पराक्रम दिवस विशेष: मेरठवासियों के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अनसुनी कहानी

औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
24-01-2026 09:04 AM
पराक्रम दिवस विशेष: मेरठवासियों के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अनसुनी कहानी

मेरठवासियों,पराक्रम दिवस का यह अवसर हमें उस महान व्यक्तित्व को स्मरण करने का अवसर देता है, जिनका नाम लेते ही साहस, त्याग और निर्भीक राष्ट्रभक्ति का भाव मन में जाग उठता है। सुभाष चंद्र बोस को सामान्यतः हम आज़ाद हिंद फ़ौज के सेनानायक और ब्रिटिश शासन को खुली चुनौती देने वाले क्रांतिकारी के रूप में जानते हैं। लेकिन मेरठ जैसे ऐतिहासिक नगर के लिए, जिसने 1857 में स्वतंत्रता की पहली संगठित चिंगारी देखी, नेताजी को केवल सैन्य पराक्रम तक सीमित करके देखना उनके व्यक्तित्व को अधूरा समझना होगा।नेताजी के भीतर एक गहरा, शांत और आत्मिक संसार भी था, जिसने उनके हर निर्णय को दिशा दी। 
आज हम जानेंगे कि नेताजी के जीवन में आध्यात्मिकता का क्या स्थान था, स्वामी विवेकानंद ने उनके विचारों को कैसे आकार दिया, बचपन की कौन सी घटना ने उनके भीतर आत्मचिंतन की नींव रखी, एक पत्रकार के साथ हुआ कौन सा संवाद उनके त्याग को स्पष्ट करता है, और अंत में यह समझेंगे कि भगवद गीता ने उनके संघर्षपूर्ण जीवन में उन्हें मानसिक और नैतिक शक्ति कैसे दी।

विशाखापत्तनम के आरके बीच पर सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा

नेताजी का आध्यात्मिक और दार्शनिक स्वरूप
नेताजी सुभाष चंद्र बोस केवल राजनीतिक संघर्ष के नेता नहीं थे, बल्कि भीतर से एक गंभीर विचारक थे। वे जीवन को केवल सत्ता, पद या उपलब्धियों के माध्यम से नहीं देखते थे। उनके लिए स्वतंत्रता आत्मसम्मान और कर्तव्य का विषय थी। यही कारण था कि उनका जीवन अनुशासन, सादगी और आत्मसंयम से भरा हुआ था।भौतिक सुख, व्यक्तिगत आराम और निजी महत्वाकांक्षाएँ उनके जीवन के केंद्र में नहीं थीं। वे मानते थे कि जब तक व्यक्ति भीतर से मज़बूत नहीं होता, तब तक बाहरी संघर्षों में स्थिर रहना संभव नहीं है। यह आंतरिक शक्ति उनके पूरे जीवन में दिखाई देती है।

स्वामी विवेकानंद से मिली वैचारिक दिशा
किशोरावस्था में स्वामी विवेकानंद के विचारों से परिचय नेताजी के जीवन का निर्णायक मोड़ बना। विवेकानंद की शिक्षाओं ने उन्हें यह समझाया कि राष्ट्रसेवा केवल राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना भी हो सकती है। सेवा, त्याग और मातृभूमि को देवी स्वरूप मानने की भावना उनके भीतर गहराई से बैठ गई।नेताजी का विश्वास था कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी आध्यात्मिक चेतना में निहित है। विवेकानंद का यह विचार कि पहले स्वयं को सशक्त बनाओ, फिर समाज और राष्ट्र को सशक्त करो, उनके जीवन दर्शन की आधारशिला बना।

बचपन की वह कथा जिसने आत्मचिंतन को दिशा दी
नेताजी के बचपन की एक कथा उनके भीतर की आध्यात्मिक खोज को स्पष्ट रूप से सामने लाती है। एक बार कटक में एक अत्यंत वृद्ध संन्यासी आए, जिन्हें कुछ स्रोत भोलानंद गिरीजी के रूप में पहचानते हैं। सुभाष और उनके मित्रों ने उनका आदर किया। उस संन्यासी ने सुभाष को तीन बातें बताईं। पहली, शाकाहार अपनाने की सलाह। दूसरी, कुछ विशेष श्लोकों का नियमित पाठ करने की बात। तीसरी और सबसे कठिन सलाह थी कि वे प्रतिदिन अपने माता पिता के चरणों में प्रणाम करें। यह तीसरी बात बालक सुभाष के लिए सबसे कठिन थी, फिर भी उन्होंने उसी दृढ़ता के साथ इसका पालन किया, जैसी वे अपने हर कार्य में दिखाते थे। हर सुबह वे अपने माता पिता के सामने झुकते। प्रारंभ में उन्हें संकोच और अपमान का अनुभव हुआ, और उनके माता पिता भी आश्चर्यचकित हुए। पर धीरे धीरे यह उनके घर की स्वाभाविक दिनचर्या बन गई।कुछ समय बाद सुभाष को यह महसूस हुआ कि ये अभ्यास उनकी आध्यात्मिक जिज्ञासा को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं। तब उन्होंने इन सबको छोड़कर अपना ध्यान पूरी तरह रामकृष्ण और विवेकानंद के विचारों पर केंद्रित कर दिया। इसके बाद उन्होंने स्वामी विवेकानंद की शिक्षा के अनुसार सेवा को अपनाया। जो भी उनके घर आता, उसकी सेवा करना वे अपना कर्तव्य मानते थे और दूसरों की आवश्यकता पूरी करके उन्हें गहरा संतोष मिलता था।

1906 में सुभाष चंद्र बोस बालक रूप में।

पत्रकार के साथ वह संवाद जो नेताजी के त्याग को परिभाषित करता है
नेताजी के जीवन की एक घटना उनके त्याग और स्पष्ट सोच को अत्यंत प्रभावी ढंग से सामने लाती है। जब वे आज़ाद हिंद फ़ौज को सशक्त करने के लिए विश्व भ्रमण पर थे, तब एक महिला पत्रकार ने उनसे पूछा कि क्या वे जीवन भर अविवाहित रहने का विचार रखते हैं।नेताजी ने मुस्कराते हुए कहा कि वे विवाह अवश्य करते, लेकिन कोई उनकी माँग के अनुसार दहेज देने को तैयार नहीं है। पत्रकार ने हैरानी से पूछा कि ऐसी कौन सी माँग है जिसे कोई पूरा नहीं कर सकता। इस पर नेताजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया कि वे दहेज में अपने देश की स्वतंत्रता चाहते हैं, और पूछा कि क्या कोई उन्हें यह दे सकता है।यह उत्तर सुनकर पत्रकार स्तब्ध रह गई। धन, सौंदर्य और व्यक्तिगत सुख से इस तरह का वैराग्य देखकर उसके मन में नेताजी के प्रति गहरा सम्मान जाग उठा। यह संवाद नेताजी के भीतर बसे उस संन्यासी को उजागर करता है, जिसके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था।

भगवद गीता: नेताजी के कर्म और साहस का आधार
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए भगवद गीता केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं थी, बल्कि उनके कर्मों और निर्णयों की दार्शनिक आधारशिला थी। गीता में वर्णित निष्काम कर्म और धर्म की अवधारणा ने उनके जीवन को स्पष्ट दिशा दी। नेताजी का विश्वास था कि भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना उनका धर्म है, और इस धर्म का पालन उन्हें बिना किसी व्यक्तिगत लाभ की चिंता किए करना है।गीता का निर्भयता का संदेश उनकी क्रांतिकारी सोच को निरंतर बल देता रहा। कठिन परिस्थितियों, निर्वासन और संघर्ष के बीच भी वे मानसिक रूप से अडिग बने रहे। बहुत कम लोग जानते हैं कि नेताजी प्रायः अपने साथ श्रीमद् भगवद गीता की एक प्रति रखते थे और चुनौतीपूर्ण समय में उसके श्लोकों से मानसिक शक्ति प्राप्त करते थे। आज़ाद हिंद फ़ौज के संघर्षपूर्ण दिनों में भी गीता उनके आत्मबल का स्रोत बनी रही।वे एक आस्थावान हिंदू थे और वेदांत तथा गीता से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपने राष्ट्रवादी विचारों को आकार दिया। श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं ने उनके भीतर भक्ति और शक्ति का संतुलन रचा।

संदर्भ -
https://tinyurl.com/45kddn2e
https://tinyurl.com/2fe74tu8
https://tinyurl.com/2fwez58k
https://tinyurl.com/8my53u4u
https://tinyurl.com/4jnwuyb8
https://tinyurl.com/ykhws3se

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