मेरठवासियों जानिए, क्यों गांधी जी ने बिना शारीरिक काम किए भोजन को चोरी कहा?

औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
02-10-2026 09:10 AM
मेरठवासियों जानिए, क्यों गांधी जी ने बिना शारीरिक काम किए भोजन को चोरी कहा?

मेरठ का ऐतिहासिक शहर हमेशा से अपने हुनरमंद कारीगरों और हथकरघा बुनाई की शानदार परंपरा के लिए जाना जाता है। अंग्रेज़ों के दौर में जब विदेशी कपड़ों और मशीनों ने भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी, तब महात्मा गांधी के आर्थिक विचारों को यहाँ के मेहनती लोगों में एक स्वाभाविक आधार मिला। गांधी जी का पक्का मानना था कि सच्ची शांति सिर्फ़ राजनीतिक आज़ादी से नहीं मिल सकती, बल्कि इसके लिए आर्थिक बराबरी का होना भी बहुत ज़रूरी है। उन्होंने साफ़ शब्दों में समझाया कि बड़ी मशीनों से होने वाले भारी उत्पादन की जगह हमें 'जनता द्वारा उत्पादन' यानी 'प्रोडक्शन बाय द मासेज' को अपनाना चाहिए। उनके लिए चरखा महज़ सूत कातने का साधन नहीं था, बल्कि यह इंसानी गरिमा, आत्मनिर्भरता और अहिंसक अर्थव्यवस्था का जीता-जागता प्रतीक था। अगर इस व्यवस्था को गहराई से समझें, तो साफ़ होता है कि काम को प्यार और ज़िम्मेदारी से जोड़कर ही हम एक ऐसे समाज की नींव रख सकते हैं जहाँ किसी का शोषण न हो।

https://sceh.net/

क्या बड़े पैमाने के उत्पादन के बजाय जनता द्वारा उत्पादन ही सच्चा समाधान है?
डॉ. नमिता निंबालकर (Dr. Namita Nimbalkar) के विश्लेषण को देखें, तो गांधीवादी अर्थशास्त्र कोई किताबी या पारंपरिक विषय नहीं है। यह असल में महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के अपने व्यावहारिक अनुभवों, उनकी शिक्षाओं और भारतीय हालात की गहरी समझ पर टिका है। इसके मूल में उत्पादन, वितरण, खपत और 'सर्वोदय' जैसी आर्थिक गतिविधियाँ शामिल हैं। इस पूरी सोच की आत्मा सत्य और अहिंसा के बुनियादी उसूलों पर आधारित है। आज का आधुनिक बाज़ार जहाँ इंसानी इच्छाओं को असीमित रूप से बढ़ाने पर ज़ोर देता है, वहीं गांधी जी का नज़रिया कहता है कि अपनी इच्छाओं को कम रखें और सिर्फ़ असली ज़रूरतों के हिसाब से चीज़ों का इस्तेमाल करें। इस विचार का मक़सद किसी एक ख़ास वर्ग का फ़ायदा नहीं, बल्कि सभी का समग्र कल्याण है। गांधी जी ने संपत्ति के 'ट्रस्टीशिप' सिद्धांत का समर्थन किया, जिसका मतलब है कि धनवान व्यक्ति खुद को दौलत का मालिक न समझे, बल्कि पूरे समाज का संरक्षक माने। वे ऐसे तौर-तरीकों के पक्ष में थे जिनमें ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को काम मिले, ताकि गाँवों के मज़दूर खाली बैठने को मजबूर न हों। साल 1928 में ही उन्होंने देशवासियों को आत्मबल और मौलिक सोच की कमी के प्रति आगाह कर दिया था। उनका मानना था कि ज़रूरत पर आधारित अर्थव्यवस्था में फ़ैसले बाज़ार के मुनाफ़े से नहीं, बल्कि समाज की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए लिए जाते हैं। यह नज़रिया इंसान को सबसे ऊपर रखता है, जहाँ व्यक्ति खुद मंज़िल भी है और रास्ता भी। लेकिन यहाँ एक सवाल उठता है कि इस विचार को ज़मीन पर उतारने के लिए चरखे ने कैसे एक सामाजिक क्रांति का रूप ले लिया?

चरखा और खादी किस प्रकार सामाजिक समानता और स्वावलंबन के प्रतीक बने?
अंग्रेज़ों के ज़माने में खादी सिर्फ़ पहनने का कपड़ा नहीं थी, बल्कि यह साम्राज्यवाद और शोषक 'टेक्नो-कैपिटलिज़्म' के ख़िलाफ़ एक बेहद ताक़तवर विचार बन गई थी। उस दौर में लोगों के बीच यह बात गूँजती थी कि चरखा किसी तोप जैसा है, जिसके सूत के गोले लैंकाशायर (Lancashire) और मैनचेस्टर (Manchester) के विदेशी कपड़ा उद्योग की जड़ें हिला देंगे। खादी आंदोलन का असली मक़सद उन लाखों ग्रामीणों को रोज़गार देना था, जो साल में छह महीने काम न होने की वजह से खाली बैठे रहते थे। यह आंदोलन बहुत ही सरल तकनीक और स्थानीय संसाधनों पर टिका था, जिससे गाँव का पैसा गाँव में ही रुक सके। चरखा समाज में बदलाव लाने का एक क्रांतिकारी माध्यम भी बना। भारत में जहाँ सूत कातने का अधिकार पारंपरिक तौर पर कुछ ख़ास वर्गों तक ही सीमित था, वहीं गांधी जी ने हर व्यक्ति से सूत कतवाकर जातिगत भेदभाव पर गहरी चोट की। सूत कातने की इस छोटी-सी प्रक्रिया ने पढ़े-लिखे शहरी वर्ग और ग़रीब ग्रामीण कारीगरों के बीच एक नैतिक रिश्ता जोड़ दिया। उस समय जनमानस में यह गीत गूँजने लगा था कि चरखे से बुना कपड़ा और चूल्हे पर पकी रोटी ही हमारी सच्ची आज़ादी है। खादी ने ग्राहकों को जागरूक नागरिक बना दिया, जो अब सिर्फ़ कपड़े की क्वालिटी नहीं, बल्कि उससे जुड़े मूल्यों और चरित्र का भी सम्मान करते थे। यह बात आज भी उतनी ही सही है, ख़ासकर तब जब हम अपने पारंपरिक कुटीर उद्योगों के विशाल नेटवर्क को देखते हैं।

भारतीय कुटीर उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आजीविका को कैसे सशक्त बना रहे हैं?
कुटीर उद्योग वो छोटे व्यवसाय हैं जो परिवार के लोग, अपने पारंपरिक हुनर और साधारण औज़ारों की मदद से घरों या छोटी वर्कशॉप में चलाते हैं। साल 2025 और 2026 के आज के माहौल में भी ये उद्योग पर्यावरण के अनुकूल काम करने, हमारी संस्कृति को बचाने और ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का एक बड़ा ज़रिया हैं। भारत के एमएसएमई सेक्टर में इन कुटीर इकाइयों का बहुत बड़ा योगदान है, जो देश की जीडीपी में लगभग 30% और कुल निर्यात में 45% से ज़्यादा की हिस्सेदारी रखते हैं।

भारत में कुटीर उद्योगों की कई प्रमुख श्रेणियाँ सदियों से रोज़ी-रोटी का साधन रही हैं:
खादी और हथकरघा वस्त्र उद्योग: यह सेक्टर सूती, ऊनी और रेशमी साड़ियाँ, शॉल और कपड़े तैयार करता है। केवीआईसी के ज़रिए यह मुख्य रूप से यूपी (UP), पश्चिम बंगाल (West Bengal) और तमिलनाडु (Tamil Nadu) जैसे राज्यों में लाखों बुनकरों को रोज़गार देता है।
रेशम और रेशम कीट पालन: भारत वैश्विक रेशम उत्पादन में दूसरे नंबर पर है। कर्नाटक (Karnataka), असम (Assam) और पश्चिम बंगाल (West Bengal) इसके बड़े केंद्र हैं, जहाँ केंद्रीय रेशम बोर्ड किसानों और बुनकरों को ट्रेनिंग और आर्थिक मदद देता है।
कॉयर उद्योग: केरल (Kerala), तमिलनाडु (Tamil Nadu) और आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) में नारियल की जटाओं से रस्सियाँ, पायदान और ब्रश बनाए जाते हैं। कॉयर बोर्ड अपनी योजनाओं के ज़रिए इसमें बड़े पैमाने पर महिलाओं को जोड़ता है।हस्तशिल्प और पारंपरिक कला: लकड़ी पर नक्काशी, पीतल के बर्तन, मिट्टी के काम, पत्थर तराशने और आभूषण बनाने में राजस्थान (Rajasthan), ओडिशा (Odisha) और कश्मीर (Kashmir) की अपनी एक अलग ही पहचान है।
कालीन और दरी बुनाई: यूपी (UP), राजस्थान (Rajasthan) और कश्मीर (Kashmir) में ऊन और रेशम से हाथ से बुनी गई बेहतरीन कालीनें तैयार की जाती हैं, जिन्हें 'कालीन निर्यात संवर्धन परिषद' दुनिया भर के बाज़ारों तक पहुँचाती है।
चमड़ा और फुटवियर उद्योग: पारंपरिक तरीके से सिलाई और रंगाई करके जूते, बेल्ट और बैग बनाने का काम मुख्य रूप से कानपुर (Kanpur), आगरा (Agra), चेन्नई (Chennai) और कोलकाता (Kolkata) में होता है।
कृषि आधारित फ़ूड प्रोसेसिंग: गुड़, अचार, पापड़, शहद, दालें और मसाले बनाने वाली छोटी इकाइयाँ महाराष्ट्र (Maharashtra), पंजाब (Punjab) और यूपी (UP) में किसानों और महिलाओं को अच्छी अतिरिक्त कमाई का मौका देती हैं।
यह पूरा विशाल तंत्र स्थानीय संसाधनों का बेहतरीन इस्तेमाल करता है और गाँवों से शहरों की तरफ़ होने वाले अनियंत्रित पलायन को रोकने में मदद करता है। फिर भी, इन उद्योगों के विकास का रास्ता पूरी तरह से रुकावटों से मुक्त नहीं है।

वर्तमान में कुटीर उद्योगों के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं और उनके व्यावहारिक समाधान क्या हैं?
इतने अहम होने के बावजूद, आज के आधुनिक और कड़े मुक़ाबले वाले बाज़ार में कुटीर उद्योगों को कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सबसे बड़ी परेशानी है आसानी से लोन न मिलना। बैंक अक्सर गारंटी या गिरवी रखने के लिए कुछ न होने पर लोन देने से कतराते हैं। इस समस्या को सुलझाने के लिए 'सीजीटीएमएसई' बिना किसी गारंटी के 5 करोड़ रुपये तक का लोन दे रहा है, जिसमें महिलाओं और पूर्वोत्तर की इकाइयों के लिए 85% तक का गारंटी कवर मौजूद है। दूसरी बड़ी समस्या गाँवों में बिजली की कटौती, ख़राब सड़कें और इंटरनेट की कमी से जुड़ी है। इसे दूर करने के लिए 'पीएम-एफएमई' योजना के तहत बुनियादी ढाँचा और साझा सुविधा केंद्र बनाए जा रहे हैं। पुरानी मशीनों और औज़ारों से होने वाले नुकसान से बचने के लिए सरकार अलग-अलग राज्यों में नए टेक्नोलॉजी सेंटर खोल रही है; जैसे कोयंबटूर (Coimbatore) में 200 करोड़ रुपये की लागत से बना नया केंद्र, जहाँ आधुनिक मशीनें और डिज़ाइन लैब मौजूद हैं। इसके अलावा, डिजिटल साक्षरता और ई-कॉमर्स की समझ न होने के कारण कारीगर बड़े बाज़ारों तक नहीं पहुँच पाते थे। अब 'पीएम विश्वकर्मा योजना' के तहत उन्हें डिजिटल लेन-देन की ट्रेनिंग और आर्थिक प्रोत्साहन दिया जा रहा है। बाज़ार से पैसा मिलने में अगर 45 दिन से ज़्यादा की देरी हो जाए, तो कारीगरों की पूँजी फँस जाती है। इसे रोकने के लिए एमएसएमई नियमों को कड़ा किया गया है और 'टीआरईडीएस' प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए बिलों का जल्दी भुगतान सुनिश्चित किया जा रहा है। साथ ही, उत्पादों की ब्रांडिंग बेहतर करने के लिए स्फूर्ति, जीईएम और ओएनडीसी जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स का इस्तेमाल हो रहा है। हुनरमंद युवाओं को गाँवों से बाहर जाने से रोकने के लिए स्किल इंडिया मिशन (Skill India Mission) के माध्यम से उन्हें स्थानीय स्तर पर ही प्रशिक्षित किया जा रहा है। ये सभी नीतियाँ आर्थिक ढाँचे को तो सहारा देती ही हैं, लेकिन इसके पीछे के मानवीय दर्शन को समझने के लिए हमें एक बार फिर गांधी जी के शारीरिक श्रम वाले विचारों की ओर लौटना होगा।

महात्मा गांधी का 'ब्रेड लेबर' दर्शन शारीरिक श्रम और सामाजिक समानता को कैसे जोड़ता है?
महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) का मानना था कि इंसान और समाज के उत्थान के लिए 'ब्रेड लेबर' यानी 'रोटी के लिए शरीर-श्रम' का सिद्धांत बहुत ज़रूरी है। यह विचार उन्हें लियो टॉलस्टॉय (Leo Tolstoy) की लेखनी, जॉन रस्किन (John Ruskin) की किताब अनटू दिस लास्ट (Unto This Last) और रूसी लेखक टी.एम. बॉन्डारेफ (T.M. Bondaref) के विचारों से मिला था। गांधी जी को यही बात भगवद्गीता के तीसरे अध्याय में भी दिखी, जहाँ कहा गया है कि जो इंसान बिना सेवा या श्रम किए भोजन करता है, वह असल में चोरी का अन्न खाता है। बाइबल में भी ज़िक्र है कि इंसान अपने माथे के पसीने से ही अपनी रोटी कमाएगा। गांधी जी का सीधा तर्क था कि प्रकृति ने इंसान को इसलिए बनाया है ताकि वह अपने भोजन के लिए शारीरिक मेहनत करे। अगर कोई स्वस्थ व्यक्ति एक पल भी आलस में बिताता है, तो वह अपने पड़ोसियों पर बोझ बनता है, और ऐसा आचरण सीधे तौर पर अहिंसा के ख़िलाफ़ है। उनका कहना था कि दुनिया में पूँजी और मज़दूरी के बीच का झगड़ा तभी ख़त्म हो सकता है, जब हर कोई अपनी रोज़ी-रोटी के लिए शारीरिक श्रम करे। ज़रा सोचिए, अगर कोई अमीर व्यक्ति दिन भर बिस्तर पर पड़ा रहे, तो वह बीमार हो जाएगा। इसीलिए वह कसरत करता है। गांधी जी का सवाल था कि क्यों न वह कसरत समाज के लिए एक उपयोगी उत्पादक काम के रूप में की जाए? उन्होंने यह भी साफ़ किया कि बौद्धिक काम की अपनी एक इज़्ज़तदार जगह है, लेकिन वह कभी भी शारीरिक मेहनत का विकल्प नहीं बन सकता। जिस तरह आत्मा की शांति के लिए किए गए दिमागी काम से पेट नहीं भर सकता, उसी तरह शरीर की ज़रूरतें सिर्फ़ शरीर की मेहनत से ही पूरी होनी चाहिए। गांधी जी के आदर्श समाज में एक डॉक्टर, वकील या शिक्षक निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा करेंगे, और उन्हें भी एक सफ़ाई कर्मचारी के बराबर ही वेतन पाने का नैतिक अधिकार होगा। उन्होंने हर किसी को अपनी साफ़-सफ़ाई खुद करने और स्वच्छता की ज़िम्मेदारी उठाने की सीख दी, ताकि समाज में किसी भी काम को छोटा या नीचा न माना जाए। 1925 में तो उन्होंने यहाँ तक साफ़ कह दिया था कि वोट देने का अधिकार सिर्फ़ उन्हीं वयस्कों को मिलना चाहिए जो देश के लिए किसी न किसी तरह का शारीरिक श्रम करते हों।

क्या गांधीवादी आर्थिक विचार आज के समाज को एक नई दिशा दे सकते हैं?
गांधी जी की खादी, कुटीर उद्योग और शारीरिक मेहनत की सीख कोई बीते हुए कल की बात नहीं है, बल्कि यह भविष्य की एक टिकाऊ अर्थव्यवस्था का जीवंत ब्लूप्रिंट है। जब कोई व्यक्ति अपने हाथों से काम करता है, तो वह न सिर्फ़ अपने परिवार का पेट पालता है, बल्कि समाज में बराबरी लाने और पर्यावरण को बचाने में भी अपना योगदान देता है। मेरठ (Meerut) के हथकरघा बुनकरों से लेकर देश के दूर-दराज़ कोनों में फैले कारीगरों तक जब हर हाथ को सम्मानजनक काम मिलेगा और हर उत्पाद को उचित बाज़ार मिलेगा, तभी आत्मनिर्भर भारत का संकल्प पूरी तरह साकार हो सकेगा।

संदर्भ

1. https://tinyurl.com/27zxg9n2

2. https://tinyurl.com/276sm5of

3. https://tinyurl.com/24udqeg4

Definitions of the Post Viewership Metrics

A. City Readerships (FB + App) - This is the total number of city-based unique readers who reached this specific post from the Prarang Hindi FB page and the Prarang App.

B. Website (Google + Direct) - This is the Total viewership of readers who reached this post directly through their browsers and via Google search.

C. Messaging Subscribers - This is the total viewership from City Portal subscribers who opted for hyperlocal daily messaging and received this post.

D. Total Viewership - This is the Sum of all our readers through FB+App, Website (Google+Direct), Email, WhatsApp, and Instagram who reached this Prarang post/page.

E. The Reach (Viewership) - The reach on the post is updated either on the 6th day from the day of posting or on the completion (Day 31 or 32) of one month from the day of posting.