गांधीजी की तीसरे दर्जे की रेल यात्राएँ व् लखनऊ चारबाग़ स्टेशन से कैसे बदला भारतीय इतिहास

औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
02-10-2026 09:10 AM
गांधीजी की तीसरे दर्जे की रेल यात्राएँ व् लखनऊ चारबाग़ स्टेशन से कैसे बदला भारतीय इतिहास

जुलाई 1914 में जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ़्रीका से भारत लौटे, तो उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें एक बड़ी पते की सलाह दी थी ,पूरे एक साल तक अपने कान खुले रखना और मुँह बंद रखना। बापू ने इस सीख को गाँठ बाँध लिया। वे अच्छी तरह समझते थे कि जब तक देश के आम आदमी के दुख-दर्द, संघर्ष और उसकी उम्मीदों को अपनी आँखों से न देख लिया जाए, तब तक किसी भी बड़े जनांदोलन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसी सोच के साथ गांधीजी ने पूरे देश का दौरा करने की ठानी और सफ़र का ज़रिया चुना भारतीय रेल का थर्ड क्लास (third class)। रेलगाड़ी के इन साधारण डिब्बों में बैठकर बापू ने सिर्फ़ यात्रा नहीं की, बल्कि ग़ुलाम भारत के उस दर्द को महसूस किया जिसे अंग्रेज़ी हुकूमत और रईस तबक़ा पूरी तरह भुलाए बैठा था। आज का यह आलेख आपको गांधीजी की उसी ऐतिहासिक यात्रा पर ले जाएगा, जहाँ लखनऊ जैसे शहर ने उनके विचारों को राष्ट्रीय पहचान दी और नोआखली के दूर-दराज़ गाँवों ने उनकी अहिंसा की सबसे कड़ी परीक्षा ली।

गांधीजी ने भारत की आत्मा को समझने के लिए थर्ड क्लास का सफ़र क्यों चुना? 
गांधीजी का पक्का मानना था कि अपने लोगों को समझे बिना देश की सच्ची सेवा हो ही नहीं सकती। 25 सितंबर 1917 को रांची में लिखी अपनी किताब 'थर्ड क्लास इन इंडियन रेलवेज (Third Class in Indian Railways)' में उन्होंने इन कड़वे अनुभवों को बेबाकी से दर्ज किया। दो साल से ज़्यादा समय तक लाहौर से त्रांकेबार, वर्तमान नाम तरंगमबाड़ी (Tharangambadi) और कराची से कलकत्ता तक सफ़र करते हुए उन्होंने तीसरे दर्जे के हालात को बहुत बारीकी से परखा। गांधीजी ने लिखा कि 12 तारीख़ को उन्होंने बॉम्बे से मद्रास जाने वाली मेल ट्रेन का टिकट 13 रुपये 9 आने में ख़रीदा था। जिस डिब्बे पर साफ़ लिखा था कि यहाँ सिर्फ़ 22 मुसाफ़िर बैठ सकते हैं, उसमें पहले से ही खचाखच भीड़ भरी थी। मद्रास पहुँचने में दो रातें लगनी थीं। पूना पहुँचने तक अगर 22 से ज़्यादा लोग अंदर नहीं घुस पाए, तो इसकी वजह वे हिम्मतवाले मुसाफ़िर थे जिन्होंने दूसरों को दरवाज़े पर ही रोक दिया था। दो-तीन लोगों को छोड़ दें तो बाक़ी सबको पूरी रात बैठे-बैठे ही काटनी पड़ी। रायचूर पहुँचते-पहुँचते तो हालत बिल्कुल बेकाबू हो गई। भीड़ सँभालने के बजाय रेलवे गार्ड और कर्मचारी और लोगों को अंदर धकेल रहे थे। पाँच दिनों से सफ़र कर रहे एक मेमन व्यापारी ने जब इस बदइंतज़ामी का विरोध किया, तो कर्मचारियों ने उसकी बात सुनने के बजाय उसे ज़लील किया और कहा कि आख़िरी स्टेशन पर जाकर शिकायत कर लेना। 22 लोगों की जगह 35 लोग ठूँसे हुए थे—कुछ ज़मीन पर पड़े थे, तो कुछ रात भर खड़े रहने को मजबूर थे। कुछ बुज़ुर्ग मुसाफ़िरों ने बीच-बचाव न किया होता, तो यात्रियों के बीच मार-पीट तय थी।

File:Mahatma Gandhi at railway station.jpg

रेल यात्रा और स्टेशनों पर आम जनता किन अमानवीय परिस्थितियों से जूझ रही थी? 
बापू ने अपनी डायरी में दर्ज किया कि पूरे सफ़र के दौरान डिब्बे में साफ़-सफ़ाई का नाम तक नहीं था। मुसाफ़िर भारी गंदगी के बीच बैठने को लाचार थे। डिब्बे के शौचालय में सफ़ाई तो दूर, पानी की टंकी में एक बूँद पानी तक नहीं था। स्टेशनों पर मिलने वाली चाय महज़ टैनिन वाला पानी थी, जिसमें घटिया चीनी और दूध के नाम पर कोई सफ़ेद घोल मिला दिया जाता था, जिससे वह कीचड़ जैसी लगती थी। स्टेशनों पर खाने-पीने की चीज़ें इतनी गंदी थीं कि देखकर घिन आ जाए। उन्हें मैले हाथों से परोसा जाता, गंदे बर्तनों में रखा जाता, मक्खियाँ भिनकती रहतीं और गंदे तराज़ू पर तौला जाता था। यात्रियों को यह घटिया खाना बिल्कुल पसंद नहीं था, लेकिन पेट की भूख के आगे वे मजबूर थे। वापसी का सफ़र भी कुछ कम तकलीफ़देह नहीं रहा। 9 लोगों के बैठने वाले डिब्बे में 12 लोग ठूँसे रहे। एक स्टेशन पर तो रेलकर्मी ने ज़बरदस्ती मुसाफ़िरों को अंदर ठूँसकर बाहर से दरवाज़ा बंद कर दिया और टोकने वाले यात्री को गालियाँ देकर धमकाया। डिब्बे का शौचालय इस्तेमाल के लायक़ ही नहीं था—पाइप था पर पानी ग़ायब, और लकड़ी के ढाँचे पर गंदगी की मोटी परत जमी हुई थी। स्टेशनों के हालात और भी ख़राब थे। रायचूर, धोंड, सोनपुर, चक्रधरपुर, पुरुलिया और आसनसोल जैसे स्टेशनों पर वेटिंग रूम शोर-शराबे और गंदगी से अटे पड़े थे। फ़र्श पर लोग जहाँ-तहाँ बैठते, थूकते और बीड़ी-सिगरेट पीते थे, जबकि वहाँ धूम्रपान पूरी तरह मना था। कीटाणुनाशक (डिसइन्फेक्टेंट) का तो किसी को अता-पता ही नहीं था। गांधीजी ने तो यहाँ तक कहा कि देश की राजधानी में तीसरे दर्जे का बुकिंग काउंटर किसी ब्लैक-होल जैसा था जिसे तुरंत ढहा देना चाहिए, क्योंकि यह गंदगी प्लेग जैसी जानलेवा बीमारियों को दावत दे रही थी।

फ़र्स्ट क्लास और थर्ड क्लास के भारी अंतर ने क्या सवाल खड़े किए? 
गांधीजी ने तुलना करते हुए बताया कि बॉम्बे से मद्रास के लिए फ़र्स्ट क्लास का किराया तीसरे दर्जे से पाँच गुना से भी ज़्यादा था। लेकिन सुविधा के नाम पर तीसरे दर्जे के यात्री को फ़र्स्ट क्लास का दसवाँ हिस्सा भी नहीं मिलता था। उन्होंने लिखा कि तीसरे दर्जे के मुसाफ़िरों की इस अनदेखी ने भारतीयों में सफ़ाई, अनुशासन और सलीके से साथ रहने की आदतें विकसित करने का बहुत बड़ा मौक़ा गँवा दिया। उलटे, इन बदहाल हालातों ने लोगों की शालीनता और सफ़ाई की सोच को ही मार दिया। इसके लिए गांधीजी ने बड़ा सीधा और व्यावहारिक उपाय सुझाया। उनका कहना था कि जब तक बड़े-बड़े अफ़सर और रसूखदार लोग बिना किसी को बताए सामान्य मुसाफ़िरों की तरह तीसरे दर्जे में सफ़र नहीं करेंगे, तब तक रेलों की यह दुर्दशा नहीं सुधरेगी। जब वे ख़ुद आम आदमी का दर्द झेलेंगे, तभी इन बेज़ुबान लाखों यात्रियों को उनके किराए के बदले बुनियादी मानवीय सुविधाएँ मिल पाएँगी।

1916 का लखनऊ अधिवेशन बापू के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ कैसे साबित हुआ? 
रेल के तीसरे दर्जे से शुरू हुआ यह जन-संवाद 1916 में लखनऊ की ऐतिहासिक धरती पर पहुँचा। जब महात्मा गांधी 31वें कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लेने लखनऊ पहुँचे, तब वे आज की तरह देश के सर्वमान्य नेता नहीं बने थे। इसी लखनऊ दौरे में बिहार के चंपारण से आए सीधे-सादे किसान राजकुमार शुक्ल बापू से मिले। शुक्ल जी ने चंपारण के नील की खेती करने वाले किसानों पर हो रहे अंग्रेज़ी ज़ुल्म को दिखाने के लिए गांधीजी से वहाँ चलने की ज़िद पकड़ ली। वे बापू के पीछे-पीछे तब तक लगे रहे, जब तक उन्होंने चंपारण आने की हामी नहीं भर दी। इसी मुलाक़ात से शुरू हुआ ऐतिहासिक चंपारण सत्याग्रह, जिसने अंग्रेज़ों को चंपारण कृषि क़ानून बनाने पर मजबूर कर दिया और गांधीजी को पूरे देश का सबसे बड़ा जननायक बना दिया। लखनऊ के चारबाग़ रेलवे स्टेशन की यादें भी बापू से बहुत गहराई से जुड़ी हैं। दिसंबर 1916 में इसी स्टेशन पर गांधीजी की पहली मुलाक़ात युवा जवाहरलाल नेहरू से हुई थी। इसके बाद 1920 और 1921 में जब असहयोग और ख़िलाफ़त आंदोलन छिड़ा, तो लखनऊ बापू का मुख्य ठिकाना बन गया। अपनी लखनऊ यात्राओं में वे पुराने शहर में मौलाना अब्दुल बारी फ़रंगी महली के फ़्रेंच शैली वाले घर में ठहरते थे, जहाँ उनका कमरा आज भी वैसे ही सहेजा हुआ है। फ़रवरी 1920 में चारबाग़ स्टेशन पर उतरते ही उन्होंने छात्रों से सरकारी स्कूल छोड़ने और चरखे से गाढ़ा सूत कातने की अपील की। फ़रवरी 1921 में गोमती किनारे उन्होंने लोगों को उर्दू में संबोधित करते हुए अंग्रेज़ी अदालतों का बहिष्कार कर अपनी पंचायतें बैठाने की सलाह दी। अगस्त 1921 में अमीनाबाद पार्क में झमाझम बारिश के बीच उन्होंने 24 घंटे का मौन व्रत रखकर स्वदेशी और अहिंसा का पाठ पढ़ाया। बाद में, सितंबर 1929 में लखनऊ यूनिवर्सिटी छात्र संघ का उद्घाटन भी बापू के हाथों हुआ, जहाँ उन्होंने नौजवानों को खादी अपनाने की सीख दी। 1936 में गोखले मार्ग पर उन्होंने एक पौधा भी लगाया था, जिसकी पट्टिका आज भी वहाँ देखी जा सकती है।

नोआखली के दंगों में गांधीजी की अहिंसा की सबसे कठिन परीक्षा कैसे हुई? 
आज़ादी की दहलीज़ पर जब पूरा मुल्क दंगों की आग में झुलस रहा था, तब 77 साल के बुज़ुर्ग गांधीजी ने पूर्वी बंगाल के नोआखली का रुख़ किया। 7 नवंबर 1946 को बापू नोआखली पहुँचे। कलकत्ता के दंगों की लपटें अब शांत गाँवों तक पहुँच चुकी थीं। बापू चाहते तो हिंदू-बहुल बिहार जा सकते थे, लेकिन उन्होंने जानबूझकर मुस्लिम-बहुल नोआखली चुना ताकि वे अपनी अहिंसा की असली परीक्षा ले सकें। बापू ने बाढ़ से घिरे 47 गाँवों की पैदल यात्रा की। चाँदपुर जाते वक़्त नाव में उनकी तबीयत भी बिगड़ी, पर वे रुके नहीं। उन्होंने बदले की आग को सिरे से ख़ारिज करते हुए कहा कि यह कोई बहादुरी नहीं, बल्कि गुंडों की कायरता है। उन्होंने बिहार के हिंदुओं को मुसलमानों पर हमले के लिए फटकारा, तो नोआखली के मुसलमानों को समझाया कि अल्पसंख्यकों को सताना बहादुरी नहीं है। नोआखली में गांधीजी ने दिल छू लेने वाली बात कही: "मैं यहाँ आप में से ही एक बनकर रहने आया हूँ। जिस तरह मैं एक गुजराती हूँ, ठीक उसी तरह मैं एक भारतीय और एक बंगाली भी हूँ।" वे मुस्लिम परिवारों के घरों में ठहरे और क़ुरान की आयतों का हवाला देकर समझाया कि किसी पर ज़बरदस्ती धर्म थोपना ग़लत है। चौमुहानी गवर्नमेंट कॉलेज के मुस्लिम प्रिंसिपल तफ़ज़्ज़ुल हुसैन ने अपनी आत्मकथा 'स्मृतिकणा' में लिखा कि बापू नोआखली और बिहार, दोनों जगह की हिंसा से बराबर आहत थे। पंचगाँव के तोफ़ाएल अहमद ने बताया कि कैसे गांधीजी बिना किसी ठाठ-बाट के ज़मीन पर चटाई बिछाकर बैठते थे और उनकी शांति सभाओं ने लोगों के दिलों में जमी नफ़रत को धो डाला।

अहिंसक संवाद और संवेदना से आज क्या सीखा जा सकता है? 
गांधीजी की पूरी ज़िंदगी हमें यही सिखाती है कि समाज में पक्की शांति केवल आपसी बातचीत और संवाद से ही आ सकती है। 18 मई 2021 को गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति और लखनऊ के ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय ने मिलकर "अहिंसक संवाद" पर एक वेबिनार रखा था। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर अनिल कुमार शुक्ला ने 'मनसा, वाचा, कर्मणा' की बात करते हुए कहा कि पत्रकारिता के छात्रों को 'सहानुभूति' (sympathy) और 'समानुभूति' (empathy) के फ़र्क़ को ज़रूर समझना चाहिए। वहीं गांधी स्मृति के डॉ. वेदअभ्यास कुंडू ने बापू के बताए अहिंसा के पाँच बुनियादी उसूलों—सम्मान, आपसी समझ, स्वीकार्यता, सराहना और करुणा—की बात की। उन्होंने कहा कि हमें बातचीत का एक ऐसा माहौल बनाना चाहिए जहाँ नकारात्मकता न हो, और मन के ग़ुस्से व कड़वाहट को दूर करने के लिए आभार-दैनिकी (ग्रैटिट्यूड जर्नल) लिखने की आदत डालनी चाहिए।

इस ऐतिहासिक यात्रा का सबसे बड़ा निष्कर्ष क्या है? 
महात्मा गांधी की तीसरे दर्जे की रेल यात्राएँ सिर्फ़ एक जगह से दूसरी जगह जाना भर नहीं थीं, बल्कि वे भारतीय समाज की नब्ज़ पकड़ने की एक गहरी साधना थीं। रेल की भीड़-भाड़, गंदगी और उपेक्षा के बीच बैठकर उन्होंने जो कुछ देखा और महसूस किया, उसी ने उन्हें चंपारण के किसानों का दर्द समझने की ताक़त दी, लखनऊ में राष्ट्रीय एकता का मंच तैयार किया और नोआखली के दंगों में शांति का सच्चा मसीहा बनाया। बापू ने साबित कर दिखाया कि सच्चा नेतृत्व महलों में बैठकर नहीं, बल्कि आम जनता के कड़वे अनुभवों को उनके साथ जीकर ही पैदा होता है।

संदर्भ: 
1. https://tinyurl.com/2yqw3mup 
2. https://tinyurl.com/24h4mljk 
3. https://tinyurl.com/235zd5p6 
4. https://tinyurl.com/28xtcbuh

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