साल 2019 के अंत में एक ऐसी बीमारी ने दुनिया में कदम रखा जिसने मानव इतिहास और हमारी जीवनशैली को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। कोरोना वायरस या कोविड-19 एक ऐसी वैश्विक महामारी साबित हुई जिसने स्वास्थ्य सेवाओं, अर्थव्यवस्थाओं और आम जनजीवन को घुटनों पर ला दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 11 मार्च 2020 को इसे आधिकारिक तौर पर वैश्विक महामारी घोषित किया। आज भले ही आपातकाल का वह दौर बीत चुका है लेकिन इस वायरस के प्रभाव और इससे मिली सीख को समझना बेहद आवश्यक है।
कोरोना वायरस आखिर क्या है और इसकी शुरुआत कैसे हुई?
कोरोना वायरस वास्तव में वायरसों का एक बहुत बड़ा परिवार है जो लंबे समय से इंसानों और जानवरों के बीच मौजूद रहा है। इनमें से कुछ वायरस इंसानों में सामान्य सर्दी-जुकाम का कारण बनते हैं, जबकि अन्य जानवरों जैसे चमगादड़ और ऊंटों में संक्रमण फैलाते हैं। कोविड-19 फैलाने वाले विशिष्ट वायरस को सार्स-सीओवी-2 (SARS-CoV-2) नाम दिया गया है। इस वायरस की आनुवंशिक संरचना साल 2003 में फैले सार्स आउटब्रेक वाले वायरस से काफी मिलती-जुलती है।

इस महामारी की शुरुआत नवंबर और दिसंबर 2019 में चीन के वुहान शहर से हुई थी। शुरुआत में यह माना गया कि यह वायरस वुहान के खुले बाजारों से इंसानों में आया, जहां ताज़ा मांस और अन्य उत्पाद बिकते थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन को सबसे पहले अज्ञात कारण वाले निमोनिया के कई मामलों की सूचना मिली थी, जिनमें बुखार और सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण थे। हालांकि इसकी उत्पत्ति को लेकर जानवरों से संक्रमण और प्रयोगशाला से रिसाव, दोनों सिद्धांतों पर चर्चा होती है लेकिन अभी तक किसी भी दावे की पुष्टि के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं हैं।
यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में कैसे फैलता है?
कोरोना वायरस मुख्य रूप से तब फैलता है जब कोई संक्रमित व्यक्ति सांस छोड़ता है, खांसता है, छींकता है या बात करता है। इस दौरान निकलने वाली सूक्ष्म बूंदें और एरोसोल हवा में फैल जाते हैं। जब कोई अन्य व्यक्ति इन बूंदों के संपर्क में आता है या इन्हें सांस के ज़रिए अंदर खींच लेता है, तो वह भी संक्रमित हो जाता है।
बंद कमरों और खराब वेंटिलेशन वाली जगहों पर यह वायरस हवा में अधिक समय तक रुका रह सकता है। सबसे खतरनाक बात यह है कि कोई भी संक्रमित व्यक्ति यह वायरस तब भी फैला सकता है जब उसमें बीमारी के कोई लक्षण दिखाई न दे रहे हों। भीड़भाड़ वाले स्थानों पर लंबे समय तक किसी संक्रमित के करीब रहने से संक्रमण का खतरा सबसे अधिक होता है।

कोरोना संक्रमण के मुख्य लक्षण क्या हैं और लॉन्ग कोविड क्या है?
कोविड-19 के लक्षण सामान्य सर्दी-जुकाम या निमोनिया जैसे ही महसूस होते हैं। संक्रमित व्यक्ति को बुखार, ठंड लगना, सूखी खांसी, सांस लेने में तकलीफ, अत्यधिक थकान, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द, और स्वाद या सूंघने की क्षमता का चले जाना जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कुछ मामलों में उल्टी, दस्त और गले में खराश भी देखी जाती है
अधिकांश लोगों में लक्षण हल्के होते हैं, लेकिन बुजुर्गों, कमज़ोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों और पहले से किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों में यह जानलेवा साबित हो सकता है। बीमारी से ठीक होने के बाद भी कई लोगों में महीनों तक थकान, सांस फूलना और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी जैसी समस्याएं बनी रहती हैं। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को लॉन्ग कोविड कहा जाता है। इसके अलावा बच्चों में संक्रमण के हफ्तों बाद मल्टीसिस्टम इन्फ्लेमेटरी सिंड्रोम (Multisystem Inflammatory Syndrome) जैसी दुर्लभ लेकिन गंभीर स्थिति भी देखी गई है।
कोरोना से बचाव के लिए मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग कितने ज़रूरी हैं?
महामारी के शुरुआती दौर में जब कोई वैक्सीन या दवा उपलब्ध नहीं थी, तब बचाव ही सबसे बड़ा हथियार था। सोशल डिस्टेंसिंग यानी सार्वजनिक स्थानों पर लोगों से दूरी बनाए रखने से वायरस की ट्रांसमिशन चेन (Transmission Chain) को तोड़ने में बहुत मदद मिली। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, हाथों को नियमित रूप से साबुन से धोना या अल्कोहल आधारित सैनिटाइज़र का उपयोग करना वायरस को अप्रत्यक्ष रूप से फैलने से रोकता है।

इसके साथ ही, मास्क पहनना सबसे प्रभावी उपायों में से एक साबित हुआ। चेहरे पर अच्छी तरह फिट होने वाले मास्क या एन-95 रेस्पिरेटर संक्रमित व्यक्ति से निकलने वाली बूंदों को रोकते हैं और स्वस्थ व्यक्ति को वायरस अंदर खींचने से बचाते हैं। क्वारंटाइन, स्कूलों और दफ्तरों को बंद करने जैसे कड़े कदमों ने समुदायों को वायरस से लड़ने और स्वास्थ्य ढांचे को तैयार करने का महत्वपूर्ण समय दिया।
भारत सरकार ने कोरोना महामारी का सामना कैसे किया?
भारत जैसे एक अरब तीस करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में कोरोना महामारी का प्रबंधन एक बहुत बड़ी चुनौती थी। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद का लगभग एक प्रतिशत ही है। 30 जनवरी 2020 को केरल में भारत का पहला मामला सामने आया था, जिसका संबंध वुहान की यात्रा से था।
भारत सरकार ने तेज़ी से कदम उठाते हुए अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर रोक लगाई और हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग शुरू की। 19 मार्च को प्रधानमंत्री ने जनता कर्फ्यू का आह्वान किया और 25 मार्च से पूरे देश में सख्त लॉकडाउन लागू कर दिया गया। 75 दिनों तक चले इस लॉकडाउन ने भारत को तैयारी करने का समय दिया। महामारी रोग अधिनियम लागू किया गया और राज्य स्तर पर टास्क फोर्स का गठन हुआ।
अस्पतालों में आइसोलेशन वार्ड बनाए गए, रेलवे कोचों को क्वारंटाइन केंद्रों में बदला गया और पीपीई किट, मास्क और वेंटिलेटर के स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा दिया गया। देश को अलग-अलग ज़ोन्स में बांटकर कंटेनमेंट (containment) रणनीतियां बनाई गईं। इन शुरुआती कदमों की वजह से भारत में मृत्यु दर को अन्य विकसित देशों की तुलना में काफी कम रखने में सफलता मिली।
आरोग्य सेतु ऐप ने संपर्क ट्रेसिंग में कैसे मदद की?
संक्रमण को ट्रैक करने और लोगों को जागरूक करने के लिए भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने आरोग्य सेतु ऐप लॉन्च किया। लॉन्च होने के महज़ चालीस दिनों के भीतर इस ऐप को दस करोड़ से ज़्यादा लोगों ने डाउनलोड कर लिया, जो कि पोकेमोन गो जैसे ऐप से भी तेज़ था।
यह ऐप स्मार्टफोन के जीपीएस और ब्लूटूथ का उपयोग करके यह पता लगाता था कि उपयोगकर्ता किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आया है या नहीं। यह उपयोगकर्ता के आस-पास पांच सौ मीटर से लेकर दस किलोमीटर के दायरे में संभावित संक्रमण के मामलों की जानकारी देता था। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने ऐप से जुड़े डेटा सुरक्षा और निजता के मुद्दों पर चिंता व्यक्त की थी। इसके जवाब में सरकार ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ऐप के सोर्स कोड को ओपन-सोर्स (open source) कर दिया और स्पष्ट किया कि डेटा को सुरक्षित रखा जाता है और निश्चित समय के बाद नष्ट कर दिया जाता है। बाद में कोविन पोर्टल को भी इसी ऐप से जोड़ा गया, जिससे वैक्सीन के लिए अपॉइंटमेंट लेना आसान हो गया।

कोरोना वैक्सीन कितनी प्रभावी हैं और इनका क्या असर हुआ?
कोरोना वायरस को हराने में चिकित्सा अनुसंधान और वैश्विक सहयोग से बनी वैक्सीन्स ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई। फाइज़र-बायोएनटेक (Pfizer-BioNTech), मॉडर्ना (Moderna), ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका (Oxford-AstraZeneca), जॉनसन एंड जॉनसन, नोवावैक्स (Novavax) और सिनोवैक (Sinovac) जैसी कई वैक्सीन्स को मंज़ूरी मिली।

वैज्ञानिक परीक्षणों और वास्तविक दुनिया के आंकड़ों ने साबित किया कि ये वैक्सीन्स अत्यधिक प्रभावी हैं। उदाहरण के लिए, फाइज़र और मॉडर्ना की एमआरएनए वैक्सीन्स ने संक्रमण रोकने में नब्बे प्रतिशत से अधिक प्रभावशीलता दिखाई। पूर्ण टीकाकरण के बाद अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु के मामलों में लगभग शत-प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
हालांकि बाद में वायरस के नए रूप जैसे अल्फा (Alpha), बीटा (Beta), गामा (Gamma) और डेल्टा (Delta) वेरिएंट सामने आए, जिन्होंने वैक्सीन की प्रभावशीलता को चुनौती दी। अध्ययनों में पाया गया कि फाइज़र जैसी वैक्सीन अल्फा वेरिएंट के खिलाफ बहुत कारगर थी, लेकिन बीटा और डेल्टा वेरिएंट के खिलाफ संक्रमण रोकने की इसकी क्षमता में कुछ कमी आई। इसके बावजूद, पूर्ण टीकाकरण करवा चुके लोगों में गंभीर बीमारी और मृत्यु का खतरा बहुत कम रहा।
भारत में भी युद्ध स्तर पर टीकाकरण अभियान चलाया गया। चिकित्सा विज्ञान की इस अभूतपूर्व प्रगति ने दुनिया को यह सिखाया कि भविष्य की किसी भी महामारी से निपटने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, डिजिटल तकनीक और आम जनता की भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण है।
संदर्भ
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2. https://tinyurl.com/2gbr5t4a
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