रामपुर की ज़रदोज़ी कढ़ाई: नवाबी विरासत से आजीविका तक का जीवंत सफ़र

स्पर्श - बनावट/वस्त्र
19-01-2026 09:24 AM
रामपुर की ज़रदोज़ी कढ़ाई: नवाबी विरासत से आजीविका तक का जीवंत सफ़र

रामपुर की पहचान केवल उसकी नवाबी तहज़ीब, संगीत और स्थापत्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की पारंपरिक ज़रदोज़ी कढ़ाई भी शहर की सांस्कृतिक आत्मा का अहम हिस्सा रही है। रामपुरवासियों ने पीढ़ियों से इस नाज़ुक और मेहनतभरे शिल्प को संजोकर रखा है, जिसमें सोने-चांदी की चमक, महीन कारीगरी और शाही सौंदर्य एक साथ दिखाई देता है। आज के बदलते दौर में भी ज़रदोज़ी रामपुर की गलियों, घरों और कारीगरों की उंगलियों में जीवित है, जो न सिर्फ़ कला का प्रतीक है बल्कि हज़ारों परिवारों की आजीविका का आधार भी बनी हुई है।
इस लेख में हम क्रमबद्ध रूप से समझेंगे कि रामपुर में ज़रदोज़ी कढ़ाई की ऐतिहासिक उत्पत्ति कैसे हुई और नवाबों ने इसे किस तरह संरक्षण दिया। इसके बाद हम ज़रदोज़ी की तकनीक, सामग्री और विशिष्ट डिज़ाइन शैलियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। आगे जानेंगे कि रामपुर की ज़रदोज़ी अन्य कढ़ाई केंद्रों से किस तरह अलग पहचान रखती है। फिर हम कारीगरों की आजीविका, उनकी पारिवारिक परंपराओं और सामाजिक स्थिति को समझेंगे। इसके बाद मशीनी कढ़ाई से उत्पन्न संकट पर नज़र डालेंगे और अंत में ज़रदोज़ी कढ़ाई के संरक्षण व पुनरुत्थान की संभावनाओं पर विचार करेंगे।

रामपुर में ज़रदोज़ी कढ़ाई की ऐतिहासिक उत्पत्ति और नवाबी संरक्षण
रामपुर में ज़रदोज़ी कढ़ाई की ऐतिहासिक जड़ें मुगल काल तक जाती हैं, जब शाही दरबारों में वस्त्र केवल पहनावे का साधन नहीं, बल्कि सत्ता, वैभव और सौंदर्य का प्रतीक हुआ करते थे। उस समय सोने-चांदी की ज़री से सजे कपड़े शाही पहचान का अभिन्न हिस्सा थे। फ़ारसी कला परंपराओं के प्रभाव से विकसित यह कढ़ाई धीरे-धीरे उत्तर भारत में फैली और नवाबी संरक्षण के कारण रामपुर में इसे एक स्थायी ठिकाना मिला। रामपुर के नवाबों ने इस कला को केवल अपनाया ही नहीं, बल्कि कारीगरों को आर्थिक संरक्षण, सम्मान और स्थिर कार्य उपलब्ध कराकर इसे सामाजिक रूप से स्थापित भी किया। ज़रदोज़ी का उपयोग शाही पोशाकों, दरबारी पर्दों, छतरियों, धार्मिक आवरणों और विशेष आयोजनों के वस्त्रों में बड़े पैमाने पर किया जाता था। यही कारण रहा कि यह कला दरबारों से निकलकर आम समाज तक पहुँची और समय के साथ रामपुर की सांस्कृतिक पहचान में गहराई से रच-बस गई।

ज़रदोज़ी कढ़ाई की तकनीक, सामग्री और विशिष्ट डिज़ाइन शैलियाँ
ज़रदोज़ी कढ़ाई केवल सुई-धागे का काम नहीं, बल्कि धैर्य, अभ्यास और कलात्मक संवेदना की एक लंबी साधना है। इस प्रक्रिया में अत्यंत महीन सुई और नियंत्रित हाथों से विशेष टांकों का प्रयोग किया जाता है, जिससे कपड़े पर उभरा हुआ, भारी और भव्य प्रभाव पैदा होता है। इसमें मुख्य रूप से तीन प्रकार की ज़री उपयोग में लाई जाती है - शुद्ध सोने या चांदी की ज़री, इलेक्ट्रोप्लेटेड (Electroplated) धातु ज़री और मिश्रित कृत्रिम ज़री, जिनके आधार पर उत्पाद की गुणवत्ता और कीमत तय होती है। कढ़ाई की तकनीकों में सलमे-सितारे का कार्य, अरि वर्क, चेन स्टिच (chain stitch) और रनिंग स्टिच (running stitch) प्रमुख हैं। इन टांकों के संयोजन से डिज़ाइन में गहराई, बनावट और चमक आती है। मखमल, रेशम और साटन जैसे कपड़े ज़रदोज़ी के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते हैं, क्योंकि वे ज़री की चमक को संतुलित रूप से उभारते हैं। डिज़ाइनों में फूल-पत्तियां, बेल-बूटे, ज्यामितीय आकृतियाँ और शाही प्रतीक इस कला को एक भव्य लेकिन सुसंयमित रूप प्रदान करते हैं।

रामपुर की ज़रदोज़ी और अन्य केंद्रों से इसकी अलग पहचान
भारत में ज़रदोज़ी के कई प्रसिद्ध केंद्र हैं, जैसे लखनऊ, दिल्ली और भोपाल, लेकिन रामपुर की ज़रदोज़ी अपनी विशिष्ट सादगी और बारीकी के लिए अलग पहचान रखती है। यहाँ की कढ़ाई में अनावश्यक चमक-दमक की जगह संतुलन, संयम और महीन शिल्प कौशल पर विशेष ध्यान दिया जाता है। रामपुर के कारीगर अपने डिज़ाइनों में स्थानीय सांस्कृतिक प्रतीकों, पारंपरिक रूपांकन और शाही सौंदर्यबोध को सहज रूप से शामिल करते हैं। यही स्थानीय स्पर्श उनकी कढ़ाई को विशिष्ट बनाता है। इस कला की पहचान किसी ब्रांड नाम से नहीं, बल्कि उसकी कारीगरी, संतुलित डिज़ाइन और हस्तनिर्मित आत्मा से होती है, जो देखने वाले को तुरंत यह एहसास करा देती है कि यह रामपुर की ज़रदोज़ी है।

कारीगरों की आजीविका और ज़रदोज़ी से जुड़ी पारिवारिक परंपराएँ
रामपुर में ज़रदोज़ी कढ़ाई महज़ एक व्यवसाय नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक विरासत है। अधिकांश कारीगर यह कार्य अपने घरों में करते हैं, जहाँ बचपन से ही अगली पीढ़ी इस कला को सीखने लगती है। इस घरेलू कार्यप्रणाली में पुरुषों के साथ-साथ महिलाएँ भी सक्रिय भूमिका निभाती हैं, जिससे यह शिल्प महिलाओं के लिए आर्थिक सहयोग और आत्मनिर्भरता का साधन भी बनता है। हालांकि, इतनी मेहनत और समय देने के बावजूद कारीगरों की आय सीमित रहती है। असंगठित कार्य व्यवस्था, बिचौलियों पर निर्भरता और बाज़ार तक सीधी पहुँच न होने के कारण उन्हें अपनी कला का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। इसके चलते कई परिवार आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

मशीनी कढ़ाई का बढ़ता प्रभाव और पारंपरिक शिल्प के सामने संकट
आधुनिक दौर में मशीनी कढ़ाई ने फैशन और वस्त्र उद्योग में तेज़ी से जगह बना ली है। कम समय, कम लागत और बड़े पैमाने पर उत्पादन की सुविधा के कारण मशीन से बने उत्पाद बाज़ार में सस्ते विकल्प के रूप में उपलब्ध हैं। देखने में ये डिज़ाइन आकर्षक ज़रूर लगते हैं, लेकिन उनमें हाथ की कढ़ाई जैसी भावनात्मक गहराई और कलात्मक आत्मा नहीं होती। इस प्रतिस्पर्धा का सबसे बड़ा असर रामपुर के पारंपरिक कारीगरों पर पड़ा है। घटते ऑर्डर, कम मेहनताना और अनिश्चित काम के कारण कई कारीगर इस पेशे को छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं, जिससे यह शिल्प धीरे-धीरे संकट की स्थिति में पहुँचता जा रहा है।

ज़रदोज़ी कढ़ाई के संरक्षण और पुनरुत्थान की संभावनाएँ
इन चुनौतियों के बावजूद ज़रदोज़ी कढ़ाई का भविष्य पूरी तरह अंधकारमय नहीं है। यदि कारीगरों को आधुनिक डिज़ाइन प्रशिक्षण, बदलते फैशन रुझानों की समझ और डिजिटल प्लेटफॉर्म (digital platform) से जोड़ा जाए, तो यह कला फिर से नई ऊर्जा पा सकती है। सरकारी योजनाएँ, शिल्प मेलों का आयोजन, डिज़ाइन हब और ई-कॉमर्स (e-commerce) के माध्यम से सीधे ग्राहकों तक पहुँच कारीगरों की आय बढ़ाने में सहायक हो सकती है। सही दिशा, सम्मान और अवसर मिलने पर रामपुर की ज़रदोज़ी न केवल जीवित रह सकती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए गर्व और पहचान का स्रोत भी बन सकती है।

संदर्भ
https://tinyurl.com/bdh6u2ks 
https://tinyurl.com/ypt55b44 
https://tinyurl.com/47vsbc8d 
https://tinyurl.com/yn6araze 

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