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ग्रेट बनयन (Great Banyan) या बरगद का पेड़ भी उन पेड़ों में से एक है, जिनका जीवन काल सबसे अधिक होता है। बरगद का यह पेड़ कोलकाता के निकट आचार्य जगदीश चंद्र बोस भारतीय वनस्पति उद्यान शिबपुर, हावड़ा में स्थित है। यूं तो, उद्यान में अन्य विदेशी पौधों का संग्रह भी है, लेकिन लोग अधिकतर इस पेड़ को देखने ही उद्यान में आते हैं। दो भीषण चक्रवातों से प्रभावित होने के कारण इसका मुख्य तना क्षतिग्रस्त हुआ, इसलिए शेष भाग को स्वस्थ रखने के लिए 1925 में पेड़ के मुख्य तने को काट दिया गया। इसकी परिधि के आसपास 330 मीटर लंबी (1,080 फीट) सड़क बनायी गयी है, लेकिन यह उसे भी आवरित करता है। यह पेड़ देखने में कई पेडों का एक समूह लगता है, किंतु वास्तव में यह एक ही है, जो लगभग 250 साल से भी अधिक पुराना है। पेड़ द्वारा अधिग्रहित किया गया क्षेत्र लगभग 18,918 वर्ग मीटर है। पेड़ के वर्तमान शीर्ष भाग की परिधि 486 मीटर है, और उच्चतम शाखाएं 24.5 मीटर तक बढ़ सकती हैं। इसकी ऊंचाई लगभग गेटवे ऑफ इंडिया (Gateway of India) के बराबर है। 20 मई, 2020 को पश्चिम बंगाल से गुजरे चक्रवात अम्फान (Amphan) के कारण पेड़ की कई अवलंबी (Prop) जड़ों को नुकसान झेलना पड़ा। समृद्ध ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संबंधों के साथ बरगद को भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में अर्थपूर्ण या सार्थक पेड़ माना जाता है। भारत में इसे वट-वृक्ष के नाम से जाना जाता है, जो मृत्यु के देवता, यम से जुड़ा हुआ है, और अक्सर गांवों के बाहर श्मशान के पास लगाया जाता है। हिंदू धर्म में, यह कहा जाता है, कि भगवान कृष्ण ने जब पवित्र संस्कृत ग्रंथ, भगवद गीता का उपदेश दिया, तब वे ज्योतिसर में एक बरगद के पेड़ के नीचे खड़े थे।
2,500 साल पहले लिखे गए हिंदू ग्रंथों में बरगद को एक लौकिक 'विश्व वृक्ष' के रूप में वर्णित किया गया है। इनके अनुसार बरगद की जड़ों का सम्बंध स्वर्ग से है, जो आशीर्वाद देने के लिए नीचे की ओर बढ़ती हैं। सदियों से इस पेड़ ने प्रजनन क्षमता, जीवन और पुनर्जन्म के प्रतीक के रूप में महत्व प्राप्त किया है, इसके अलावा सदियों से इसने दवा और भोजन के स्रोत के रूप में भी कार्य किया है। इसकी छाल और जड़ों का उपयोग आज भी कई प्रकार के विकारों के इलाज के लिए किया जाता है, विशेष रूप से आयुर्वेदिक चिकित्सा में। जब अंग्रेजों ने भारत पर कब्जा किया, तब उनके शासन का विरोध करने वाले विद्रोहियों को फांसी देने के लिए उन्होंने बरगद के पेड़ का इस्तेमाल किया। 1850 के दशक तक, सैकड़ों पुरुषों को बरगद की शाखाओं द्वारा फांसी दी गयी। जब भारत को स्वतंत्रता मिली, तब लोगों ने बरगद को फिर से याद किया और इसे राष्ट्रीय पेड़ बना दिया।
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