मेरठ में मकर संक्रांति: खुशियों, पतंगों, गुड़ और परंपराओं से भरा रूहानी उत्सव

विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
13-01-2026 09:22 AM
मेरठ में मकर संक्रांति: खुशियों, पतंगों, गुड़ और परंपराओं से भरा रूहानी उत्सव

जैसे ही जनवरी की ठंडी हवा अपनी चरम पर होती है, पूरे भारत में एक अलग ही ऊर्जा फैलने लगती है—एक ऐसी ऊर्जा जो सर्दियों की ठिठुरन को भी त्योहार की गर्माहट में बदल देती है। नए साल की ताज़गी और मौसम के बदलाव के बीच, मकर संक्रांति का आगमन हर घर, हर आँगन और हर सड़क को एक विशेष रोशनी से भर देता है। चाहे आप उत्तर भारत के किसी शांत गाँव में हों, जहाँ सुबह-सुबह लोग नदी में पवित्र स्नान के लिए निकलते हैं, या फिर महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के व्यस्त शहरों में हों, जहाँ पतंगों से भरा आसमान और चूल्हों पर पकते पारंपरिक व्यंजन त्योहार की हलचल बढ़ाते हैं—इस पर्व की अनुभूति हर जगह अलग होते हुए भी एक जैसी लगती है। मकर संक्रांति का महत्व सिर्फ धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है। यह प्रकृति के चक्र, सूर्य की गति और ऋतुओं के परिवर्तनों से जुड़ा एक ऐसा पर्व है जो हमें याद दिलाता है कि जीवन में हर बदलाव नए अवसर लेकर आता है। सामाजिक स्तर पर यह त्योहार रिश्तों को जोड़ने, समुदायों को साथ लाने और अपनेपन की भावना को मजबूत करने का माध्यम है। तिल-गुड़ की मिठास हो, पतंगबाजी की खुशी हो, सामूहिक भोज की परंपरा हो या सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता—मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति की वह खूबसूरत तस्वीर है जिसमें धार्मिक आस्था, प्रकृति का सम्मान और सामाजिक एकता एक साथ दिखाई देती है।
आज हम मकर संक्रांति के सात प्रमुख पहलुओं को जानेंगे। सबसे पहले, इसके धार्मिक और सौर महत्व को समझेंगे। फिर, हम देखेंगे कि भारत और पड़ोसी देशों में इसे विभिन्न नामों और रीति-रिवाजों के साथ कैसे मनाया जाता है। इसके बाद, त्योहार का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व जानेंगे। उसके बाद, राज्यवार परंपराओं और उत्सव की विविधताओं का अवलोकन करेंगे। फिर, मकर संक्रांति के विशेष व्यंजनों और उनके सांस्कृतिक-स्वास्थ्य महत्व पर चर्चा करेंगे। इसके बाद, भारत के बाहर मकर संक्रांति के महत्व और प्रचलन को देखेंगे। और अंत में, हम इसके समग्र सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश पर प्रकाश डालेंगे।

मकर संक्रांति का धार्मिक और सौर महत्व
मकर संक्रांति हिंदू धर्म का वह दुर्लभ पर्व है जिसका आधार पूरी तरह सौर गति पर टिका है। इस दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे उत्तरायण की शुरुआत माना जाता है। उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को रात्रि कहा जाता है, इसलिए यह पर्व आध्यात्मिक रूप से प्रकाश, जागृति और शुभ फल का प्रतीक बन जाता है। भारतीय परंपरा में सूर्य देव को ऊर्जा, जीवन और समय का स्रोत माना गया है, इसलिए मकर संक्रांति का दिन उनके प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर होता है। इस दिन स्नान, दान और जप का खास महत्व है क्योंकि माना जाता है कि इस दिन किए गए कर्मों से कई गुना अधिक पुण्य मिलता है। प्राचीन शास्त्रों में भी उल्लेख मिलता है कि भीष्म पितामह ने इसी काल का इंतजार किया था क्योंकि इसे मोक्षदायिनी अवधि माना जाता है। मौसम विज्ञान की दृष्टि से भी इस दिन के बाद धीरे-धीरे दिन बड़े होने लगते हैं, जिससे नई ऊर्जा का अनुभव होता है। कुल मिलाकर मकर संक्रांति धार्मिक, ज्योतिषीय और आध्यात्मिक सभी दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है।

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भारत में मकर संक्रांति के विभिन्न नाम और रीति-रिवाज़
भारत की सांस्कृतिक विविधता को समझना हो तो मकर संक्रांति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। एक ही पर्व पूरे देश में अलग-अलग परंपराओं और नामों के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत के लोग इसे "खिचड़ी" या "पौष संक्रांति" के रूप में मानते हैं, जहाँ दान और स्नान विशेष महत्व रखते हैं। गुजरात में यह "उत्तरायण" कहलाता है और पूरे राज्य में पतंगों से आसमान भर जाता है। महाराष्ट्र में लोग “तिल-गुड़ घ्या, गोड गोड बोला” कहकर आपसी सौहार्द बढ़ाते हैं, वहीं महिलाएँ हल्दी-कुमकुम की परंपरा निभाती हैं। तमिलनाडु में चार दिनों तक चलने वाला "थाई पोंगल" खेती, पशुपालन और सूर्य धन्यवाद पर आधारित उत्सव है। असम में “भोगली बिहू” सप्ताह भर चलने वाला आनंद पर्व है जिसमें सामूहिक भोजन और खेल होते हैं। पंजाब में "माघी" मनाई जाती है जिसमें लोग दंगल, भांगड़ा और सामुदायिक भोज का आयोजन करते हैं। कश्मीर में "शिषुर संक्रांति" परिवार के संरक्षण और परंपराओं की याद का दिन होता है। इतने नाम और रीति-रिवाज़ बताते हैं कि एक ही त्योहार भारत के हर कोने में अपने-अपने स्वाद, रंग और संस्कृति के साथ जीवंत है।

त्योहार का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
मकर संक्रांति का सांस्कृतिक इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। इसका उल्लेख महाभारत, स्कंद पुराण, पद्म पुराण और कई प्राचीन हिंदू ग्रंथों में मिलता है, जहाँ इसे शुभ अवसर और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना गया है। यह पर्व उस काल से जुड़ा है जब कृषि भारतीय जीवन का आधार हुआ करती थी, और सूर्य की गति के अनुसार खेती का समय निर्धारित होता था। इसलिए यह त्योहार नए मौसम, नई फसल और नए समय चक्र का स्वागत करता है। सामाजिक दृष्टि से यह त्योहार मिलन का अवसर है—परिवार, रिश्तेदार और समुदाय एक साथ आते हैं। गाँवों में सामूहिक भोज, लोकगीत और नृत्य होते हैं, जबकि शहरों में लोग दान-पुण्य के कार्य अधिक करते हैं। यह पर्व शिक्षा देता है कि समाज का उत्थान सहयोग, एकता और सकारात्मकता से ही संभव है। सांस्कृतिक रूप से भी यह पर्व हर वर्ग और हर आयु के लोगों को जोड़ने का माध्यम है। यही कारण है कि मकर संक्रांति सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिनिधित्व है।

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राज्यवार मकर संक्रांति उत्सव की परंपराएँ
मकर संक्रांति भारत के प्रत्येक राज्य में अपनी अनोखी शैली से खिल उठती है।
पंजाब में इसे “माघी” के नाम से मनाया जाता है, जहाँ लोग सुबह नदी में स्नान करते हैं और फिर भांगड़ा और गिद्धा जैसे लोकनृत्यों के साथ उत्सव मनाते हैं। तिल-गुड़ और खिचड़ी का दान विशेष माना जाता है।
राजस्थान और मध्य प्रदेश में पतंगबाजी सबसे प्रसिद्ध है—छतों पर बच्चों और बड़ों की आवाजें गूंजती रहती हैं। महिलाएँ दान करती हैं और संक्रात भोज में पारंपरिक व्यंजन परोसे जाते हैं।
महाराष्ट्र में तिल-गुड़ बाँटने की परंपरा संबंधों में मिठास बढ़ाने का प्रतीक मानी जाती है। परिवार में पूरनपोली, हलवा और खास तिल से बने व्यंजन तैयार किए जाते हैं।
गुजरात में उत्तरायण सबसे बड़ा आयोजन है—उपर से आसमान में रंग-बिरंगी पतंगें और नीचे धरती पर अंडियू और चिक्की की खुशबू। दो दिन तक पतंगोत्सव का जोश पूरे राज्य में दिखाई देता है।
हिमाचल प्रदेश में इसे माघ साजी कहा जाता है। लोग झरनों में स्नान करते हैं, खिचड़ी बनाते हैं और पारंपरिक नृत्यों का प्रदर्शन करते हैं।
असम में माघ बिहू—भोगली बिहू—सात दिनों तक चलते वाला आनंद महोत्सव है, जहाँ लुकुमी खेल, सामूहिक भोजन, बैलगाड़ी दौड़ और परंपरागत रात्रि-अग्नि कार्यक्रम आयोजित होते हैं।
हर राज्य की परंपरा बताती है कि मकर संक्रांति सिर्फ एक धार्मिक दिन नहीं, बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक धड़कन है।

मकर संक्रांति के व्यंजन और खाद्य प्रथाएँ
खाना इस पर्व की पहचान है और तिल-गुड़ यहां की आत्मा। सर्दियों में शरीर को गर्म रखने के लिए तिल, गुड़, मूंगफली, सूखे मेवे और घी से बने व्यंजन तैयार किए जाते हैं। तिल के लड्डू, गजक, चिक्की, खिचड़ी, पूरनपोली, हलवा, फेनी, पिठा, पोंगल—हर राज्य के अपने स्वाद हैं। तिल-गुड़ का वैज्ञानिक महत्व भी है—तिल शरीर को गर्माहट देता है और गुड़ ऊर्जा का प्राकृतिक स्रोत है। यह व्यंजन केवल भोजन नहीं, बल्कि सामाजिक भावनाओं के वाहक भी हैं। महाराष्ट्र में तिल-गुड़ देना "मिठास से बोलने" का संदेश देता है, पंजाब में खिचड़ी और तिल की मिठाइयाँ दान-पुण्य का प्रतीक हैं, और असम में पिठा और लारू समुदायिक भोजन की पहचान हैं। खाने के माध्यम से यह पर्व सिखाता है कि सर्दियों में शरीर की देखभाल और रिश्तों की मिठास दोनों ज़रूरी हैं।

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भारत के बाहर मकर संक्रांति का महत्व और प्रचलन
इस पर्व की छाप केवल भारत तक सीमित नहीं है।
पाकिस्तान (सिंध) में लोग मकर संक्रांति को सांस्कृतिक परंपरा के रूप में मनाते हैं। बेटियों को तिल, चिक्की और तिमूरी भेजना प्रेम और आशीर्वाद का प्रतीक है।
श्रीलंका में थाई पोंगल चार दिनों तक मनाया जाने वाला उत्सव है जिसमें सूर्य देव को नई फसल की पहली उपज समर्पित की जाती है। किसान अपनी मेहनत और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
बांग्लादेश में “शकरैन महोत्सव” होता है—यह वहाँ की पतंगबाजी और समुदायिक उत्साह का सबसे जीवंत उदाहरण है।
नेपाल में माघ संक्रांति को अत्यंत शुभ माना जाता है। लोग संगमों में स्नान करते हैं, सूर्य की पूजा करते हैं और तिल, गुड़ और चावल से बने व्यंजन खाते हैं।
ये उदाहरण बताते हैं कि मकर संक्रांति भारतीय सांस्कृतिक विरासत का वैश्विक विस्तार है और पूरे दक्षिण एशिया में सूर्य पूजा, कृषि और सामाजिक एकता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है।

समग्र सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश
मकर संक्रांति सिर्फ कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि जीवन की सीखों का सुंदर संग्रह है। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति के बदलावों के साथ जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन आवश्यक हैं। यह त्योहार परिवार, समाज और संस्कृतियों को एक साथ जोड़ता है—चाहे वह तिल-गुड़ की मिठास हो या सामूहिक भोज की गर्माहट। आध्यात्मिक रूप से यह हमें सूर्य की ऊर्जा और जीवन की रोशनी के प्रति आभार व्यक्त करना सिखाता है। सामाजिक रूप से यह मेल-जोल, संवाद, सहयोग और सौहार्द को मजबूत करता है। यह त्योहार मौसम, कृषि, संस्कृति और मानवता के संगम का प्रतीक है। संक्षेप में, मकर संक्रांति हमें सिखाती है कि जीवन में प्रकाश, कृतज्ञता, नया आरंभ और सकारात्मकता हमेशा ज़रूरी है।

संदर्भ:-
https://tinyurl.com/3k3rb76v 
https://tinyurl.com/yz2hmndc 
https://tinyurl.com/4kzvnce3 

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