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एक समय था जब हमारे शहरों और कस्बों की सुबह गौरैया की चहचहाहट के बिना अधूरी मानी जाती थी। घरों के आँगन, बारामदे, दुकानों की छतें, रेलवे स्टेशन और गली-नुक्कड़ - हर जगह यह नन्ही चिड़िया आम तौर पर दिखाई दे जाती थी। लेकिन आज स्थिति यह है कि शहरी जीवन में पली-बढ़ी नई पीढ़ी के लिए गौरैया केवल किताबों, तस्वीरों या किस्सों तक सीमित होती जा रही है। सवाल यह नहीं है कि गौरैया हमें क्यों छोड़कर जा रही है, बल्कि असली सवाल यह है कि हमारे शहरों और हमारी जीवनशैली में ऐसा क्या बदल गया है, जिसने हजारों वर्षों से हमारे साथ रहने वाली इस चिड़िया को हमसे दूर कर दिया।
आज हम सबसे पहले भारतीय शहरों और जीवनशैली में गौरैया के ऐतिहासिक महत्व को समझेंगे और जानेंगे कि उसका मनुष्यों के साथ रिश्ता कितना पुराना और गहरा रहा है। इसके बाद, शहरीकरण और आधुनिक ढांचों के कारण गौरैया की घटती आबादी पर चर्चा करेंगे। फिर हम उन पर्यावरणीय और मानवजनित कारणों को समझेंगे, जो इसे विलुप्ति की ओर धकेल रहे हैं। आगे, भोजन श्रृंखला में आए बदलाव और कीटों की कमी का असर जानेंगे। इसके साथ ही, गौरैया की संरक्षण स्थिति और जागरूकता प्रयासों पर नज़र डालेंगे। अंत में, हम यह समझेंगे कि इसके संरक्षण में समाज और प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी क्या है।

भारतीय शहरों और जीवनशैली में गौरैया का ऐतिहासिक महत्व
गौरैया और मनुष्य का संबंध हजारों वर्षों पुराना है और यह संबंध केवल सह-अस्तित्व का नहीं, बल्कि आपसी निर्भरता का भी रहा है। माना जाता है कि जब मानव सभ्यता ने खेती और अनाज भंडारण की शुरुआत की, तभी से गौरैया मानव बस्तियों के आसपास रहने लगी। कच्चे घरों की दीवारें, मिट्टी की छतें, खुले आँगन और अनाज के भंडार गौरैया के लिए सुरक्षित आश्रय और भोजन के स्रोत हुआ करते थे। बदले में, यह नन्ही चिड़िया कीटों को खाकर फसलों और घरों को हानिकारक कीटों से बचाने में मदद करती थी। ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ भारतीय शहरों में भी गौरैया आम जीवन का हिस्सा थी और इसकी चहचहाहट भारतीय सुबह की पहचान मानी जाती थी। लोक-संस्कृति, स्मृतियों और पीढ़ियों की यादों में इसकी मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि गौरैया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि मानव जीवन का स्वाभाविक हिस्सा रही है।
शहरीकरण और आधुनिक ढांचों से गौरैया की तेज़ गिरती आबादी
बीते कुछ दशकों में शहरीकरण की रफ्तार इतनी तेज़ रही है कि उसने गौरैया के पारंपरिक आवासों को लगभग समाप्त कर दिया। कंक्रीट के घने ढांचे, बहुमंज़िला इमारतें और आधुनिक वास्तुकला में बंद डिज़ाइन वाले घरों ने घोंसला बनाने की प्राकृतिक जगहें खत्म कर दी हैं। पहले जिन मिट्टी की दीवारों और छतों में छोटे छेद होते थे, वही आज पूरी तरह सीलबंद और चिकने ढांचों में बदल चुके हैं। इसके साथ ही, शहरों में हरियाली की कमी और पेड़ों की लगातार कटाई ने गौरैया के लिए भोजन और सुरक्षित बैठने की जगहों को भी सीमित कर दिया। नतीजतन, गौरैया धीरे-धीरे शहरों से गायब होती चली गई और उसकी आबादी में तेज़ गिरावट दर्ज की जाने लगी।

पर्यावरणीय और मानवजनित कारण जो गौरैया को विलुप्ति की ओर ले जा रहे हैं
आधुनिक जीवनशैली से जुड़े कई पर्यावरणीय और मानवजनित कारक गौरैया के अस्तित्व पर गहरा असर डाल रहे हैं। घरों, बाग-बगीचों और खेतों में रासायनिक कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग न केवल कीटों को खत्म करता है, बल्कि पक्षियों के लिए ज़हरीला भी साबित होता है। मोबाइल टावरों से निकलने वाला विकिरण, लगातार बढ़ता ध्वनि प्रदूषण और शहरों में रोशनी का असंतुलन गौरैया के व्यवहार, संचार और प्रजनन क्षमता को प्रभावित करता है। ऊँची इमारतों पर लगे कांच के पैनल (panel) कई बार इनके लिए जानलेवा साबित होते हैं। ये सभी कारण मिलकर शहरी वातावरण को गौरैया के लिए असुरक्षित बनाते चले गए हैं, जिससे उसका प्राकृतिक जीवन चक्र बाधित हुआ है।
भोजन श्रृंखला में बदलाव और कीटों की कमी का असर
गौरैया का आहार मुख्य रूप से कीटों पर आधारित होता है, हालांकि वह अनाज पर भी निर्भर रहती है। लेकिन आधुनिक कृषि और शहरी व्यवस्थाओं में आए बदलावों ने इसकी भोजन श्रृंखला को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। बेहतर भंडारण प्रणालियों और अनाज के कम रिसाव से गौरैया के लिए आसानी से उपलब्ध भोजन घट गया है। वहीं, कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से छोटे कीड़ों और अकशेरुकी जीवों की संख्या में भारी गिरावट आई है। ये कीड़े नवजात गौरैयों के लिए जीवनदायी होते हैं, और उनकी कमी सीधे तौर पर चूजों की मृत्यु दर बढ़ाती है। भोजन की इस कमी ने न केवल गौरैया को शहरों से दूर किया, बल्कि उसकी आबादी की निरंतरता को भी खतरे में डाल दिया है।

गौरैया की संरक्षण स्थिति और जागरूकता प्रयास
गौरैया की लगातार घटती संख्या ने संरक्षण विशेषज्ञों और संस्थाओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। आईयूसीएन (IUCN) और अन्य अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में इसकी स्थिति का समय-समय पर मूल्यांकन किया गया है, जिससे इसके संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित किया गया। लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए हर वर्ष 20 मार्च को ‘विश्व गौरैया दिवस’ मनाया जाता है, ताकि आम नागरिक इस पक्षी के महत्व और संकट को समझ सकें। देश के कई हिस्सों में पक्षी प्रेमियों, गैर-लाभकारी संगठनों और संरक्षणवादियों ने गौरैया को बचाने के लिए अभियान चलाए हैं। इन प्रयासों के कारण कुछ क्षेत्रों में गौरैया की आबादी में हल्का सुधार भी देखने को मिला है, जो उम्मीद की एक किरण है।
संरक्षण की ज़रूरत और समाज की नैतिक जिम्मेदारी
गौरैया का संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं या संगठनों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह समाज के हर व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी है। अपने घरों में घोंसला बनाने के लिए छोटे स्थान छोड़ना, नेस्ट बॉक्स (Next Box) और बर्ड फीडर (Bird Feeder) लगाना, देशी पौधे उगाना और रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग को कम करना जैसे सरल कदम इसके संरक्षण में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसके साथ ही, बच्चों और युवाओं में यह समझ विकसित करना ज़रूरी है कि हर जीव को इस पृथ्वी पर रहने और पारिस्थितिकी तंत्र में अपनी भूमिका निभाने का समान अधिकार है। गौरैया को बचाना दरअसल उस संतुलन को बचाना है, जिस पर हमारा अपना भविष्य भी निर्भर करता है।
संदर्भ
https://bit.ly/3vCa88F
https://bit.ly/3IGh6Nw
https://bit.ly/3sH4aS6
https://tinyurl.com/mr2sf5h4
https://tinyurl.com/3ja89rvu
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