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भारत में सरकारी नौकरी पाना हमेशा से करोड़ों युवाओं का सपना रहा है। एक समय था जब इन नौकरियों के लिए लंबी-लंबी वर्णनात्मक परीक्षाएं और साक्षात्कार होते थे। लेकिन जैसे-जैसे आवेदकों की संख्या लाखों से बढ़कर करोड़ों में तब्दील हुई, पुराने तरीकों से कॉपियां जांचना प्रशासन के लिए धीमा, महंगा और बेहद मुश्किल होता गया। इसी समस्या के समाधान के रूप में कंप्यूटर आधारित बहुविकल्पीय परीक्षाओं का चलन शुरू हुआ। आज नेशनल टेस्टिंग एजेंसी, इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग पर्सनेल सिलेक्शन और कर्मचारी चयन आयोग जैसी संस्थाएं हर साल लाखों उम्मीदवारों के लिए पारदर्शी तरीके से परीक्षाएं आयोजित कर रही हैं। यह सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि इसने शिक्षा और तैयारी के पूरे तंत्र को बदल कर रख दिया है।
बहुविकल्पीय परीक्षाओं का वैश्विक इतिहास क्या है?
बहुविकल्पीय सवालों के प्रारूप को आज भले ही हम आधुनिक तकनीक का हिस्सा मानते हों, लेकिन इसकी जड़ें बीसवीं सदी की शुरुआत में खोजी जा सकती हैं। बुद्धिमत्ता को मापने का विचार 1905 में सामने आया जब अल्फ्रेड बिनेट (Alfred Binet) और थियोडोर साइमन (Theodore Simon) ने बिनेट-साइमन इंटेलिजेंस स्केल (Binet-Simon Intelligence Scale) बनाया। हालांकि, ज्ञान को मापने वाली बहुविकल्पीय परीक्षण प्रणाली का श्रेय मुख्य रूप से फ्रेडरिक जे. केली (Frederick J. Kelly) को दिया जाता है। उन्होंने 1914 में कैनसस साइलेंट रीडिंग टेस्ट (Kansas Silent Reading Test) तैयार किया था। उनका मुख्य उद्देश्य मूल्यांकन में आने वाले व्यक्तिगत पक्षपात को खत्म करना और छात्रों की जांच प्रक्रिया को तेज़ करना था।

उस दौर में अमेरिकी माध्यमिक शिक्षा में बड़ा बदलाव आ रहा था और हाई स्कूल जाने वाले छात्रों की संख्या पांच गुना तक बढ़ गई थी। इतने सारे छात्रों के लिए एक कुशल और तेज़ परीक्षण पद्धति समय की मांग बन गई। इसके बाद 1926 में कॉलेज एंट्रेंस एग्जामिनेशन बोर्ड ने स्कोलास्टिक एप्टीट्यूड टेस्ट (Scholastic Aptitude Test) में भी मौखिक और निबंध प्रारूप को हटाकर बहुविकल्पीय सवालों को अपना लिया। पूर्वी एशिया और विशेषकर जापान में भी जन शिक्षा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इसे अपनाया गया। वहां के शिक्षाविदों का मानना था कि निबंध आधारित सवालों के मूल्यांकन में निष्पक्षता की गारंटी देना असंभव है और इससे आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों के बच्चों को अनुचित लाभ मिलता है। इस तरह एक पारदर्शी और मानकीकृत प्रणाली के रूप में बहुविकल्पीय सवालों का पूरी दुनिया में विस्तार हुआ।

भारत में सरकारी भर्तियों के लिए एमसीक्यू प्रणाली क्यों अपनाई गई?
भारत में रेलवे, एसएससी और बैंकिंग क्षेत्र की नौकरियों में आवेदकों की संख्या हमेशा से बहुत ज्यादा रही है। पहले मैनुअल तरीके से कॉपियों का मूल्यांकन होता था, जिसमें मानवीय गलतियों और पक्षपात की गुंजाइश बनी रहती थी। इसके अलावा परीक्षा के परिणाम आने में कई महीनों का समय लग जाता था। बहुविकल्पीय सवालों ने मशीनों और बाद में कंप्यूटर आधारित परीक्षणों के माध्यम से उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन करना संभव बना दिया।

इस आधुनिक प्रणाली के तहत एक ही समय में बड़े पैमाने पर उम्मीदवारों का परीक्षण किया जा सकता है। इसमें प्रश्नों के उत्तर पहले से निर्धारित होते हैं, जिससे व्यक्तिपरक मूल्यांकन की कोई गुंजाइश नहीं रहती। कर्मचारी चयन आयोग और रेलवे भर्ती बोर्ड ने भर्ती में पारदर्शिता, मानकीकरण और कानूनी विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए इस व्यवस्था को पूरी तरह से अपना लिया है। यह प्रणाली उम्मीदवारों की तार्किक क्षमता, मात्रात्मक योग्यता और सामान्य जागरूकता का एक समान तरीके से परीक्षण करती है।
आधुनिक दौर में एमसीक्यू और लिखित परीक्षाओं के बीच मुख्य अंतर क्या है?
पारंपरिक लिखित परीक्षाएं और बहुविकल्पीय परीक्षाएं अलग-अलग तरह के कौशल को परखने के लिए बनाई गई हैं। बहुविकल्पीय परीक्षाओं का मुख्य जोर गति, सटीकता और बड़े पैमाने पर मूल्यांकन पर होता है। यह कम समय में ज्ञान के व्यापक दायरे का परीक्षण कर सकती है। वहीं दूसरी ओर, लिखित और वर्णनात्मक परीक्षाएं छात्र की विश्लेषणात्मक क्षमता, विस्तृत व्याख्या और लेखन कौशल की जांच करती हैं।
आज के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence - AI) और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (Natural Language Processing - NLP) के युग में बहुविकल्पीय आधारित मूल्यांकन बहुत तेजी से विकसित हो रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ये परीक्षाएं तत्काल फीडबैक देने में सक्षम हैं। प्री-डिफाइंड उत्तरों के कारण सिस्टम स्वचालित रूप से प्रतिक्रियाओं का आकलन कर लेता है, जिससे परीक्षार्थियों और मूल्यांकनकर्ताओं दोनों का समय बचता है। पेक्सीटेस्ट (Pexitest) जैसे आधुनिक फ्रेमवर्क इसी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए महज तीस मिनट के भीतर उम्मीदवारों की कार्य प्रेरणा, स्वभाव और योग्यता का 80 प्रतिशत से अधिक सटीकता के साथ अनुमान लगा लेते हैं। हालांकि शिक्षाविदों का यह भी मानना है कि बहुविकल्पीय प्रश्न गहरे वैचारिक ज्ञान का परीक्षण नहीं कर सकते हैं, इसलिए कई बार परीक्षा के डिजाइन में छोटे उत्तर वाले प्रश्नों को भी शामिल करने की सलाह दी जाती है।
केंद्र सरकार सीबीटी परीक्षाओं को सुरक्षित और पारदर्शी कैसे बना रही है?
कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं के संचालन में सबसे बड़ी चुनौती साइबर सुरक्षा और कदाचार को रोकना है। इसी को ध्यान में रखते हुए कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने राष्ट्रीय स्तर पर सीबीटी आयोजित करने के लिए कड़े मानक और दिशानिर्देश तय किए हैं। इसके तहत प्रश्न बैंक बनाने, प्रश्नों के अनुवाद और उन्हें अंतिम रूप देने की पूरी प्रक्रिया को बेहद गोपनीय रखा जाता है। परीक्षा आयोजित करने वाले इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म और सॉफ्टवेयर को हैकिंग जैसी गतिविधियों से सुरक्षित रखने के लिए कड़े साइबर सुरक्षा मानदंड लागू किए गए हैं।
परीक्षा केंद्रों पर फर्जीवाड़े को रोकने के लिए रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में बायोमेट्रिक डेटा कैप्चर करने और वन टाइम रजिस्ट्रेशन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकार ने परीक्षा केंद्रों की स्थापना, दूरस्थ क्षेत्रों में उनकी पहुंच, सीसीटीवी निगरानी और परीक्षा के दौरान किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए विस्तृत नियम बनाए हैं। कदाचार की पहचान करने और उसे रोकने के लिए अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसी आधुनिक तकनीकों का भी सहारा लिया जा रहा है। ब्लैकलिस्ट किए गए सेवा प्रदाताओं और कदाचार में शामिल उम्मीदवारों की जानकारी सभी एजेंसियों के बीच साझा की जाती है ताकि परीक्षा की शुचिता बनी रहे।
मेरठ के कोचिंग संस्थान और सीबीटी केंद्र छात्रों को कैसे तैयार कर रहे हैं?
राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा प्रणाली में आए इस डिजिटल बदलाव का असर स्थानीय स्तर पर भी साफ देखा जा सकता है। मेरठ शहर आज प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। बैंकिंग, एसएससी, रेलवे और रक्षा क्षेत्र की भर्तियों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच मेरठ के कोचिंग संस्थान छात्रों का मार्गदर्शन करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। ये संस्थान बहुविकल्पीय परीक्षाओं की ज़रूरत के हिसाब से छात्रों की योग्यता, तर्कशक्ति, अंग्रेजी और सामान्य जागरूकता को बेहतर बनाने पर काम कर रहे हैं।

इन कोचिंग संस्थानों में नियमित कक्षाओं के साथ-साथ शॉर्टकट तकनीक और परीक्षा-उन्मुख अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराई जाती है। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका कंप्यूटर आधारित परीक्षा केंद्रों की है। ग्रामीण और कस्बाई परिवेश से आने वाले कई छात्रों के लिए कंप्यूटर पर ऑनलाइन परीक्षा देना एक डरावना अनुभव हो सकता है। मेरठ के सीबीटी केंद्र छात्रों को बिल्कुल असली परीक्षा जैसा माहौल प्रदान करते हैं। यहां उपलब्ध आधुनिक कंप्यूटर लैब और तेज इंटरनेट के जरिए छात्र मॉक टेस्ट देते हैं। इससे उनका डर खत्म होता है और वास्तविक परीक्षा के दौरान उनकी गति, सटीकता और समय प्रबंधन में जबरदस्त सुधार होता है। यह पूरा इकोसिस्टम आज इस क्षेत्र के हजारों युवाओं के सरकारी नौकरी के सपने को साकार करने में एक मज़बूत स्तंभ बन चुका है।

संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2xwaeq4t
2. https://tinyurl.com/2aomwzpg
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