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रामपुरवासियो, गर्मियों की तपती दोपहरों में जब हरियाली मुरझाने लगती है और सूरज अपनी पूरी तपिश से धरती को तपाता है, तब कहीं सड़क किनारे या किसी पुराने बाग़ में एक ऐसा पेड़ दिखता है जो हर नजर को अपनी ओर खींच लेता है, उसकी शाखाओं पर फैले अंगारे जैसे फूल, मानो किसी कलाकार ने नीले आकाश पर लाल-नारंगी रंगों की बौछार कर दी हो। यही है गुलमोहर का वृक्ष, प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक पहचान और औषधीय गुणों का एक अद्भुत संगम। यह पेड़ केवल अपनी सुंदरता के लिए नहीं जाना जाता, बल्कि इसकी पत्तियाँ और फूल गर्मियों में ठंडी छाया और मानसिक राहत भी देते हैं। गुलमोहर को "जंगल की लौ" (Flame of the Forest) कहा जाता है क्योंकि जब यह पूरा वृक्ष फूलों से लद जाता है, तो दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह जल रहा हो। भारत में इसे ‘कृष्ण चूड़’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसके फूल भगवान कृष्ण को समर्पित माने जाते हैं। यह पेड़ न सिर्फ हमारे पर्यावरण को समृद्ध बनाता है, बल्कि रामपुर जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नगरों की सड़कों, पार्कों और बाग़-बग़ीचों की शोभा भी बढ़ाता है। गुलमोहर केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि भावनाओं से जुड़ी एक अनुभूति है, बचपन की गर्मियों की यादें, किसी छांव में बैठा सुस्ताता दोपहर, या दूर से दिखती लाल फूलों की छटा जो मन को अनायास ही प्रसन्न कर दे।
इस लेख में हम गुलमोहर वृक्ष से जुड़ी पाँच महत्वपूर्ण बातों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। सबसे पहले, हम जानेंगे कि इस वृक्ष की वनस्पति रचना कैसी होती है, इसके फूल, पत्तियाँ और फल किन विशिष्टताओं से युक्त होते हैं। फिर, हम पढ़ेंगे कि गुलमोहर का ऐतिहासिक और भौगोलिक मूल क्या है और यह कैसे मेडागास्कर (Madagascar) से निकलकर पूरी दुनिया में फैल गया। इसके बाद, हम चर्चा करेंगे कि भारतीय संस्कृति में इसे ‘कृष्ण चूड़’ क्यों कहा जाता है और यह धार्मिक दृष्टि से कैसे जुड़ा है। आगे, हम देखेंगे कि ग्रीष्म ऋतु में जब यह वृक्ष फूलों से लद जाता है, तो उसका दृश्य कितना मनोहारी होता है। अंत में, हम जानेंगे कि इसके औषधीय गुण क्या हैं और यह कैसे मधुमेह, डायरिया व त्वचा रोगों में लाभकारी होता है।
गुलमोहर वृक्ष की वनस्पति विशेषताएँ और पहचान
गुलमोहर का वैज्ञानिक नाम डेलोनिक्स रेजिया (Delonix regia) है और यह अपने आकर्षक स्वरूप और छत्री जैसी छाया के लिए जाना जाता है। इसकी पत्तियाँ इमली की पत्तियों की तरह दिखती हैं, बहुत सी छोटी-छोटी पत्रिकाओं से मिलकर बनी होती हैं, जिनकी लंबाई लगभग 30 से 50 सेंटीमीटर तक हो सकती है। जब आप इसकी शाखाओं को नज़दीक से देखते हैं, तो हर शाखा पर हरे रंग की सघन पत्तियाँ मन को एक ठंडक का अहसास देती हैं। गुलमोहर के फूल बड़े, भव्य और गहरे लाल या नारंगी रंग के होते हैं, जो देखने में अग्निशिखा जैसे प्रतीत होते हैं। हर फूल में पाँच पंखुड़ियाँ होती हैं, जिनमें से एक विशेष पंखुड़ी पर सफेद और पीले रंग की आभा होती है, यह पंखुड़ी जैसे फूल की भाषा में एक विशेष ‘संदेशवाहक’ होती है। इसकी फलियाँ लंबी, मजबूत और लकड़ी जैसी होती हैं, जो समय के साथ गहरे भूरे या काले रंग की हो जाती हैं। जब यह फलियाँ टूटती हैं, तो इनके अंदर से मटर के दानों की तरह गुठलियाँ निकलती हैं, जिन्हें देखकर बच्चे भी अक्सर उत्साहित हो जाते हैं। कुल मिलाकर, यह पेड़ न केवल देखने में सुंदर है, बल्कि प्रकृति के सौंदर्यशास्त्र की एक जीवंत मिसाल भी है।
गुलमोहर का ऐतिहासिक और भौगोलिक मूल
गुलमोहर का जन्मदात्री देश है मेडागास्कर, जो अफ्रीका के पूर्वी तट के पास स्थित एक द्वीप है और जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। 18वीं शताब्दी के दौरान, जब औपनिवेशिक शक्तियाँ विभिन्न पौधों को अपने साथ ले जाया करती थीं, गुलमोहर को पहली बार मेडागास्कर से सिंगापुर लाया गया। वहाँ से यह वृक्ष धीरे-धीरे भारत, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय इलाकों में फैल गया। आज यह दुनिया के अनेक हिस्सों में सड़कों, उद्यानों और विद्यालयों के प्रांगणों की शोभा बन चुका है। हालाँकि, यह दुखद है कि मेडागास्कर में इसका प्राकृतिक रूप अब दुर्लभ होता जा रहा है और यह अपने ही जन्मस्थान में संकटग्रस्त प्रजातियों में गिना जाने लगा है। इसके विपरीत, शहरों में, खासकर भारत जैसे देशों में, यह वृक्ष आम लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुका है, कभी स्कूल के मैदान में, कभी कॉलोनी के कोने पर, तो कभी मंदिर के आँगन में।
भारतीय संस्कृति में गुलमोहर का धार्मिक और स्थानीय महत्त्व
भारत जैसे देश में जहाँ हर वृक्ष, हर फूल का कोई न कोई सांस्कृतिक या धार्मिक अर्थ होता है, वहाँ गुलमोहर भी अछूता नहीं रहा। इसे ‘कृष्ण चूड़’ कहा जाता है, क्योंकि इसके लाल पुष्प भगवान कृष्ण को समर्पित किए जाते हैं। गाँवों और कस्बों में आज भी लोग इसके फूलों को पूजा-पाठ में उपयोग करते हैं, विशेषकर गर्मियों की शुरुआत में। यह वृक्ष कई बार नवचेतना और उर्जा का प्रतीक भी माना जाता है, क्योंकि जब अन्य वृक्ष सूखते नज़र आते हैं, तब गुलमोहर पूरे यौवन में खिल उठता है। साथ ही, इस वृक्ष ने शहरी जीवन में भी अपनी छाप छोड़ी है, गुलमोहर रोड, गुलमोहर कॉलोनी, गुलमोहर गार्डन जैसे नाम भारतीय शहरों में आम हैं। मेरठ जैसे शहरों में, जहाँ गर्मियों की धूप तीव्र होती है, वहाँ यह वृक्ष न केवल छाया देता है बल्कि आम लोगों के मानस में सौंदर्य और शांति का प्रतीक बन चुका है। गुलमोहर का यह धार्मिक और स्थानीय महत्व इसे एक सामान्य सजावटी पेड़ से कहीं अधिक बनाता है, यह परंपरा, सौंदर्य और श्रद्धा का सुंदर संगम है।
ग्रीष्म ऋतु का सौंदर्य: फूलों से लदे गुलमोहर का दृश्य
जब गर्मी अपने चरम पर होती है और हवा में तपिश घुली होती है, तब गुलमोहर के वृक्ष अपने पूरे वैभव में खिलते हैं। अप्रैल से जून के बीच, जब यह वृक्ष लाल-नारंगी फूलों से लद जाता है, तो दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी कलाकार ने पेंट ब्रश से लाल रंग के छींटें पूरे आसमान पर बिखेर दिए हों। ये फूल इतने घने होते हैं कि कभी-कभी पत्तियाँ भी उनके बीच छिप जाती हैं। जब हल्की हवा चलती है और गुलमोहर के फूल नीचे गिरते हैं, तो ज़मीन पर एक लाल कालीन सा बिछ जाता है, जिसे देख कर मन अभिभूत हो जाता है। इसी अद्भुत दृश्य के कारण इसे “जंगल की लौ” कहा जाता है, क्योंकि यह पेड़ मानो जलता नहीं, बल्कि खिलता है। चाहे कोई राहगीर हो, साइकिल सवार या स्कूली छात्र, हर कोई कुछ क्षणों के लिए इसकी छाया और सौंदर्य में खो जाता है। इस मौसम में गुलमोहर न केवल एक वृक्ष होता है, बल्कि एक कविता बन जाता है, प्रकृति की सबसे रंगीन कविताओं में से एक।
गुलमोहर के औषधीय लाभ और उपयोग
गुलमोहर की सुंदरता केवल बाहरी नहीं है, बल्कि इसके भीतर भी कई प्रकार के चिकित्सकीय गुण छिपे हुए हैं। पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों और लोकज्ञान में गुलमोहर के पुष्पों, छाल और बीजों का उपयोग विभिन्न बीमारियों के उपचार में किया जाता रहा है। मधुमेह के रोगियों के लिए यह रक्त शर्करा नियंत्रित करने में सहायक माना जाता है। वहीं डायरिया (diarrhea) जैसी पाचन संबंधी समस्याओं में इसके फूलों का काढ़ा लाभकारी होता है। इसकी छाल से निकाला गया रस त्वचा रोगों जैसे खाज-खुजली में उपयोगी होता है। इसके अलावा, यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ा सकता है। आज जब प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक उपचार फिर से लोकप्रिय हो रहे हैं, ऐसे में गुलमोहर एक बार फिर से स्वास्थ्य के क्षेत्र में चर्चा में आने लगा है। यह वृक्ष हमें सिखाता है कि सुंदरता और उपयोगिता एक साथ चल सकते हैं, जो देखने में मन मोह ले, वही शरीर के लिए औषधि भी बन सकता है।
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