क्यों रामपुर के लोगों के लिए टीकाकरण अपनाना आज के दौर की सबसे बड़ी ज़रूरत बन गया है?

विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
29-10-2025 09:20 AM
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क्यों रामपुर के लोगों के लिए टीकाकरण अपनाना आज के दौर की सबसे बड़ी ज़रूरत बन गया है?

रामपुरवासियो, क्या आपने कभी ठहरकर सोचा है कि जब टीकाकरण हमारे स्वास्थ्य और जीवन को सुरक्षित रखने का सबसे मज़बूत और भरोसेमंद साधन है, तब भी समाज में ऐसे लोग क्यों मौजूद हैं जो इसे अपनाने से हिचकिचाते हैं? टीकाकरण केवल किसी एक व्यक्ति को ही नहीं बचाता, बल्कि पूरे समुदाय को संक्रमण की श्रृंखला से मुक्त कर उसकी रक्षा करता है। यह एक ऐसा कवच है जो अदृश्य रूप से हर घर और हर परिवार को सुरक्षा प्रदान करता है। खसरा, पोलियो और इन्फ़्लुएंज़ा (influenza) जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारियों पर नियंत्रण पाने में टीकों का योगदान अतुलनीय रहा है। पोलियो, जिसने कभी न जाने कितने बच्चों की ज़िंदगियाँ और परिवारों की खुशियाँ छीन ली थीं, आज लगभग समाप्त हो चुका है और यह केवल टीकों की ही देन है। फिर भी, रामपुर जैसे शहरों और गाँवों में अब भी ऐसी कई भ्रांतियाँ, अफ़वाहें और डर मौजूद हैं, जो लोगों को टीका लगवाने से रोकते हैं। यह हिचकिचाहट कभी धार्मिक या सामाजिक मान्यताओं के कारण होती है, तो कभी गलत सूचनाओं या भरोसे की कमी की वजह से। ऐसे में यह ज़रूरी है कि हम इस विषय को गहराई से समझें और जानें कि टीकाकरण से लोगों को किस तरह का वास्तविक लाभ मिलता है, क्यों हिचकिचाहट उत्पन्न होती है और कैसे हम सब मिलकर इस डर को दूर कर सकते हैं। जब हम इस पर गंभीरता से विचार करेंगे, तभी हम रामपुर को एक ऐसा शहर बना पाएँगे जो पूरी तरह स्वस्थ, सुरक्षित और भावी पीढ़ियों के लिए मज़बूत नींव पर खड़ा हो।
आज हम सबसे पहले जानेंगे कि टीकाकरण का महत्व क्या है और यह बीमारियों से सुरक्षा में क्यों अहम है। इसके बाद हम समझेंगे कि वैक्सीन हिचकिचाहट (Vaccine Hesitancy) क्या होती है और इसके अलग-अलग स्तर कैसे दिखते हैं। फिर हम ‘3 सी’ मॉडल (3C Model) के ज़रिए उन प्रमुख कारणों को देखेंगे जो हिचकिचाहट को जन्म देते हैं। इसके अलावा, हम जानेंगे कि समुदाय में जागरूकता फैलाकर और सही रणनीतियों से इस समस्या को कैसे दूर किया जा सकता है। अंत में, हम उन बीमारियों पर भी नज़र डालेंगे जिन्हें टीकाकरण ने न सिर्फ नियंत्रित किया है बल्कि लगभग समाप्त करने में सफलता पाई है।

टीकाकरण का महत्व: बीमारियों से बचाव का सबसे कारगर साधन
टीकाकरण को अक्सर स्वास्थ्य का सुरक्षा कवच कहा जाता है, और यह बात बिल्कुल सही है। जब किसी व्यक्ति को टीका लगाया जाता है, तो उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली उस बीमारी के खिलाफ़ एक “ढाल” तैयार कर लेती है। इसका असर यह होता है कि अगर कभी शरीर उस बीमारी के संपर्क में भी आता है तो वह गंभीर रूप से प्रभावित नहीं होता। यही कारण है कि पोलियो जैसी खतरनाक बीमारी, जिसने लाखों बच्चों को अपंग बना दिया था, आज भारत से पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। टीकाकरण की ताक़त केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती। जब समाज के अधिकतर लोग टीका लगवा लेते हैं, तो उसे "हर्ड इम्युनिटी" (Herd Immunity) कहते हैं। इसका मतलब यह है कि भले ही कुछ लोगों ने टीका न लगाया हो, लेकिन संक्रमण फैलने की चेन टूट जाती है। इससे पूरा समाज सुरक्षित रहता है। यही वजह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और भारत सरकार बार-बार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि हर नागरिक टीका अवश्य लगवाए।

वैक्सीन हिचकिचाहट क्या है और इसके अलग-अलग स्तर
टीके उपलब्ध होने के बावजूद अगर लोग उन्हें समय पर नहीं लगवाते या पूरी तरह से इनकार कर देते हैं, तो इसे वैक्सीन हिचकिचाहट कहा जाता है। यह हिचकिचाहट कई रूपों में दिखाई देती है। कुछ लोग तो सीधे कहते हैं कि उन्हें कोई भी टीका नहीं लगवाना है, जबकि कुछ लोग केवल कुछ विशेष टीकों को ही नज़रअंदाज़ कर देते हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि टीका लगवाना ज़रूरी है, लेकिन वे देरी करते हैं - शायद डर, अफवाह या जानकारी की कमी की वजह से। दिलचस्प बात यह है कि कई बार लोग खुद टीका नहीं लगवाते, लेकिन दूसरों को इसे लेने की सलाह देते हैं। यह विरोधाभास दिखाता है कि हिचकिचाहट हमेशा “ना” कहने का मामला नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक उलझन और असमंजस की स्थिति भी हो सकती है। इसलिए इसे समझने और दूर करने के लिए सही जानकारी और संवाद बेहद ज़रूरी है।

‘3 सी’ मॉडल: आत्मविश्वास, आत्मसंतुष्टि और सुविधा के पहलू
विशेषज्ञों ने वैक्सीन हिचकिचाहट को समझने के लिए एक सरल लेकिन प्रभावी मॉडल दिया है, जिसे ‘3 सी’ मॉडल कहा जाता है।

  • आत्मविश्वास (Confidence) की कमी: यह तब होती है जब लोगों को लगता है कि वैक्सीन सुरक्षित नहीं है, या यह सोचते हैं कि सरकार, स्वास्थ्यकर्मी या वैज्ञानिकों की मंशा सही नहीं है। अफवाहें और सोशल मीडिया (social media) पर फैलाई गई गलत जानकारी भी आत्मविश्वास को कम करती हैं।
  • आत्मसंतुष्टि (Complacency): यह स्थिति तब आती है जब लोग बीमारियों को गंभीरता से नहीं लेते। उन्हें लगता है कि “हमें तो कभी नहीं हुआ, आगे भी नहीं होगा” या “ये बीमारी अब ख़त्म हो गई है, टीके की ज़रूरत क्या है?”।
  • सुविधा (Convenience) की कमी: जब टीका आसानी से उपलब्ध न हो, टीकाकरण केंद्र बहुत दूर हो, लागत ज़्यादा हो या फिर भाषा और जानकारी की समस्या हो - लोग अनजाने में टीका लगवाने से पीछे हट जाते हैं।

वैक्सीन हिचकिचाहट दूर करने की रणनीतियाँ
हिचकिचाहट केवल जानकारी की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और भावनात्मक पहलुओं से भी जुड़ी होती है। इसलिए इसे दूर करने के लिए बहुस्तरीय रणनीतियाँ अपनानी पड़ती हैं।

  • सामुदायिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण: अगर स्वास्थ्यकर्मी, धार्मिक नेता और स्थानीय प्रभावशाली महिलाएँ मिलकर लोगों को जागरूक करें, तो समाज का भरोसा बढ़ता है। लोग उन चेहरों पर ज़्यादा विश्वास करते हैं जिन्हें वे रोज़ देखते और मानते हैं।
  • प्रोत्साहन आधारित दृष्टिकोण: कई बार सरकारें और संस्थाएँ लोगों को छोटे-छोटे पुरस्कार जैसे राशन, प्रमाण पत्र, कपड़े या आर्थिक सहायता देती हैं ताकि वे टीका लगवाने के लिए प्रेरित हों। यह तरीका ग्रामीण इलाक़ों में काफी कारगर साबित हुआ है।
  • प्रौद्योगिकी आधारित स्वास्थ्य साक्षरता: मोबाइल फ़ोन से स्थानीय भाषा में एसएमएस (SMS), कॉल या वीडियो संदेश भेजे जाएँ तो लोग आसानी से समझ पाते हैं। इससे न सिर्फ़ जानकारी पहुँचती है बल्कि याद भी रहती है कि कब और कहाँ टीका लगवाना है।
  • मीडिया जुड़ाव: टीवी, रेडियो, अख़बार और अब सोशल मीडिया - ये सभी चैनल बहुत असरदार हैं। जब कोई लोकप्रिय नेता, अभिनेता या स्थानीय नायक वैक्सीन का समर्थन करता है, तो लोग उसे गंभीरता से लेते हैं।

टीकाकरण से नियंत्रित और समाप्त की गई प्रमुख बीमारियाँ
दुनिया और भारत, दोनों ने टीकाकरण के ज़रिए कई बीमारियों पर जीत हासिल की है।

  • पोलियो: कभी यह बीमारी बच्चों को आजीवन अपंग बना देती थी। लगातार अभियानों और वैक्सीनेशन की बदौलत भारत को 2014 में पोलियो-मुक्त घोषित किया गया। यह टीकाकरण का सबसे बड़ा उदाहरण है।
  • खसरा: यह एक संक्रामक बीमारी है, जो बच्चों में बहुत तेज़ी से फैलती है। खसरे का टीका लगने के बाद इसके मामलों में भारी गिरावट आई है।
  • तपेदिक (टीबी): बीसीजी टीका बच्चों को इस संक्रमण से बचाता है। हालाँकि टीबी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, लेकिन इसके प्रकोप को काफी हद तक नियंत्रित किया गया है।
  • हेपेटाइटिस ए और बी: ये जिगर को प्रभावित करने वाली खतरनाक बीमारियाँ हैं। इनके टीके ने गंभीर संक्रमण और जटिलताओं से लाखों लोगों को बचाया है।
  • इन्फ़्लुएंज़ा: मौसमी फ़्लू (flu) के लिए हर साल लगाए जाने वाले टीके लक्षणों को कम करते हैं और मौत के ख़तरे को घटाते हैं। खासकर बुज़ुर्गों और बच्चों के लिए यह बहुत अहम है।

संदर्भ- 
https://tinyurl.com/23xowkaj 
https://tinyurl.com/23sdfg5s 
https://tinyurl.com/27tklc2h 
https://tinyurl.com/24myx947  

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