शिक्षा किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत और व्यावसायिक विकास की सबसे मज़बूत नींव होती है। आज के समय में दुनिया भर के छात्र बेहतरीन अकादमिक प्रशिक्षण प्राप्त करने की आकांक्षा रखते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बजाय विदेशों में पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई है। राजधानी लखनऊ सहित देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों से युवा अब अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार अपने सपनों की उड़ान भर रहे हैं। यह एक ऐसा चलन है जो बेहतर अकादमिक अवसरों, वैश्विक एक्सपोज़र, उन्नत शोध सुविधाओं और शानदार करियर संभावनाओं के कारण लगातार गति पकड़ रहा है।
क्या कह रहे हैं विदेश जाने वाले छात्रों के ताज़ा आँकड़े?
भारतीय छात्रों का विदेश जाने का यह चलन केवल एक मामूली बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक बूम है। भारत सरकार के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या महज़ 2,60,000 थी। वर्ष 2022 में यह संख्या बढ़कर 7,52,000 हो गई और 2023 में यह लगभग 8,95,000 तक पहुँच गई। 2025 की शुरुआत तक कुल 18 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यह आँकड़ा भारतीय छात्रों और उनके परिवारों की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं और बदलती प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। सबसे अधिक छात्र विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग, गणित और बिज़नेस प्रबंधन की पढ़ाई के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे देशों का चुनाव कर रहे हैं।
भारतीय छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों को क्यों चुन रहे हैं?
विदेशी विश्वविद्यालयों को चुनने का सबसे बड़ा कारण वहाँ की शिक्षा की उच्च गुणवत्ता है। अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों के शीर्ष विश्वविद्यालय विश्वस्तरीय फैकल्टी, उन्नत पाठ्यक्रम और शानदार शोध सुविधाएँ प्रदान करते हैं। इसके विपरीत, भारत में प्रतिष्ठित संस्थान होने के बावजूद, कई विश्वविद्यालय आज भी पुराने पाठ्यक्रम, नवाचार की कमी और ऐसी परीक्षा प्रणाली से जूझ रहे हैं जो व्यावहारिक ज्ञान के बजाय रटने पर ज़ोर देती है।
शोध और विकास के क्षेत्र में भी विदेशी देश काफी आगे हैं। अमेरिका और जर्मनी जैसे देश शोध पर अपनी जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं, जबकि भारत का शोध बजट इसके मुक़ाबले काफी कम है। भारतीय विश्वविद्यालयों में अक्सर लालफीताशाही, सीमित फंडिंग और बुनियादी ढाँचे की कमी के कारण शोध कार्य प्रभावित होते हैं। इसके अलावा, विदेशी विश्वविद्यालयों में छात्रों को अपनी रुचि के अनुसार विषय चुनने की पूरी आज़ादी होती है। वहां का पाठ्यक्रम लचीला होता है, जो छात्रों की रचनात्मकता को बढ़ावा देता है। भारत में शिक्षा प्रणाली अक्सर कठोर होती है, जहाँ छात्रों को अपने मुख्य क्षेत्र से हटकर अन्य विषय पढ़ने की ज़्यादा छूट नहीं मिलती।
क्या भारत के शीर्ष संस्थानों में सीटों की कमी एक बड़ा कारण है?
भारत में आईआईटी, आईआईएम और एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थान मौजूद हैं, लेकिन इनमें प्रवेश पाना किसी लोहे के चने चबाने से कम नहीं है। सीटों की भारी कमी और बढ़ती प्रतिस्पर्धा छात्रों के लिए एक बड़ा तनाव बन चुकी है। वर्ष 2024 के आँकड़ों पर नज़र डालें तो लगभग एक लाख अस्सी हज़ार छात्रों ने परीक्षा दी, जिनमें से अड़तालीस हज़ार से अधिक छात्रों ने जेईई एडवांस पास किया। लेकिन पूरे देश के तेईस आईआईटी में केवल सत्रह हज़ार सात सौ चालीस सीटें ही उपलब्ध थीं। इसका मतलब है कि हर एक सीट के लिए कई योग्य उम्मीदवार कतार में थे।

यही हाल आईआईएम का भी है। कैट परीक्षा में बैठने वाले दो लाख से अधिक छात्रों के लिए सभी आईआईएम को मिलाकर केवल पचपन सौ सीटें ही मौजूद होती हैं। कई शीर्ष संस्थानों में तो स्वीकृति दर एक प्रतिशत से भी कम है। इस भयंकर प्रतिस्पर्धा के कारण योग्य छात्र भी प्रवेश पाने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में विदेशों में शिक्षा प्राप्त करना एक पारदर्शी और सुलभ विकल्प बन जाता है। विदेशी संस्थानों में न केवल पर्याप्त सीटें होती हैं, बल्कि उनकी प्रवेश प्रक्रिया भी केवल अंकों पर निर्भर न होकर छात्र के संपूर्ण व्यक्तित्व, साक्षात्कार और अतिरिक्त गतिविधियों पर आधारित होती है।
विदेशी शिक्षा प्रणाली भारतीय प्रणाली से कैसे अलग है?
विदेशी शिक्षा, विशेष रूप से अमेरिकी और यूरोपीय शिक्षा मॉडल, भारतीय रट्टा-मार प्रणाली से बिल्कुल अलग है। वहाँ थ्योरी से ज़्यादा प्रायोगिक शिक्षा पर ज़ोर दिया जाता है। अमेरिकी शिक्षा मॉडल में छात्रों को किसी एक विषय में विशेषज्ञता हासिल करने से पहले कई अलग-अलग विषयों को एक्सप्लोर करने का मौका दिया जाता है।
कक्षाओं में केवल निष्क्रिय रूप से बैठकर लेक्चर सुनने के बजाय केस स्टडी, इंटर्नशिप, लाइव प्रोजेक्ट और सामुदायिक असाइनमेंट पर काम करवाया जाता है। छात्र का मूल्यांकन किसी एक अंतिम परीक्षा के आधार पर नहीं होता, बल्कि पूरे सेमेस्टर के दौरान उसकी भागीदारी, प्रेजेंटेशन और प्रोजेक्ट्स के आधार पर होता है। इसके अलावा, एक अंतरराष्ट्रीय कक्षा में पढ़ाई करने से छात्रों को विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के साथ संवाद करने का मौका मिलता है। इससे उनका वैश्विक नज़रिया विकसित होता है और वे वास्तविक दुनिया की समस्याओं को सुलझाने के लिए बेहतर तरीके से तैयार होते हैं।
क्या विदेशों में पढ़ाई करने के बाद बेहतर करियर विकल्प मिलते हैं?
यह एक स्थापित तथ्य है कि एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय से डिग्री हासिल करने वाले छात्र की नौकरी पाने की संभावना काफी बढ़ जाती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता देती हैं जिनके पास अंतरराष्ट्रीय अनुभव और विविध कौशल होते हैं। ग्लोबल मोबिलिटी डेटा के अनुसार, विदेशी विश्वविद्यालयों से स्नातक करने वाले भारतीय छात्रों का शुरुआती वेतन भारतीय संस्थानों से पढ़े छात्रों की तुलना में काफी अधिक होता है।
उदाहरण के लिए, अमेरिका में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर का शुरुआती वेतन औसतन तिरासी लाख से लेकर सवा करोड़ रुपये सालाना तक हो सकता है। इसके अलावा, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे देश पढ़ाई के बाद एक से तीन साल तक का वर्क वीज़ा देते हैं। ब्रिटेन के ग्रेजुएट रूट और कनाडा के एक्सप्रेस एंट्री जैसे विकल्पों के ज़रिए भारतीय छात्र विदेश में काम करने का अनुभव हासिल करते हैं और धीरे-धीरे स्थायी निवास तक का सफर तय कर लेते हैं।
विदेश में पढ़ाई के दौरान छात्रों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
विदेश में पढ़ाई करना एक शानदार अवसर है, लेकिन यह चुनौतियों से खाली नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय होती है। अमेरिका या ब्रिटेन में ट्यूशन फीस और रहने का खर्च मिलाकर सालाना पंद्रह से चालीस लाख रुपये तक लग सकते हैं। हालांकि जर्मनी जैसे देशों में पब्लिक विश्वविद्यालयों में ट्यूशन फीस न के बराबर है, फिर भी वीज़ा, यात्रा और स्वास्थ्य बीमा जैसे खर्च बजट को बढ़ा देते हैं।
पैसे के अलावा, छात्रों को भारी भावनात्मक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। परिवार से दूर रहने के कारण होमसिकनेस यानी घर की याद आना एक आम समस्या है। एक बिल्कुल नई संस्कृति, अलग खान-पान, नया मौसम और नए लोगों के बीच तालमेल बिठाना शुरुआत में काफी मुश्किल होता है। वीज़ा नियमों में अचानक होने वाले बदलाव और पार्ट-टाइम नौकरी खोजने का संघर्ष भी छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालता है।
सरकारी स्कॉलरशिप और लोन योजनाएं छात्रों की कैसे मदद कर रही हैं?
विदेश में पढ़ाई का खर्च उठाना हर परिवार के बस की बात नहीं है, लेकिन भारत सरकार की कई स्कॉलरशिप और लोन योजनाओं ने इस राह को आसान बना दिया है। इन योजनाओं के कारण अब होनहार छात्रों को पैसों की कमी के चलते अपने सपने नहीं छोड़ने पड़ते।
भारत सरकार की नेशनल ओवरसीज स्कॉलरशिप एक ऐसी ही प्रमुख योजना है, जो अनुसूचित जाति, घुमंतू जनजातियों और भूमिहीन खेतिहर मज़दूरों के बच्चों को विदेशों में मास्टर डिग्री या पीएचडी करने के लिए दी जाती है। इसमें ट्यूशन फीस से लेकर रहने का खर्च, हवाई किराया और बीमा तक सब कुछ कवर किया जाता है। इसी तरह डॉक्टर अंबेडकर ब्याज सब्सिडी योजना अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के छात्रों के लिए है। इस योजना के तहत सरकार छात्र द्वारा लिए गए एजुकेशन लोन पर पढ़ाई की अवधि के दौरान लगने वाले ब्याज का भुगतान करती है।
अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों के लिए पढ़ो परदेस योजना चलाई जाती है, जो एजुकेशन लोन पर ब्याज सब्सिडी प्रदान करती है। इसके अलावा जेएन टाटा एंडोमेंट लोन और फुलब्राइट-नेहरू फेलोशिप जैसी योजनाएं भी मेधावी छात्रों को आर्थिक सहायता प्रदान करती हैं। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद भी कई तरह के सांस्कृतिक और शैक्षिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों के तहत छात्रों की मदद करती है।

इन स्कॉलरशिप को पाने के लिए छात्रों को बहुत पहले से तैयारी करनी होती है। सही विश्वविद्यालय का चुनाव, एक मज़बूत स्टेटमेंट ऑफ पर्पस लिखना और समय सीमा के भीतर आवेदन करना बहुत ज़रूरी होता है। आज कई संस्थान और कंसल्टेंसी भी छात्रों को इन स्कॉलरशिप को हासिल करने में पूरी मदद कर रहे हैं।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि भारतीय छात्रों का विदेश जाने का यह रुझान तब तक जारी रहेगा जब तक भारतीय शिक्षा प्रणाली में बुनियादी और ढाँचागत सुधार नहीं किए जाते। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस भारत में खोलने और शिक्षा बजट बढ़ाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। यदि ये सुधार ज़मीनी स्तर पर सफल होते हैं, तो भविष्य में भारत भी शिक्षा के एक बड़े वैश्विक केंद्र के रूप में उभर सकता है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2y4swa8w
2. https://tinyurl.com/2ywacp3x
3. https://tinyurl.com/yre7y42q
4. https://tinyurl.com/26epvdwq
5. https://tinyurl.com/23hpxs46
6. https://tinyurl.com/2cfn55up
A. City Readerships (FB + App) - This is the total number of city-based unique readers who reached this specific post from the Prarang Hindi FB page and the Prarang App.
B. Website (Google + Direct) - This is the Total viewership of readers who reached this post directly through their browsers and via Google search.
C. Messaging Subscribers - This is the total viewership from City Portal subscribers who opted for hyperlocal daily messaging and received this post.
D. Total Viewership - This is the Sum of all our readers through FB+App, Website (Google+Direct), Email, WhatsApp, and Instagram who reached this Prarang post/page.
E. The Reach (Viewership) - The reach on the post is updated either on the 6th day from the day of posting or on the completion (Day 31 or 32) of one month from the day of posting.