क्यों रज़ा लाइब्रेरी, रामपुर की सिर्फ़ शान नहीं बल्कि हमारे शहर की सबसे कीमती धरोहर है?

मध्यकाल : 1450 ई. से 1780 ई.
09-01-2026 09:20 AM
क्यों रज़ा लाइब्रेरी, रामपुर की सिर्फ़ शान नहीं बल्कि हमारे शहर की सबसे कीमती धरोहर है?

रामपुर की शान सिर्फ़ इसकी नवाबी तहज़ीब, नज़ाकत, शायरी और स्वाद से भरी रसोई तक सीमित नहीं है। इस शहर की मिट्टी में एक ऐसा अनमोल ख़ज़ाना भी छुपा है, जिसे देखने दुनिया भर से विद्वान, शोधकर्ता और इतिहास प्रेमी आते हैं - और वह है रामपुर रज़ा लाइब्रेरी। यह लाइब्रेरी केवल एक भवन नहीं, बल्कि बीते सैकड़ों वर्षों की संस्कृति, कला और ज्ञान का ज़िंदा दस्तावेज़ है। जब कोई व्यक्ति इस लाइब्रेरी में क़दम रखता है, तो उसे ऐसा महसूस होता है जैसे वह समय की किसी सुरंग से गुज़र रहा हो - जहाँ हर किताब एक अध्याय है, हर पांडुलिपि एक सभ्यता की कहानी है और हर सुलेख एक कलाकार की आत्मा। यहाँ की दीवारें भी मानो फुसफुसाकर कहती हैं कि राजा, नवाब, विद्वान, कलाकार, कवि और इतिहास ने यहाँ अपने निशान छोड़े हैं। रामपुरवासियों के लिए यह लाइब्रेरी सिर्फ़ गर्व का विषय नहीं, बल्कि एक विरासत है - ऐसी विरासत जो बताती है कि ज्ञान जब संरक्षित किया जाता है, तो वह सिर्फ़ किताबों में नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सोच और सभ्यता में दर्ज हो जाता है।
आज के इस लेख में हम रामपुर रज़ा लाइब्रेरी के इतिहास और उसके विकास को समझेंगे, जहाँ से इसकी शुरुआत हुई और कैसे यह विश्व-स्तरीय धरोहर बनी। फिर हम लाइब्रेरी में मौजूद अनमोल संग्रह जैसे पांडुलिपियाँ, पुस्तकें और दुर्लभ दस्तावेजों पर नज़र डालेंगे। इसके बाद, हम इसकी सांस्कृतिक और कलात्मक विरासत को जानेंगे जिसमें लघुचित्र, सुलेख और ऐतिहासिक वस्तुएँ शामिल हैं। साथ-ही-साथ हम लाइब्रेरी में मौजूद विशेष शोध सुविधाएँ, संरक्षण तकनीक और बच्चों के लिए बनाए गए सेक्शन के बारे में भी सीखेंगे। अंत में, हम समझेंगे कि भारत सरकार द्वारा इसे “राष्ट्रीय महत्व की लाइब्रेरी” का दर्जा क्यों दिया गया और यह संस्था आज भारत की बौद्धिक पहचान का कितना अहम हिस्सा है।

रामपुर रज़ा लाइब्रेरी की ऐतिहासिक स्थापना और विकास
रज़ा लाइब्रेरी का इतिहास केवल एक भवन या संग्रहालय की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस राजसी दृष्टि का प्रतीक है जिसने रामपुर को ज्ञान, कला और संस्कृति का केंद्र बनाया। इसकी शुरुआत वर्ष 1774 में तब हुई, जब रामपुर के संस्थापक नवाब फैजुल्लाह खान ने अपने निजी संग्रह को व्यवस्थित रूप में संजोना शुरू किया। उस समय किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि यह छोटा सा साहित्यिक बीज आने वाले समय में एक ऐसा बरगद बनेगा जिसके नीचे इतिहास, संस्कृति और विद्या सदियों तक शरण लेंगी। वर्षों के दौरान, रामपुर के अन्य नवाबों ने इसे सिर्फ सुरक्षित नहीं रखा, बल्कि इसे विस्तार देकर और समृद्ध बनाया। नवाब मुहम्मद यूसुफ़ अली खान, जो खुद एक विद्वान और उर्दू के संरक्षक माने जाते थे, ने सुलेख, साहित्य, इतिहास और कला से जुड़े अलग-अलग विभाग बनाए और कई विद्वानों, सुलेखकारों और पुस्तक-संग्रहकर्ताओं को लाइब्रेरी से जोड़ा। इसके बाद नवाब कल्बे अली खान ने दुर्लभ पांडुलिपियों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और लघुचित्रों के संग्रह को और विस्तार दिया। वहीं नवाब हामिद अली खान ने वह शानदार इमारत - हामिद मंज़िल - बनवाई, जिसकी भव्यता स्वयं इस संग्रहालय की शान है। अंतिम शाही संरक्षक नवाब रज़ा अली खान ने संगीत, कला और ऐतिहासिक दस्तावेजों के विस्तार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई - और उनके सम्मान में इसका नाम आधिकारिक रूप से रज़ा लाइब्रेरी रखा गया।

लाइब्रेरी के अनमोल संग्रह: पांडुलिपियाँ, पुस्तकें और दुर्लभ दस्तावेज
रज़ा लाइब्रेरी दुनिया के उन कुछ संस्थानों में से एक है जहाँ ज्ञान सिर्फ़ किताबों में नहीं - बल्कि हाथों की लिखावट, स्याही की चमक, कागज़ की सुगंध और इतिहास की गूंज में बसता है। यहाँ का संग्रह इतना विशाल और अनूठा है कि इसे देखना मानो सदियों में यात्रा करने जैसा अनुभव है। यहाँ संरक्षित हैं:

  • 17,000+  दुर्लभ पांडुलिपियाँ
  • 60,000+  मुद्रित पुस्तकें
  • 3000+  इस्लामी सुलेख नमूने
  • ताड़पत्र और भोजपत्र पांडुलिपियाँ
  • 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 19वीं सदी तक के ऐतिहासिक सिक्के

यह संग्रह हिंदी, उर्दू, फ़ारसी, संस्कृत, अरबी, पश्तो, तुर्की, तमिल और अन्य भाषाओं में ज्ञान की विविधता को प्रदर्शित करता है। यहाँ संरक्षित ग्रंथों में खगोलशास्त्र, चिकित्सा, गणित, कूटनीति, संगीत, योद्धा रणनीति, सुलेख, धर्म, इतिहास और कविता जैसे विषयों की सामग्री मिलती है। इनमें से कई पांडुलिपियाँ दुनिया में एकमात्र मानी जाती हैं - और यही इस लाइब्रेरी को वैश्विक शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और विद्वानों के लिए एक अमूल्य धरोहर बनाता है।

कला और सांस्कृतिक धरोहर: लघुचित्र, सुलेख और ऐतिहासिक वस्तुएँ
रज़ा लाइब्रेरी का सौंदर्य केवल साहित्यिक संपदा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय और इस्लामी कला की एक अद्भुत गैलरी भी है। यहाँ सैकड़ों वर्षों में विकसित हुई कला परंपराओं की धड़कनें आज भी सांस लेती हैं। लाइब्रेरी में संरक्षित लघुचित्र कई कला-शैलियों के प्रतिनिधि हैं, जैसे:

  • मुगल लघुचित्र कला
  • दक्कन शैली
  • कांगड़ा और पहाड़ी चित्रकला
  • अवध और राजस्थानी विद्यालय

इन चित्रों में राजशाही जीवन, युद्ध, प्रकृति, संगीत, भारतीय दर्शन और धार्मिक कथाओं के दृश्य अत्यंत जीवंतता से अंकित हैं। इसके अलावा, इस्लामी सुलेख का संग्रह अपने अद्भुत शिल्प, स्वर्ण-अक्षरों में लिखे कुरान, जटिल कलमकारियों, और हाथ से कागज़ पर बनाई गई डिज़ाइनों के कारण विश्व-स्तरीय माना जाता है। यह भाग संग्रहालय का वह हिस्सा है जहाँ कला, धर्म और सौंदर्य एक साथ दिखाई देते हैं।

विशेष अनुभाग: शोध सुविधाएँ, संरक्षण प्रयोगशाला और बाल-विभाग
रज़ा लाइब्रेरी केवल ऐतिहासिक दस्तावेज़ों का संग्रह नहीं बल्कि ज्ञान-अन्वेषण का आधुनिक केंद्र भी है। यहाँ शोधकर्ताओं के लिए एक सुसज्जित वाचनालय, संदर्भ अनुभाग, डिजिटल संसाधन, कैटलॉग सिस्टम (Catalog System) और अध्ययन कक्ष उपलब्ध हैं। नाजुक और पुरानी पांडुलिपियों को संरक्षित करने के लिए एक आधुनिक पांडुलिपि संरक्षण प्रयोगशाला भी मौजूद है, जहाँ विशेषज्ञ विशेष रसायनों, उपकरणों और तकनीकों की सहायता से पांडुलिपियों की आयु बढ़ाने का कार्य करते हैं। सुंदर बात यह है कि यह लाइब्रेरी केवल शोधकर्ताओं तक सीमित नहीं - बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए बाल साहित्य अनुभाग भी उपलब्ध है, ताकि बच्चे कम उम्र में ही पुस्तकों और ज्ञान की दुनिया से जुड़ सकें।

राष्ट्रीय महत्व और सरकारी संरचना
रामपुर रज़ा लाइब्रेरी की प्रतिष्ठा और ऐतिहासिक महत्व को समझते हुए, भारतीय सरकार ने 1 जुलाई 1975 को संसद के अधिनियम के तहत इसे राष्ट्रीय नियंत्रण में लिया और इसे राष्ट्रीय महत्व की लाइब्रेरी घोषित किया। आज यह भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान के रूप में संचालित होती है। इसके अलावा, इसे पांडुलिपि संरक्षण केंद्र (MCC) के रूप में भी मान्यता प्राप्त है, जहाँ अन्य संस्थानों और संग्रहकर्ताओं को भी संरक्षण तकनीक सिखाई जाती है।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/bdhutt4h   
https://tinyurl.com/vrmdma8c
https://tinyurl.com/3z67khek 

Definitions of the Post Viewership Metrics

A. City Readerships (FB + App) - This is the total number of city-based unique readers who reached this specific post from the Prarang Hindi FB page and the Prarang App.

B. Website (Google + Direct) - This is the Total viewership of readers who reached this post directly through their browsers and via Google search.

C. Messaging Subscribers - This is the total viewership from City Portal subscribers who opted for hyperlocal daily messaging and received this post.

D. Total Viewership - This is the Sum of all our readers through FB+App, Website (Google+Direct), Email, WhatsApp, and Instagram who reached this Prarang post/page.

E. The Reach (Viewership) - The reach on the post is updated either on the 6th day from the day of posting or on the completion (Day 31 or 32) of one month from the day of posting.