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क्या आप जानते हैं कि भारत में हर रोज़ लगभग 90 हज़ार टन एलपीजी (LPG) की खपत होती है, लेकिन देश की मौजूदा भंडारण क्षमता केवल 1.34 मिलियन टन है? इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आज गैस का आयात रोक दिया जाए, तो हमारे पास पूरे देश के लिए बमुश्किल दो हफ़्ते का ही स्टॉक मौजूद है। यही कारण है कि जब भी वैश्विक शिपिंग मार्गों, विशेषकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास तनाव बढ़ता है, तो भारत में एलपीजी की आपूर्ति तुरंत दबाव में आ जाती है। मेरठ और इसके आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर पेट्रोल और डीज़ल की आपूर्ति सामान्य रहने के बावजूद एलपीजी की कमी क्यों हो जाती है, एलपीजी कैसे बनती है, और क्यों लकड़ी के चूल्हे के बजाय हमें साफ़ और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज़ी से बढ़ना होगा।
भारत में पेट्रोल और डीज़ल की तुलना में एलपीजी की आपूर्ति अधिक कमज़ोर क्यों है?
पेट्रोल, डीज़ल और एलपीजी, ये सभी कच्चे तेल से ही निकलते हैं, लेकिन भारत के ऊर्जा सिस्टम में इनका व्यवहार बिल्कुल अलग है। पेट्रोल और डीज़ल की आपूर्ति इसलिए स्थिर रहती है क्योंकि भारत का रिफाइनिंग बुनियादी ढांचा (Refining infrastructure) बहुत मज़बूत है। देश में 23 कच्चे तेल की रिफाइनरियां काम करती हैं, जो हर साल 220 मिलियन टन से अधिक आयातित कच्चे तेल को देश के भीतर ही पेट्रोल और डीज़ल में बदल देती हैं। इसके अलावा, भारत किसी एक सप्लायर पर निर्भर रहने के बजाय कई अलग-अलग क्षेत्रों से कच्चा तेल आयात करता है, जिससे जोखिम कम हो जाता है। लेकिन एलपीजी के मामले में स्थिति बिल्कुल उलट है। भारत अपनी एलपीजी ज़रूरत का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है, और इसका ज़्यादातर हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। चिंता की बात यह है कि एलपीजी के लगभग 90 प्रतिशत शिपमेंट होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुज़रते हैं। ऐसे में जब भी इस क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव होता है, तो भारत आने वाले एलपीजी शिपमेंट सीधे तौर पर बाधित हो जाते हैं।
एलपीजी गैस कैसे बनती है और इसका उपयोग कहाँ किया जाता है?
तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (liquefied petroleum gas) या एलपीजी मुख्य रूप से कच्चे तेल को रिफाइन करने या प्राकृतिक गैस को प्रोसेस करने के दौरान प्राप्त होती है। इस प्रक्रिया में निकलने वाली गैसें मुख्य रूप से प्रोपेन (propane) और ब्यूटेन (butane) होती हैं, जिन्हें अकेले या मिलाकर एलपीजी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। परिवहन और भंडारण को आसान बनाने के लिए इन गैसों को वायुमंडलीय दबाव से लगभग 20 गुना अधिक दबाव डालकर तरल रूप में बदल दिया जाता है। चूँकि एलपीजी में आमतौर पर कोई गंध नहीं होती है, इसलिए गैस लीक होने पर ख़तरे को भांपने के लिए इसमें थोड़ी मात्रा में एथेनथियोल (ethanethiol) मिलाया जाता है, जो एक तीखी गंध वाला रसायन है। एलपीजी का ऊष्मीय मान बहुत अधिक होता है, यानी यह बहुत अच्छी गर्मी पैदा करती है। इस्तेमाल की जाने वाली कुल एलपीजी का लगभग आधा हिस्सा खाना पकाने और घरों को गर्म करने में ख़र्च होता है। बाकी का 50 प्रतिशत हिस्सा कारों में ईंधन के रूप में और औद्योगिक कार्यों में इस्तेमाल किया जाता है। चूंकि इसमें सल्फर (sulphur) की मात्रा लगभग न के बराबर होती है, इसलिए पेट्रोल की तुलना में यह एक साफ़ सुथरा विकल्प माना जाता है और कई देशों में वाहनों में धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है।
लकड़ी और उपले जैसे पारंपरिक ईंधन सेहत के लिए कितने ख़तरनाक हैं?
दुनिया भर में आज भी लगभग 2.1 बिलियन लोग (वैश्विक आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा) खुले में आग जलाकर या लकड़ी, जानवरों के गोबर और फसल के कचरे (बायोमास - biomass) जैसे ठोस ईंधन का उपयोग करके खाना पकाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2021 में घरेलू वायु प्रदूषण के कारण प्रति वर्ष अनुमानित 2.9 मिलियन मौतें हुईं, जिनमें 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की 309,000 से अधिक मौतें शामिल हैं। लकड़ी और कोयले जैसे प्रदूषणकारी ईंधन के इस्तेमाल से घरों के अंदर जो धुआं भरता है, उसमें महीन कणों का स्तर स्वीकार्य सीमा से 100 गुना अधिक तक हो सकता है। ये छोटे कण फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश कर जाते हैं और रक्तप्रवाह में मिल जाते हैं। इस तरह के घरेलू वायु प्रदूषण के लगातार संपर्क में आने से स्ट्रोक (stroke), इस्केमिक हृदय रोग (Ischemic heart disease), क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़ (Chronic Obstructive Pulmonary Disease) और फेफड़ों के कैंसर (lung cancer) जैसी गंभीर बीमारियां होती हैं। चूंकि महिलाएं और बच्चे आमतौर पर खाना पकाने और जलावन इकट्ठा करने जैसे घरेलू काम करते हैं, इसलिए वे इस ज़हरीले धुएं के सबसे ज़्यादा शिकार होते हैं। स्वास्थ्य की रक्षा के लिए एलपीजी, सौर ऊर्जा, बिजली और बायोगैस जैसे स्वच्छ ईंधन का उपयोग बढ़ाना बेहद ज़रूरी है।

हमें जीवाश्म ईंधन छोड़कर नवीकरणीय ऊर्जा की ओर क्यों बढ़ना चाहिए?
आज जलवायु परिवर्तन दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, और ऊर्जा इसका एक मुख्य कारण और समाधान दोनों है। पृथ्वी के वायुमंडल में गर्मी को फंसाने वाली ज़्यादातर ग्रीनहाउस गैसें बिजली और गर्मी पैदा करने के लिए जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) जलाने से आती हैं। साल 2023 में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत बिजली क्षेत्र ही था। यदि हमें जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों से बचना है, तो 2030 तक उत्सर्जन को लगभग आधा करना होगा और 2050 तक नेट-ज़ीरो के लक्ष्य तक पहुँचना होगा। इसके लिए हमें जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता ख़त्म करनी होगी और नवीकरणीय ऊर्जा (जैसे धूप, हवा, पानी, पृथ्वी की गर्मी) में निवेश करना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत प्रकृति द्वारा लगातार भरे जाते हैं और ये बहुत कम या शून्य प्रदूषण फैलाते हैं। आज दुनिया भर में 90 प्रतिशत से अधिक नई नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं जीवाश्म ईंधन के विकल्पों की तुलना में सस्ती हैं। साथ ही, निवेश किए गए हर एक डॉलर के लिए, नवीकरणीय ऊर्जा जीवाश्म ईंधन उद्योग की तुलना में तीन गुना अधिक रोज़गार पैदा करती है। यह न केवल हमारे पर्यावरण को साफ़ रखेगा, बल्कि वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों को रोककर सालाना 4.2 ट्रिलियन डॉलर तक की बचत भी कर सकता है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2fkzcnqs
https://tinyurl.com/25nw8te4
https://tinyurl.com/y5ounq23
https://tinyurl.com/29gv3tcf
https://tinyurl.com/2b6m7g5g
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