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मेरठवासियों, भारत में क्रिकेट अब केवल मैदान पर खेले जाने वाला खेल नहीं रह गया है, बल्कि यह भरोसे, उम्मीद और गर्व से जुड़ी एक ऐसी भावना बन चुका है, जो देश के हर छोटे-बड़े शहर में समान रूप से महसूस की जाती है। मेरठ जैसे शहरों में भी क्रिकेट की चर्चा गली-मोहल्लों, चाय की दुकानों और घरों की बैठकों में आम तौर पर सुनाई देती है। भले ही क्रिकेट किसी एक क्षेत्र तक सीमित न हो, लेकिन इसकी लोकप्रियता ने मेरठ के लोगों को भी उतनी ही गहराई से प्रभावित किया है। खासकर जब 7 फ़रवरी 2026 से शुरू होने वाले टी-20 विश्व कप को लेकर देशभर में उत्साह बढ़ रहा है, तब भारतीय क्रिकेट के इस सफ़र को समझना दरअसल हमारी अपनी भावनाओं, उम्मीदों और यादों को समझने जैसा हो जाता है।
क्रिकेट एक बल्ले और गेंद से खेला जाने वाला टीम खेल है, जिसकी उत्पत्ति दक्षिणी इंग्लैंड (England) में मानी जाती है। शुरुआती दौर में क्रिकेट में केवल अंडरआर्म बॉलिंग (Underarm Bowling) का ही प्रयोग किया जाता था। क्रिकेट की उत्पत्ति को लेकर कई सिद्धांत प्रचलित हैं। एक मत के अनुसार, यह खेल चरवाहों द्वारा खेला जाता था, जिसमें वे लकड़ी की छड़ी से पत्थर या ऊन की गेंद को मारते थे और भेड़शाला के दरवाज़े को विकेट (Wicket) के रूप में उपयोग करते थे।
एक अन्य सिद्धांत यह बताता है कि ‘क्रिकेट’ नाम इंग्लैंड में प्रयुक्त एक छोटे स्टूल (Stool) से आया है, जो आकार में लंबे और नीचे से चौड़े विकेट जैसा दिखता था। इसका संबंध फ्लेमिश (Flemish) शब्द ‘क्रिकस्टोएल’ (Krickstoel) से भी जोड़ा जाता है, जो चर्च (Church) में घुटने टेकने के लिए इस्तेमाल होने वाला छोटा स्टूल था। इसके अलावा, 1478 में उत्तर-पूर्व फ्रांस (France) में ‘क्रोक्वेट’ (Croquet) का उल्लेख भी क्रिकेट के विकास से जुड़ा एक ऐतिहासिक संकेत माना जाता है। इन तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि क्रिकेट मध्य युग में दक्षिण-पूर्व इंग्लैंड में धीरे-धीरे विकसित हुआ।

शुरुआती क्रिकेट में सभी गेंदबाज अंडरआर्म (underarm) तरीके से ही गेंद डालते थे। लेकिन 19वीं सदी की शुरुआत तक बल्लेबाजों का दबदबा इतना बढ़ गया कि खेल में संतुलन बिगड़ने लगा। कम प्रभावी गेंदबाजी के कारण रन बहुत कम बनते थे, जिससे खेल की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होती थी। इस असंतुलन को दूर करने के लिए गेंदबाजों ने नए तरीके खोजने शुरू किए और इसी प्रक्रिया में राउंड-आर्म (Round-arm) बॉलिंग का विकास हुआ, जिसमें गेंद को कंधे की ऊंचाई तक या उससे नीचे से फेंका जाता था।
राउंड-आर्म बॉलिंग की शुरुआत को लेकर एक प्रसिद्ध कथा है, जिसके अनुसार क्रिकेटर जॉन विल्स (John Willes) की बहन क्रिस्टीना विल्स (Christina Willes) बगीचे में उन्हें गेंदबाजी कर रही थीं। उस समय पहनी जाने वाली भारी स्कर्ट (Skirt) के कारण वे अंडरआर्म गेंदबाजी नहीं कर पा रही थीं, इसलिए उन्होंने हाथ ऊपर उठाकर गेंद फेंकनी शुरू की। यही शैली आगे चलकर राउंड-आर्म बॉलिंग का आधार बनी।

1816 में राउंड-आर्म बॉलिंग पर रोक लगाने के लिए नियमों में बदलाव किए गए। 15 जुलाई 1822 को, जॉन विल्स ने लॉर्ड्स (Lord’s) मैदान पर एमसीसी (MCC) के खिलाफ केंट की ओर से राउंड-आर्म गेंदबाजी की, जिसके लिए उन्हें नो-बॉल (No-Ball) दिया गया। उस समय अंडरआर्म के अलावा अन्य किसी भी तकनीक को अवैध तो नहीं माना जाता था, लेकिन उसे अनुचित समझा जाता था और अंपायर को नो-बॉल देने का अधिकार था।
1820 के दशक तक राउंड-आर्म बॉलिंग काफी लोकप्रिय हो चुकी थी। 1828 में एमसीसी ने नियमों में संशोधन कर गेंदबाजों को कोहनी तक हाथ उठाने की अनुमति दी। सात साल बाद, राउंड-आर्म बॉलिंग को औपचारिक रूप से मान्यता दे दी गई। 1845 में नियमों में और बदलाव हुए, जिससे कंधे तक हाथ उठाकर गेंद फेंकने की अनुमति मिली। अंततः 1864 में ओवर-आर्म बॉलिंग को पूरी तरह वैध कर दिया गया, और यही आधुनिक गेंदबाजी का आधार बना।

वर्तमान समय में गेंदबाज अत्यंत तेज़ गति से गेंदबाजी करते हैं और कई गेंदबाजों ने गति के मामले में विश्व रिकॉर्ड स्थापित किए हैं। इनमें शोएब अख्तर, शॉन टैट, ब्रेट ली और जेफ थॉमसन जैसे नाम शामिल हैं, जिन्होंने क्रमशः 161.3 किमी/घंटा, 161.1 किमी/घंटा, 161.1 किमी/घंटा और 160.6 किमी/घंटा की रफ्तार से गेंद फेंककर क्रिकेट इतिहास में अपनी विशेष पहचान बनाई है।
संदर्भ :-
https://bit.ly/3xpwvfk
https://bit.ly/3goaQ15
https://bit.ly/2SyfReo
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