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मेरठवासियो, आज जब पूरी दुनिया युद्धों की हिंसा, जलवायु संकट की चेतावनियों, नैतिक मूल्यों के क्षरण और मानवीय संवेदनाओं की कमजोर होती डोर से जूझ रही है, ऐसे समय में इतिहास के उन महान व्यक्तित्वों को याद करना और भी आवश्यक हो जाता है, जिन्होंने अंधकार में भी मानवता के लिए प्रकाश का मार्ग दिखाया। हर वर्ष 30 जनवरी, महात्मा गांधी की पुण्यतिथि, जिसे हम शहीद दिवस के रूप में स्मरण करते हैं, हमें केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक गहरे आत्मचिंतन का अवसर प्रदान करती है। गांधीजी केवल भारत के स्वतंत्रता संग्राम के नायक नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे नैतिक चिंतक और मार्गदर्शक थे, जिन्होंने सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम और करुणा को जीवन का आधार बनाया। आज के तेज़ी से बदलते युग में, जहाँ शक्ति, लाभ और सुविधा को ही सफलता का पैमाना मान लिया गया है, गांधीजी के विचार हमें यह चेतावनी देते हैं कि नैतिकता के बिना कोई भी प्रगति टिकाऊ नहीं हो सकती। मेरठ जैसे ऐतिहासिक, शिक्षित और जागरूक शहर के नागरिकों के लिए यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हम गांधीजी के मूल्यों को केवल स्मृति दिवसों तक सीमित रख रहे हैं, या उन्हें अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में सचमुच आत्मसात कर पा रहे हैं।
इस लेख में हम सबसे पहले यह समझेंगे कि आज के वैश्विक संकटों के दौर में गांधीजी के नैतिक मूल्यों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक क्यों बढ़ गई है। इसके बाद, हम महात्मा गांधी द्वारा बताए गए ‘सात सामाजिक पापों’ की ऐतिहासिक चेतावनी को विस्तार से जानेंगे और यह समझेंगे कि वे आज के समाज में कैसे दिखाई देते हैं। आगे, हम लालच, भोगवाद और चरित्रहीनता जैसी आधुनिक समस्याओं पर चर्चा करेंगे, जो समाज की जड़ों को कमजोर कर रही हैं। इसके साथ ही, नैतिकता के बिना व्यापार और मानवता से कटे विज्ञान के खतरों को समझेंगे। अंत में, हम सिद्धांतहीन राजनीति और त्यागहीन धर्म के कारण होने वाले सामाजिक विघटन पर विचार करेंगे और यह जानेंगे कि गांधीजी का मार्ग आज भी समाज को संतुलन की दिशा में कैसे ले जा सकता है।
वैश्विक संकटों के दौर में गांधीजी के नैतिक मूल्यों की बढ़ती आवश्यकता
इक्कीसवीं सदी में मानव सभ्यता तकनीकी रूप से जितनी सक्षम, तेज़ और प्रभावशाली हुई है, नैतिक दृष्टि से उतनी ही भ्रमित और अस्थिर भी दिखाई देती है। आधुनिक युद्ध अत्याधुनिक हथियारों और तकनीकों से लड़े जा रहे हैं, लेकिन उनकी कीमत आज भी आम नागरिकों को ही अपने जीवन, विस्थापन और भय के रूप में चुकानी पड़ती है। जलवायु परिवर्तन मानव की अनियंत्रित लालसा, अंधाधुंध औद्योगीकरण और प्रकृति-विरोधी विकास मॉडल (model) का प्रत्यक्ष परिणाम बन चुका है, वहीं महामारी ने यह उजागर कर दिया कि वैश्विक प्रगति के बावजूद मानव समाज कितना असुरक्षित, अकेला और असमान है। ऐसे कठिन समय में महात्मा गांधी के अहिंसा, सत्य, संयम, आत्म-नियंत्रण और करुणा जैसे नैतिक मूल्य किसी आदर्शवादी दर्शन की तरह नहीं, बल्कि व्यावहारिक और स्थायी समाधान की तरह सामने आते हैं। गांधीजी का विश्वास था कि बाहरी संकटों का वास्तविक समाधान केवल कानून, शक्ति या तकनीक से नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर नैतिक चेतना के जागरण से ही संभव है। उनका यह विचार कि “यदि व्यक्ति नैतिक होगा, तो समाज स्वयं संतुलित हो जाएगा,” आज के अशांत और असहिष्णु विश्व में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।
‘सात सामाजिक पाप’: महात्मा गांधी की समाज को दी गई ऐतिहासिक चेतावनी
महात्मा गांधी ने वर्ष 1925 में अपने साप्ताहिक पत्र यंग इंडिया (Young India) में जिन ‘सात सामाजिक पापों’ की चर्चा की थी, वे केवल उस दौर की सामाजिक समस्याओं की आलोचना नहीं थे, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य के लिए दी गई एक गहरी नैतिक चेतावनी थे। काम के बिना धन, विवेक के बिना आनंद, चरित्र के बिना ज्ञान, नैतिकता के बिना वाणिज्य, मानवता के बिना विज्ञान, त्याग के बिना धर्म और सिद्धांत के बिना राजनीति—ये सातों प्रवृत्तियाँ समाज को भीतर से खोखला कर देती हैं। गांधीजी का मानना था कि जब कोई समाज इन पापों को सामान्य, स्वीकार्य या “आधुनिक जीवन की अनिवार्यता” मानने लगता है, तब उसका नैतिक पतन शुरू हो जाता है। आज लगभग एक शताब्दी बाद जब हम अपने चारों ओर नज़र डालते हैं, तो महसूस होता है कि गांधी की ये बातें केवल चेतावनी नहीं थीं, बल्कि एक दूरदर्शी भविष्यवाणी थीं। आधुनिक समाज में ये सभी प्रवृत्तियाँ अलग-अलग रूपों में मौजूद हैं और सामाजिक असंतुलन, अविश्वास तथा मानसिक अशांति को जन्म दे रही हैं।
लालच, भोगवाद और चरित्रहीनता: आधुनिक समाज की मूल समस्याएँ
आज का उपभोक्तावादी समाज “अधिक पाने, जल्दी पाने और बिना रुके पाने” की मानसिकता से संचालित हो रहा है। काम के बिना धन कमाने की लालसा, त्वरित लाभ देने वाली योजनाएँ, सट्टा प्रवृत्तियाँ और बिना वास्तविक मूल्य सृजन के अमीर बनने की चाह ने समाज में गहरी आर्थिक और नैतिक असमानता को जन्म दिया है। इसी के साथ विवेक के बिना आनंद की प्रवृत्ति ने सुख को जिम्मेदारी और संवेदनशीलता से अलग कर दिया है, जहाँ आनंद केवल व्यक्तिगत संतुष्टि तक सीमित रह गया है, भले ही उसकी कीमत दूसरों को चुकानी पड़े। भोगवाद ने व्यक्ति को आत्म-केंद्रित बना दिया है, जिसमें सामाजिक दायित्व, करुणा और नैतिक उत्तरदायित्व धीरे-धीरे गौण होते जा रहे हैं। गांधीजी के अनुसार ज्ञान तभी सार्थक होता है जब वह चरित्र निर्माण करे। आज शिक्षा, डिग्रियाँ और तकनीकी विशेषज्ञता बढ़ रही हैं, लेकिन यदि उनके साथ नैतिक चेतना और मानवीय दृष्टि न हो, तो वही ज्ञान समाज के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। चरित्रहीन ज्ञान समाज को दिशा नहीं देता, केवल शक्ति देता है—और शक्ति जब नैतिकता से रहित हो, तो वह सबसे बड़ा खतरा बन जाती है।

नैतिकता के बिना व्यापार और मानवता के बिना विज्ञान का खतरा
आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में लाभ को अक्सर सफलता का एकमात्र पैमाना मान लिया गया है। जब व्यापार से नैतिकता हट जाती है, तब शोषण, भ्रष्टाचार, पर्यावरण विनाश और सामाजिक असमानता स्वाभाविक परिणाम बन जाते हैं। गांधीजी का स्पष्ट मत था कि वाणिज्य तभी सार्थक और टिकाऊ हो सकता है जब वह समाज के व्यापक हित में कार्य करे, न कि केवल मुनाफे के लिए। इसी प्रकार विज्ञान और तकनीक, यदि मानवता और नैतिक जिम्मेदारी से कट जाएँ, तो वे जीवन को सरल बनाने के बजाय उसे नियंत्रित करने और अलग-थलग करने का माध्यम बन सकती हैं। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, निगरानी तकनीक, डेटा नियंत्रण और स्वचालन सुविधाओं के साथ-साथ मानवीय संबंधों, निजता और संवेदनाओं को भी प्रभावित कर रहे हैं। गांधीजी की चेतावनी आज और अधिक स्पष्ट लगती है—विज्ञान को मानव कल्याण का साधन बनना चाहिए, न कि मानवता को पीछे छोड़ने वाला हथियार।
सिद्धांतहीन राजनीति और त्यागहीन धर्म: सामाजिक विघटन के कारण
राजनीति जब सिद्धांत, सत्य और नैतिकता से विहीन हो जाती है, तब वह जनसेवा का माध्यम न रहकर सत्ता की अंधी दौड़ में बदल जाती है। गांधीजी ने इसे “निष्क्रिय हिंसा” कहा था—ऐसी हिंसा जो दिखती नहीं, लेकिन धीरे-धीरे समाज को भीतर से तोड़ देती है और अंततः सक्रिय हिंसा को जन्म देती है। सत्य और नैतिक मूल्यों के बिना राजनीति समाज को जोड़ने के बजाय उसे विभाजित करती है, अविश्वास और भय को बढ़ावा देती है। इसी तरह धर्म, यदि केवल कर्मकांड, प्रदर्शन और पहचान तक सीमित रह जाए और त्याग, सेवा व करुणा से खाली हो, तो वह समाज को नैतिक दिशा देने में असफल हो जाता है। गांधी के लिए धर्म का वास्तविक अर्थ मानव सेवा था—दुखी के साथ खड़ा होना और अन्याय का विरोध करना। बिना त्याग के धर्म केवल दिखावा बन जाता है। आज जिस सामाजिक पुनर्जागरण की आवश्यकता है, वह केवल सिद्धांतों से जुड़ी राजनीति और करुणा से प्रेरित, सेवा-प्रधान धर्म से ही संभव है।
संदर्भ-
https://bit.ly/2Wnl5d7
https://bit.ly/3E19ztc
https://bit.ly/3dM266w
https://tinyurl.com/4mnb63yj
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