक' (The Foundations of Arithmetic) में उनसे पहले ही ऐसी कई खोजें कर ली थीं।

वर्ष 1901 में रसेल ने तर्क प्रणाली के केंद्र में एक विरोधाभास की खोज की, जिसे अब ‘रसेल्स पैराडॉक्स’ (Russell's Paradox) के रूप में जाना जाता है। यह विरोधाभास तब उत्पन्न होता है जब हम उन सभी वर्गों का एक वर्ग बनाते हैं जो स्वयं के सदस्य नहीं हैं। यदि हम पूछें कि क्या यह वर्ग स्वयं का सदस्य है, तो एक विरोधाभास पैदा होता है। यदि यह है, तो यह नहीं है, और यदि यह नहीं है, तो यह है। यह वैसा ही है जैसे किसी गांव के नाई को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जाए जो उन सभी की दाढ़ी बनाता है जो खुद अपनी दाढ़ी नहीं बनाते। अब सवाल यह है कि क्या नाई खुद अपनी दाढ़ी बनाता है?

इस विरोधाभास को दूर करने के लिए, रसेल ने 'थ्योरी ऑफ टाइप्स' (Theory of Types) की अवधारणा पेश की। इसमें रसेल और व्हाइटहेड ने 'एक्सिओम ऑफ रिड्यूसिबिलिटी' (Axiom of Reducibility) और 'एक्सिओम ऑफ इन्फिनिटी' (Axiom of Infinity) जैसे विशेष स्वयंसिद्धों को शामिल किया। यद्यपि यह सिद्धांत बहुत जटिल था, लेकिन इसने गणितीय तर्कशास्त्र और गणित के दर्शन के विकास पर अत्यधिक प्रभाव डाला। दर्शनशास्त्र में इस पुस्तक का सबसे बड़ा प्रभाव रसेल की 'थ्योरी ऑफ डिस्क्रिप्शंस' (Theory of Descriptions) के माध्यम से पड़ा, जिसने सामान्य भाषा की व्याकरणिक संरचनाओं और तार्किक रूपों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। ऑस्ट्रियाई गणितज्ञ कर्ट गोडेल (Kurt Gödel) का अपूर्णता प्रमेय भी इसी ग्रंथ के अध्ययन का परिणाम था।

हिंदू गणित के संरक्षण में लखनऊ विश्वविद्यालय की क्या भूमिका है?
गणित के क्षेत्र में विशेष रूप से 'हिंदू गणित' के संवर्धन में लखनऊ विश्वविद्यालय के गणित और खगोल विज्ञान विभाग का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। यह विभाग 1921 में तब अस्तित्व में आया जब तत्कालीन कैनिंग कॉलेज (Canning College) को नवगठित लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा अपने अधिकार में लिया गया था। शुरुआती दौर में प्रोफ़ेसर जे.ए. स्ट्रैंग (J. A. Strang) के नेतृत्व में विभाग ने अपने पाठ्यक्रमों को मजबूत किया।

लगभग एक दशक बाद, विभाग के अगले प्रमुख प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह ने अपने गहन पाण्डित्य और योजना के साथ 1939 में 'हिंदू गणित' पर शोध के लिए एक विशेष अनुभाग शुरू किया। यह उत्तरी भारत में अपनी तरह का एकमात्र केंद्र था, जिसे बाद में 1950 में 'भारत गणित परिषद' का नाम दिया गया। प्रोफ़ेसर सिंह का मानना था कि प्राचीन हिंदू गणितज्ञों की उपलब्धियों को दुनिया के सामने लाने के लिए अज्ञात पांडुलिपियों पर व्यापक शोध आवश्यक है। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर बी.बी. दत्ता के साथ मिलकर 1935 में 'हिस्ट्री ऑफ हिंदू मैथमेटिक्स' नामक दो खंडों वाली पुस्तक लिखी, जिसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली और आज भी इसे एक प्रामाणिक स्रोत पुस्तक माना जाता है।

लखनऊ विश्वविद्यालय

वर्ष 1939 में, उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंदू गणित और खगोल विज्ञान से संबंधित पुराने ग्रंथों को एकत्र करने, संपादित करने, अनुवाद करने और उनकी व्याख्या करने के उद्देश्य से प्रोफ़ेसर सिंह के अधीन एक शोध योजना को मंजूरी दी। भारत भर से, राजस्थान, बंगाल, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, नेपाल और यहां तक कि लंदन के इंडिया ऑफिस से दुर्लभ पांडुलिपियां खोजी गईं। प्रोफ़ेसर सिंह ने स्वयं 58 पांडुलिपियों की प्रतियां प्राप्त कीं। 1947 में उन्होंने लघु भास्करीय और पाटीगणित के अंग्रेजी अनुवाद के साथ व्याख्यात्मक संस्करण प्रकाशित किए।

विभाग ने बुनियादी ढांचे में भी ऐतिहासिक विकास किया। 1949 में खगोल विज्ञान के शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए भारत के पहले प्लैनेटेरियम (Planetarium) का निर्माण इसी विभाग में पूरा किया गया था। 1950 में प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह ने विज्ञान संकाय के डीन के रूप में विभाग के वर्तमान भवन का निर्माण कराया। 1954 में प्रोफ़ेसर राम वल्लभ ने विभागाध्यक्ष का पदभार संभाला और 1956 में सांख्यिकी अनुभाग के लिए एक नया ब्लॉक बनवाया। आज विभाग की कंप्यूटर लैब का नाम प्रोफ़ेसर राम वल्लभ के नाम पर और विशाल पुस्तकालय का नाम प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह के नाम पर है।

प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह के निधन के बाद, उनके सच्चे उत्तराधिकारी प्रोफ़ेसर के.एस. शुक्ला ने उनके अधूरे काम को आगे बढ़ाया और मार्कंडेय मिश्रा जैसे विद्वानों की मदद से सूर्य सिद्धांत, महा भास्करीय और कर्ण-रत्न जैसी पांडुलिपियों को अंग्रेजी अनुवाद और टिप्पणियों के साथ प्रकाशित किया। विभाग ने प्रोफ़ेसर आर.पी. अग्रवाल, प्रोफ़ेसर एम.डी. उपाध्याय और कई अन्य महान शिक्षाविदों के नेतृत्व में निरंतर प्रगति की है। आज भी यह विभाग प्राचीन भारतीय गणितीय विरासत को सहेजने और आधुनिक गणित के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित करने का कार्य पूरी निष्ठा के साथ कर रहा है।

संदर्भ

1. https://tinyurl.com/26pyujld 

2. https://tinyurl.com/2h98vg34 

3. https://tinyurl.com/2ymxa34b 

4. https://tinyurl.com/25dfl3qw 

5. https://tinyurl.com/y7kgo7aj 

6. https://tinyurl.com/24vybg3h 

Definitions of the Post Viewership Metrics

A. City Readerships (FB + App) - This is the total number of city-based unique readers who reached this specific post from the Prarang Hindi FB page and the Prarang App.

B. Website (Google + Direct) - This is the Total viewership of readers who reached this post directly through their browsers and via Google search.

C. Messaging Subscribers - This is the total viewership from City Portal subscribers who opted for hyperlocal daily messaging and received this post.

D. Total Viewership - This is the Sum of all our readers through FB+App, Website (Google+Direct), Email, WhatsApp, and Instagram who reached this Prarang post/page.

E. The Reach (Viewership) - The reach on the post is updated either on the 6th day from the day of posting or on the completion (Day 31 or 32) of one month from the day of posting.