दशहरा विशेष: मेरठ, पढ़िए हमारे शहर की अनूठी रामलीला व रावण-मंदोदरी की पहली मुलाकात की कथा

विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
20-10-2026 08:21 AM
दशहरा विशेष: मेरठ, पढ़िए हमारे शहर की अनूठी रामलीला व रावण-मंदोदरी की पहली मुलाकात की कथा

क्या आप जानते हैं कि हमारे शहर मेरठ की सबसे पुरानी रामलीला, पिछले कई वर्षों से श्री रामलीला कमेटी के अंतर्गत जिमखाना मैदान में आयोजित की जा रही है। यहाँ चतुर्वेदी परिवार की पाँचवीं पीढ़ी रामलीला में अभिनय की कला को आगे बढ़ा रही है। मथुरा की अभिनय मंडली ‘श्री गणेश रामलीला मंडल’, जिसमें सभी कलाकार लड़के हैं, द्वारा यहाँ रामलीला का मंचन किया जाता है। इसमें दो चचेरे भाई राम-सीता की भूमिका निभाते हैं और इसी राम की भूमिका निभाने वाले लड़के के चाचा रावण बनते हैं। वे किसी भी बाहरी कलाकार को अपने संघ में नहीं लेते हैं और अभिनेताओं से लेकर संगीतकारों एवं संवाद बोलने वालों तक, सभी कलाकार उनके विस्तृत परिवार से ही हैं। यह परिवार आने वाले वर्षों में भी इस कला को जीवित रखने और आगे बढ़ाने की योजना बना रहा है।

एक बार, 1987 में हमारे शहर में कर्फ्यू लगा था। फिर भी, रामलीला अपने परंपरागत स्थान पर हुई थी। वर्ष 1987 में आयोजित यह रामलीला, अपनी ऐतिहासिक यादों को संजोए हुए है। कर्फ्यू के दौरान हिंदू-मुसलमान सौहार्द का अनूठा परिचय देते हुए, मुस्लिम कारीगरों ने रावण के पुतले का निर्माण किया था। वहीं दूसरी ओर, समिति ने बहुत कम समय में सारी तैयारियाँ पूरी कर रामलीला के मंचन को ऐतिहासिक बना दिया था।

https://sceh.net 

वर्ष 1987 के उस दौर में, रामलीला के मंचन ने ही शहर में दोबारा शांतिपूर्ण माहौल कायम करने में अहम भूमिका निभाई थी। तब शाम पाँच बजे मंचन शुरू होता था और रात नौ बजे समाप्त हो जाता था। उस विषम परिस्थिति में भी परंपरा का पालन करते हुए, भैसाली ग्राउंड में ही रामलीला का मंचन किया गया था। मंचन के दौरान भारी संख्या में पुलिस बल तैनात रहा था। उस वक्त 12 घंटे के लिए कर्फ्यू में ढील दी गई थी, जिसके दौरान रावण के पुतले का दहन किया गया था। पुतला बनाने वाले कारीगरों के बारह लोगों के संघ को भी तीरगरान से पुलिस की कड़ी निगरानी में सदर ढोलकी मोहल्ले लाया जाता था। यहाँ स्थित एक धर्मशाला में ही उन्होंने रावण के 60 फीट ऊंचे विशाल पुतले का निर्माण किया था। इस पुतले को कई अलग-अलग हिस्सों में तैयार किया गया था।

दशहरा के अवसर पर हमारे शहर में कुल चार बड़ी रामलीलाओं का आयोजन होता है - रामलीला ग्राउंड, भैसाली मैदान, सूरजकुंड और जिमखाना ग्राउंड। इनमें से पहले तीन स्थानों पर रावण-दहन किया जाता है। सूरजकुंड पार्क का रखरखाव मेरठ नगर निगम द्वारा किया जाता है। इस स्थान की हरियाली यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण का केंद्र है। इस परिसर के भीतर प्रचुर मात्रा में पेड़-पौधे और हरियाली मौजूद है। यह पर्यटकों और आगंतुकों के लिए कई मनोरंजक और आनंददायक गतिविधियाँ प्रदान करता है।

इस जगह का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि राजा कर्ण ने इसी स्थान पर सूर्य देव को अपने ‘कवच और कुंडल’ अर्पित किए थे। हर साल दशहरा के अवसर पर यहाँ एक मेले का आयोजन किया जाता है, जिसे पूरे उल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

दूसरी ओर, क्या आप जानते हैं कि मेरठ में रामायण काल से जुड़ा एक छोटा सा मंदिर स्थित है। यह प्राचीन श्री बिल्वेश्वर नाथ मुख्य मंदिर है। यह रावण की पत्नी मंदोदरी से संबंधित है। श्री बिल्वेश्वर नाथ मुख्य मंदिर, हमारे शहर की व्यस्त गलियों की चहल-पहल के बीच स्थित है, और हर साल सावन के महीने में लाखों भक्त इसमें स्थापित शिवलिंग पर जल अर्पित करने के लिए आते हैं। इस मंदिर की एक रहस्यमयी कहानी है और माना जाता है कि यहाँ भक्तों के सपने सच होते हैं।

मेरठ का ऐतिहासिक श्री बिलेश्वर नाथ महादेव मंदिर
श्री बिल्वेश्वर नाथ मुख्य मंदिर

हिंदू पौराणिक कथाओं के प्राचीन ग्रंथों और पुस्तकों के अनुसार, भगवान शिव के इस प्राचीन मंदिर को शहर के सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है, जहाँ एक स्वयंभू (स्वयं प्रकट हुआ) शिवलिंग स्थापित है। इसके इतिहास के निशान त्रेता युग तक जाते हैं, जब इसकी स्थापना हुई थी और मेरठ के प्राचीन शासक - दानव राज मयासुर की पुत्री मंदोदरी यहाँ नियमित रूप से पूजा करने आती थीं।

उस समय इस जगह को ‘मयाराष्ट्र’ के नाम से जाना जाता था। किंवदंतियों के अनुसार, मंदोदरी ने सबसे शक्तिशाली पति को पाने की मनोकामना के साथ इस मंदिर में प्रतिदिन भगवान शिव की आराधना की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें यह वरदान दिया था। परिणामस्वरूप, वे पराक्रमी असुर राज रावण की अर्धांगिनी बनीं।

पवित्र ग्रंथों में इस मंदिर का उल्लेख रावण के ससुराल के रूप में मिलता है, और यहाँ मंदोदरी व उनकी पहली मुलाकात से जुड़ी कई कथाएँ भी प्रचलित हैं। ऐसा भी माना जाता है कि इस मंदिर में यदि सच्चे मन से प्रार्थना की जाए, तो मनोकामनाएँ अवश्य पूरी होती हैं। विशेषकर महाशिवरात्रि या सावन के महीने में, आपको जल्दी फलप्राप्त हो सकता है। इसके लिए एक प्राचीन कुएँ के जल से जलाभिषेक करने की रस्म भी शामिल है। आज भी पुरानी मान्यताओं के अनुसार, लोग यहाँ एक विशेष परंपरा का पालन करते हैं। यदि आप इस मंदिर में लगातार 40 दिनों तक दीया जलाकर प्रार्थना करते हैं, तो मंदोदरी की तरह आपकी भी सभी मनोकामनाएँ पूरी हो जाती हैं।

https://sceh.net/ 

स्थानीय मान्यताओं और प्राचीन रीति-रिवाजों के अनुसार, मेरठ के कई लोग रावण को अपना दामाद मानते हैं। जहाँ भारत के बाकी हिस्से दशहरे के दौरान रावण के पुतले जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाते हैं, वहीं मेरठ के कुछ लोग इसके विपरीत रावण की मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हैं।

अब दशहरे के अवसर पर, मेरठ में सदर भैसाली मैदान, सूरजकुंड पार्क, रजबन फुटबॉल ग्राउंड, दिल्ली रोड रामलीला ग्राउंड, प्रह्लाद नगर, जेलचुंगी, कसेरूखेड़ा, लालकुर्ती और कंकरखेड़ा सहित विभिन्न स्थानों पर रावण पुतला दहन किया जाएगा।

 

संदर्भ

1. https://tinyurl.com/3xaxj4z6 

2. https://tinyurl.com/mry2jmh2 

3. https://tinyurl.com/2rwv6jze 

4. https://tinyurl.com/57r4rbdh 

5. https://tinyurl.com/3w6u623e 

Definitions of the Post Viewership Metrics

A. City Readerships (FB + App) - This is the total number of city-based unique readers who reached this specific post from the Prarang Hindi FB page and the Prarang App.

B. Website (Google + Direct) - This is the Total viewership of readers who reached this post directly through their browsers and via Google search.

C. Messaging Subscribers - This is the total viewership from City Portal subscribers who opted for hyperlocal daily messaging and received this post.

D. Total Viewership - This is the Sum of all our readers through FB+App, Website (Google+Direct), Email, WhatsApp, and Instagram who reached this Prarang post/page.

E. The Reach (Viewership) - The reach on the post is updated either on the 6th day from the day of posting or on the completion (Day 31 or 32) of one month from the day of posting.