मेरठ की ऐतिहासिक गंगा नहर प्रणाली: सिंचाई, ऊर्जा और शहर के विकास की जीवनरेखा

नदियाँ और नहरें
03-02-2026 09:25 AM
मेरठ की ऐतिहासिक गंगा नहर प्रणाली: सिंचाई, ऊर्जा और शहर के विकास की जीवनरेखा

मेरठ का सरधना क्षेत्र अपने गौरवशाली इतिहास के साथ-साथ गंगा नहर प्रणाली के लिए भी विशेष पहचान रखता है। यह नहर व्यवस्था पूरे दोआब क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाती है, जो गंगा और यमुना नदियों के बीच स्थित भूभाग को सिंचाई और जल संसाधन उपलब्ध कराती है। गंगा नहर प्रणाली का सबसे अहम हिस्सा ऊपरी गंगा नहर है। मूल गंगा नहर (Ganges Canal) की शुरुआत हरिद्वार में हर की पौड़ी के पास स्थित भीमगोड़ा बैराज से होती है। यह नहर रुड़की, पुरक्वाज़ी, मेरठ के सरधना, मुरादनगर, डासना, बुलंदशहर, खुर्जा और हरदुआगंज जैसे कई क्षेत्रों से होकर बहती है और अलीगढ़ ज़िले के अकराबाद के पास नानऊ तक पहुँचती है। यहां से यह नहर दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है—एक शाखा कानपुर की ओर जाती है, जबकि दूसरी इटावा की दिशा में आगे बढ़ती है। आज के इस लेख में हम गंगा नहर के इतिहास, इसकी प्रमुख विशेषताओं, निर्माण के दौरान आई चुनौतियों और मेरठ के प्रसिद्ध बांध “भोले की झाल” के बारे में विस्तार से जानेंगे।

गंगा नहर के निर्माण का कार्य वर्ष 1854 में शुरू हुआ था। उस समय इसे दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे महंगी मानव निर्मित जलमार्ग परियोजनाओं में से एक माना जाता था। इस नहर का उद्देश्य उत्तर भारत में गंगा और यमुना नदियों के बीच के विस्तृत क्षेत्र को सिंचाई सुविधा प्रदान करना था। हरिद्वार से दक्षिण की ओर लगभग 898 मील से अधिक दूरी तक फैली यह नहर एक विशाल जल प्रबंधन प्रणाली का उदाहरण है। हरिद्वार, जहां से नहर की शुरुआत होती है, हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र स्थल माना जाता है।

अपने ऊपरी हिस्सों में गंगा नहर कई छोटी-बड़ी नदियों और नालों से होकर गुजरती है। प्रसिद्ध डिज़ाइनर और इतिहासकार एंथनी अचवती (Anthony Acciavatti) ने अपनी पुस्तक गंगा वाटर मशीन (Ganga Water Machine) में उल्लेख किया है कि मानसून के दौरान इन जलमार्गों में पानी का स्तर अत्यंत तेज़ और खतरनाक हो सकता है। इसी कारण नहर के निर्माण में बड़ी मात्रा में धन इसके चौराहों और मार्गों के निर्माण पर खर्च किया गया। ये संरचनाएँ पानी के प्रवाह को संतुलित करने में मदद करती हैं और इंजीनियरिंग की दुनिया में एक अद्वितीय उदाहरण मानी जाती हैं।

गंगा नहर के पहले 20 मील के भीतर जल निकायों के साथ चार प्रमुख चौराहे बनाए गए हैं, जिनमें से दो को सुपर-पैसेज (Super-Passage) के माध्यम से पार किया गया है। इनमें से एक सुपर-पैसेज लगभग 200 फ़ीट चौड़ा, 14 फ़ीट गहरा और 450 फ़ीट लंबा है, जबकि दूसरा और भी अधिक चौड़ा है जिसकी चौड़ाई 300 फ़ीट तक जाती है। पहले सुपर-पैसेज को रेनपुर सुपर-पैसेज कहा जाता है। इसके तल पर बनाई गई कंक्रीट की मज़बूत दीवार, जिसे स्टॉप कहा जाता है, हिमालय से आने वाले पत्थरों की गति को कम करती है, ताकि वे पुल की संरचना को नुकसान न पहुँचा सकें। हालांकि, प्राकृतिक टूट-फूट के कारण इन स्टॉप्स को हर दो-तीन वर्षों में बदलना पड़ता है।

मुख्य गंगा नहर की लंबाई लगभग 340 किलोमीटर है, जबकि इसकी शाखाएँ मिलकर करीब 5,640 किलोमीटर तक फैली हुई हैं। नहर के किनारे कई जल विद्युत उत्पादन केंद्र भी स्थापित किए गए हैं, जो आसपास के क्षेत्रों को बिजली उपलब्ध कराते हैं। इसके अलावा, नहर के निर्माण के बाद स्थानीय लोगों के लिए मछली पकड़ने जैसी गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला है, जिससे आजीविका के नए साधन विकसित हुए हैं।

गंगा नदी के जल के बेहतर और संतुलित उपयोग के उद्देश्य से इस नहर को राष्ट्रीय जलमार्ग परियोजना के अंतर्गत घोषित किया गया है। इसका मुख्य लक्ष्य जल प्रबंधन को सुदृढ़ करना और स्थानीय समुदायों को लाभ पहुँचाना है। हालांकि, गंगा नहर परियोजना को साकार करना आसान नहीं था। आज यह नहर भले ही लाखों लोगों के लिए उपयोगी साबित हो रही हो, लेकिन इसके निर्माण के दौरान इससे जुड़े लोगों को कई सामाजिक और तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

शुरुआती दौर में गंगा नहर के निर्माण का कुछ हिंदू पुजारियों ने कड़ा विरोध किया था। उन्हें आशंका थी कि पवित्र गंगा नदी का पानी नहर में बाँध दिए जाने से उसकी धार्मिक महत्ता प्रभावित होगी। इस विरोध को दूर करने के लिए परियोजना के डिज़ाइनर प्रोबी थॉमस कॉटली (Proby Thomas Cautley) ने बांध में एक ऐसा अंतर छोड़ने पर सहमति जताई, जिससे गंगा का जल स्वतंत्र रूप से प्रवाहित हो सके। इसके साथ ही उन्होंने नदी किनारे स्थित स्नान घाटों की मरम्मत करवाई, जिससे धार्मिक नेताओं का समर्थन भी प्राप्त हुआ।

File:Solani Aquaduct Of Ganges Canal.jpg

वर्ष 1842 में मज़दूरों ने नहर की खुदाई का कार्य शुरू किया। परियोजना से जुड़े दल को निर्माण के लिए अपनी ईंटें, ईंट भट्टे और गारा स्वयं तैयार करना पड़ा। नहर निर्माण के दौरान इंजीनियरों को कई पहाड़ी धाराओं का सामना करना पड़ा, जो पानी के प्रवाह को उग्र बना सकती थीं। इस समस्या के समाधान के लिए लगभग 25 मीटर ऊँचा एक जलसेतु बनाया गया, जो लगभग आधा किलोमीटर लंबा है। इस जलसेतु ने नहर को पहाड़ी धाराओं से प्रभावित हुए बिना सुरक्षित रूप से आगे बढ़ने की अनुमति दी।

यदि आप मेरठ में रहते हैं, तो संभव है कि आपके घर तक पहुँचने वाली बिजली भी इसी नहर प्रणाली की देन हो। मेरठ के एक बड़े हिस्से की बिजली आपूर्ति भोले की झाल नामक महत्वपूर्ण बांध से होती है। यह बांध, जिसे सलावा की झाल भी कहा जाता है, गंगा नहर से जुड़ा हुआ है। आज इस बांध के आसपास का क्षेत्र एक लोकप्रिय पिकनिक स्थल बन चुका है। यहां स्थानीय लोग और पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य और शांत वातावरण का आनंद लेने आते हैं। बिना किसी प्रवेश शुल्क के खुला यह स्थान सैर-सपाटे के लिए उपयुक्त माना जाता है, और बांध के पास स्थित शिव मंदिर इसकी धार्मिक महत्ता को और बढ़ा देता है।

संदर्भ-
https://tinyurl.com/26t3s837 
https://tinyurl.com/ysuhgmr5 
https://tinyurl.com/2xwebl5y 
https://tinyurl.com/23arge6e 
https://tinyurl.com/3uynw644    

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