लखनऊ, आज पढ़िए चंद्रमा व सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से बनने वाले समुद्री ज्वार-भाटे के बारे में

जलवायु और मौसम
21-09-2026 09:30 AM
लखनऊ, आज पढ़िए चंद्रमा व सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से बनने वाले समुद्री ज्वार-भाटे के बारे में

महासागर, पृथ्वी की सतह के 70% से अधिक हिस्से को व्यापते हैं और ग्रह के प्राथमिक जलवायु नियंत्रक के रूप में कार्य करते हैं। महासागरीय ज्वार-भाटे (Tides) का उठना और गिरना, चंद्रमा और सूर्य के उस गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से संचालित होता है, जो पृथ्वी के जल पर बल डालता है। दिलचस्प बात यह है कि यह परस्पर क्रिया एकतरफा नहीं है। बदलते महासागरीय ज्वार द्वारा उत्पन्न घर्षण, पृथ्वी के घूर्णन पर एक धीमे गुरुत्वाकर्षण रोधक के रूप में कार्य करता है, जो धीरे-धीरे इस ऊर्जा को वापस चंद्रमा की ओर स्थानांतरित करता है। इस प्रकार, यह बल चंद्रमा को हर साल पृथ्वी से लगभग 3.8 सेंटीमीटर दूर धकेल रहा है।

बढ़ते ग्रीनहाउस गैस (Greenhouse gas) उत्सर्जन के कारण पृथ्वी की ऊष्मीय ऊर्जा असंतुलित हो गई है और महासागरों में भारी मात्रा में ऊष्मा जमा हो रही है। पर्यावरण और मानवता के लिए इसके दूरगामी परिणाम हैं। अतः यह जानना कि पृथ्वी की प्रणालियों में ऊष्मा कितनी और कहाँ संग्रहीत है, ग्रह के ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) की स्थिति और भविष्य के अनुमानों को समझने के लिए आवश्यक है। महासागरीय ऊष्मा अवशोषण (Ocean Heat Uptake) पृथ्वी ऊर्जा असंतुलन (Earth Energy Imbalance) की गणना के लिए उपयोग किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण संकेतक है, जो वैश्विक वार्मिंग को मापने के लिए एक मूलभूत मीट्रिक है।

क्या आप जानते हैं कि महासागरों ने, मानव-संचालित तापन का लगभग 90% हिस्सा अवशोषित कर लिया है। इस प्रकार, यह एक प्रतिरोधी के रूप में कार्य करता है और हमारे ग्रह की सतह के गर्म होने को धीमा करता है। पृथ्वी की ताप विनियमन प्रणाली को समझने के लिए, महासागरीय ऊष्मा अवशोषण में होने वाले परिवर्तनों की निगरानी करना आवश्यक है।

महासागर, अपनी सतह पर वायुमंडल से गर्मी को अवशोषित करते हैं, जिसे बाद में धाराओं, मिश्रण प्रक्रियाओं और एल नीनो (El Nino) तथा ला नीना (La Nina) जैसे प्राकृतिक जलवायु पैटर्न द्वारा संचालित अन्य महासागरीय प्रक्रियाओं के माध्यम से गहरे महासागर और दुनिया भर में पुनर्वितरित किया जाता है। यहाँ, यह ऊष्मा सदियों या सहस्राब्दियों तक फंसी रहती है। समय के साथ, यह गर्मी 2,000 मीटर से अधिक गहरी परतों में फैल जाती है। अपनी विशाल ताप क्षमता और जबरदस्त आयतन के कारण, महासागर सैकड़ों या हजारों वर्षों तक गर्मी को अवशोषित और संचित करना जारी रखेंगे, फिर भले ही ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम कर दिया जाए।

पिछले कुछ दशकों (1960-2020) में, सैटेलाइट (Satellite) मापन की शुरुआत के बाद से 2,000 मीटर गहराई तक महासागर की वार्मिंग दर लगभग दोगुनी हो गई है। महासागरीय ऊष्मा अवशोषण में दुनिया के सभी क्षेत्रों में वृद्धि हुई है, हालांकि प्रत्येक क्षेत्र में इसकी तीव्रता अलग-अलग है। अन्य क्षेत्रों की तुलना मे,  दक्षिणी महासागर (जिसे अंटार्कटिक महासागर भी कहा जाता है) और अटलांटिक महासागर में अधिक स्पष्ट वार्मिंग का अनुभव हुआ है। दूसरी ओर, प्रशांत और हिंद महासागरों ने अपेक्षाकृत कम वार्मिंग दिखाई दी है।

महासागरीय गर्मी, वर्षा के वितरण में बदलाव लाती है, जिसके परिणामस्वरूप दो विपरीत प्रभाव होते हैं। पहला, कुछ क्षेत्रों को अधिक तीव्र वर्षा और बाढ़ का सामना करना पड़ सकता है, और दूसरा, अन्य क्षेत्रों में विकट सूखे की स्थिति और जंगल की आग का उच्च जोखिम हो सकता है। गर्म महासागर, तूफानों की तीव्रता को भी प्रभावित कर सकते हैं, जिससे वे अधिक शक्तिशाली और संभावित रूप से अधिक विनाशकारी हो सकते हैं। महासागर की सतह की परतों में ऊष्मा ऊर्जा, तूफानों के लिए ईंधन के रूप में कार्य करती है, जहाँ गर्म महासागरीय पानी से ऊर्जा खींची जाती है। यह हरिकेन (Hurricane) और चक्रवातों के मामले में होता है।

पृथ्वी, महासागरीय पानी की एक ऐसी बूंद के भीतर स्थित है, जिसका आकार कुछ-कुछ रग्बी बॉल जैसा है। ग्रह के दोनों (प्रत्येक) तरफ महासागर के पानी में एक उभार है। एक उभार, ग्रह के उस आधे हिस्से पर है, जो चंद्रमा की ओर है, जबकि दूसरा इसके विपरीत छोर पर स्थित है। ये दोनों उभार, मुख्य रूप से पृथ्वी पर चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण बनते हैं।

इस बल के दो अलग-अलग घटक हो सकते हैं। यह पदार्थ को ‘लंबवत’ (Vertically) – पृथ्वी की सतह के लंबवत दिशा में खींच सकता है या ‘क्षैतिज रूप से’ (Horizontally) – हमारे ग्रह के अग्र-भाग के समानांतर भी खींच सकता है। अब, पृथ्वी पर वह स्थान, जो किसी भी समय सीधे चंद्रमा के ठीक नीचे होता है, उप-चंद्र बिंदु (Sublunar point) कहलाता है। इस बीच, ग्रह के दूसरी तरफ स्थित वह स्थान जो सीधे उप-चंद्र बिंदु के विपरीत है, प्रतिमुख बिंदु (Antipodal point) के रूप में जाना जाता है।

यह कोई संयोग नहीं है कि महासागर के उभार उन दोनों स्थानों पर सबसे अधिक हैं। उप-चंद्र बिंदु और प्रतिमुख बिंदु पर, चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव में एक क्षैतिज घटक का अभाव होता है। यह अभाव, दुनिया के उन दो कोनों में भी है, जो इन स्थानों से 90 डिग्री की दूरी पर स्थित हैं। ये चार क्षेत्र, इस संबंध में अद्वितीय हैं कि पृथ्वी पर हर दूसरा स्थान एक क्षैतिज बल का अनुभव करता है, जो महासागर में पानी के अणुओं को या तो उप-चंद्र बिंदु या प्रतिमुख बिंदु की ओर धकेलता है। यही कारण है कि महासागर उन दोनों क्षेत्रों के ऊपर उभर जाता है। इस प्रकार, उप-चंद्र बिंदु पर चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल अपने सबसे मजबूत स्तर पर है, जबकि प्रतिमुख बिंदु पर चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव सबसे कमजोर है।

हर 24 घंटे में एक बार, पृथ्वी अपने अक्ष के चारों ओर एक चक्कर पूरा करती है। जैसे-जैसे पृथ्वी घूमती है, ग्रह की सतह पर कोई भी स्थान उन दोनों महासागरीय उभारों से होकर गुजरता है। तो अधिकांश क्षेत्रों में, जब आपका घर सीधे किसी उभार के नीचे होता है, तो स्थानीय ज्वार उच्च होना चाहिए। लेकिन जैसे ही यह उभारों के बीच के क्षेत्र में प्रवेश करता है, तब ज्वार कम होना चाहिए। हालांकि, यह हमेशा ऐसा नहीं होता है। वास्तव में, सूर्य भी महासागरों पर गुरुत्वाकर्षण खिंचाव डालता है। लेकिन चूंकि सूर्य बहुत दूर है, इसलिए ज्वार-भाटे पर इसका प्रभाव चंद्रमा की तुलना में कम स्पष्ट होता है। फिर भी, यह नियमित रूप से ज्वारीय उभारों को काफी हद तक बढ़ाता है।

ज्वार तब सबसे बड़े होते हैं, जब सूर्य और चंद्रमा एक सीधी रेखा में आते हैं। यह दो अलग-अलग चंद्र चरणों के दौरान होता है: पूर्णिमा और अमावस्या, जिसके परिणामस्वरूप ‘वसंत ज्वार (Spring tides)’ नामक बड़े आकार के ज्वार आते हैं। ध्यान दें कि इस नाम का वसंत के मौसम से कोई लेना-देना नहीं है, और वास्तव में, वसंत ज्वार पूरे वर्ष आते हैं। वसंत ज्वार के दौरान, उच्च और निम्न ज्वार अधिक चरम होते हैं। ‘उच्च ज्वार’ वास्तव में बहुत ऊंचे होते हैं और ‘निम्न ज्वार’ असाधारण रूप से कम होते हैं। जब सूर्य और चंद्रमा (पृथ्वी के सापेक्ष) एक-दूसरे के समकोण पर होते हैं, तो कम चरम ज्वार आते हैं। ऐसी स्थिति से ‘नीप टाइड्स (Neap tides)’ कहे जाने वाले ज्वार उत्पन्न होते हैं। नीप टाइड एक ऐसी अवधि है, जिसमें उच्च और निम्न ज्वार के बीच का अंतर न्यूनतम होता है।

 

संदर्भ

1. https://tinyurl.com/55asr7u8

2. https://tinyurl.com/36wswbwy

3. https://tinyurl.com/33ky5f2b

 

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