कर्तव्य, करुणा और बलिदान: महात्मा गांधी के अंतिम 48 घंटों की मार्मिक कथा

आधुनिक राज्य : 1947 ई. से वर्तमान तक
30-01-2026 09:25 AM
कर्तव्य, करुणा और बलिदान: महात्मा गांधी के अंतिम 48 घंटों की मार्मिक कथा

रामपुरवासियो, हर वर्ष 30 जनवरी, जब देश महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करता है, तब यह दिन हमें केवल उनके निधन की नहीं, बल्कि उनके जीवन-मूल्यों की याद दिलाता है। महात्मा गांधी का जीवन जितना सार्वजनिक और संघर्षपूर्ण था, उनके अंतिम क्षण उतने ही गहन, शांत और कर्तव्यबोध से भरे हुए थे। 29 और 30 जनवरी 1948 के वे अंतिम 48 घंटे केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि उस विचारधारा का जीवंत प्रमाण हैं, जिसमें सेवा, अनुशासन, अहिंसा और मानवता सर्वोपरि थे। शारीरिक कमजोरी, मानसिक तनाव और आसन्न खतरे के बावजूद, गांधीजी अपने अंतिम क्षणों तक देश, समाज और सत्य के प्रति पूर्ण निष्ठा से जुड़े रहे। इन अंतिम घंटों को समझना, वास्तव में गांधी को समझने जैसा है।
आज इस लेख में हम महात्मा गांधी के जीवन के अंतिम दो दिनों को विस्तार से जानेंगे। सबसे पहले हम देखेंगे कि शारीरिक थकान के बावजूद गांधीजी किस तरह अपने कर्तव्यों से जुड़े रहे। फिर, उनके अंतिम दिन की अनुशासित दिनचर्या को समझेंगे। इसके बाद, कांग्रेस के नए संविधान पर उनके अंतिम कार्य और उसकी ऐतिहासिक अहमियत पर चर्चा करेंगे। आगे, हम जानेंगे कि नेहरू–पटेल संबंधों को लेकर गांधीजी क्यों चिंतित थे। फिर, उनके अंतिम जन-संपर्क और संवादों को समझेंगे। अंत में, हम उस अंतिम यात्रा और हत्या के क्षण पर बात करेंगे, जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया।

महात्मा गांधी के अंतिम 48 घंटे: शारीरिक थकान के बीच अडिग कर्तव्यभाव
29 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी अत्यंत दुर्बल शारीरिक अवस्था में थे। लंबे उपवास, निरंतर यात्राएँ, राजनीतिक तनाव और देश के विभाजन से उपजा मानसिक आघात उनके शरीर और मन—दोनों पर गहरा प्रभाव डाल चुका था। सिर चकरा रहा था, शरीर थकान से जर्जर था, फिर भी उनके संकल्प में कोई शिथिलता नहीं थी। रात काफी हो चुकी थी, पर वे कांग्रेस के नए संविधान के मसौदे को अधूरा छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। “फिर भी मुझे यह पूरा करना ही है”—यह वाक्य केवल उस क्षण की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि गांधीजी के पूरे जीवन-दर्शन का प्रतिबिंब था, जहाँ व्यक्तिगत पीड़ा, शारीरिक कष्ट और विश्राम की आवश्यकता भी राष्ट्रीय कर्तव्य और नैतिक उत्तरदायित्व के आगे गौण हो जाती थी।

अंतिम दिन की दिनचर्या: प्रार्थना, लेखन, उपवास और आत्मसंयम
30 जनवरी 1948 की सुबह भी गांधीजी की दिनचर्या उनके जीवन की तरह ही अनुशासित और सादगीपूर्ण रही। साढ़े तीन बजे उठकर प्रार्थना करना, नीम की दातून से दाँत साफ़ करना और सीमित साधनों में दिन की शुरुआत करना उनकी आदत का हिस्सा था। शरीर में कमजोरी स्पष्ट थी, फिर भी उन्होंने पत्रों का उत्तर दिया, लेखन कार्य किया और अपने विचारों को क्रमबद्ध किया। उनका भोजन अत्यंत साधारण था—कुछ रस, थोड़ा दूध और औषधीय मिश्रण। यह दिनचर्या केवल शारीरिक अनुशासन नहीं, बल्कि मानसिक स्थिरता और आत्मसंयम का अभ्यास थी, जो उनके पूरे जीवन में सत्य, संयम और आत्मनियंत्रण के आदर्शों को साकार करती रही।File:Gandhi writing Aug1942.jpg

कांग्रेस के नए संविधान पर अंतिम कार्य: गांधीजी की राजनीतिक विरासत
अपने जीवन के अंतिम दिन भी गांधीजी का चिंतन स्वतंत्र भारत की राजनीतिक और नैतिक दिशा पर केंद्रित था। उन्होंने कांग्रेस संगठन के लिए नए संविधान के मसौदे पर गंभीरता से काम किया, जिसे बाद में उनका ‘अंतिम वसीयतनामा’ कहा गया। 1920 में कांग्रेस को जनआंदोलन का स्वरूप देने वाले गांधीजी, 1948 में स्वतंत्र भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप संगठन को नई दिशा देना चाहते थे। उन्होंने मसौदे की प्रत्येक पंक्ति को ध्यान से पढ़ा, संशोधन सुझाए और त्रुटियों को सुधारा। यह कार्य इस बात का प्रमाण था कि गांधीजी के लिए राजनीति सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि समाज को नैतिक आधार प्रदान करने का माध्यम थी।

राष्ट्रीय नेतृत्व की चिंता: नेहरू–पटेल संबंध और गांधीजी की एकता की कोशिश
गांधीजी स्वतंत्र भारत के नेतृत्व में एकता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे। जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल के बीच उभरते मतभेदों ने उन्हें गहरी चिंता में डाल दिया था। वे भली-भांति जानते थे कि देश के प्रशासन, एकता और स्थायित्व के लिए दोनों नेताओं की भूमिका अनिवार्य है। इसी कारण उन्होंने निश्चय किया था कि वे प्रार्थना सभा में सार्वजनिक रूप से और व्यक्तिगत बातचीत के माध्यम से भी इस विषय पर स्पष्ट संदेश देंगे। यह चिंता केवल राजनीतिक नहीं थी, बल्कि राष्ट्र के भविष्य को लेकर उनकी गहरी संवेदनशीलता और दूरदर्शिता को दर्शाती थी।

जनता, शरणार्थियों और प्रतिनिधिमंडलों से अंतिम संवाद
अपने अंतिम दिन गांधीजी ने अनेक प्रतिनिधिमंडलों से भेंट की—शरणार्थी, धार्मिक नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और विदेशी नागरिक। देश विभाजन के बाद विस्थापित सिंधी और पंजाबी शरणार्थियों की पीड़ा ने उन्हें भीतर तक व्यथित कर दिया। वे प्रत्येक व्यक्ति की बात पूरी संवेदना के साथ सुनते थे और समाधान खोजने का प्रयास करते थे। इसी दिन उन्होंने अपना अंतिम ऑटोग्राफ भी दिया, जो इतिहास का मौन साक्षी बन गया। इन संवादों में कहीं भी आत्मकेंद्रित भाव नहीं था; उनका पूरा ध्यान पीड़ित मानवता, सामाजिक न्याय और नैतिक उत्तरदायित्व पर केंद्रित रहा।

प्रार्थना सभा की ओर अंतिम यात्रा और हत्या का क्षण
30 जनवरी 1948 की शाम लगभग पाँच बजे गांधीजी प्रार्थना सभा के लिए निकले। शारीरिक कमजोरी के कारण मनु और आभा उनका सहारा बने हुए थे, जिन्हें वे स्नेहपूर्वक अपने “चलते-फिरते डंडे” कहा करते थे। वे समय के प्रति अत्यंत सजग थे और प्रार्थना में देर हो जाने से चिंतित भी। जैसे ही वे सभा स्थल पर पहुँचे, एक व्यक्ति ने नमस्कार करते हुए उनके निकट आकर गोलियाँ चला दीं। “हे राम” कहते हुए गांधीजी धरती पर गिर पड़े। यह क्षण केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं था, बल्कि अहिंसा, करुणा और नैतिक बलिदान का ऐसा अमर प्रतीक बन गया, जिसने भारत ही नहीं, पूरे विश्व की चेतना को झकझोर दिया।

संदर्भ- 
https://tinyurl.com/y8u9zj4k  
https://tinyurl.com/ye4zta23 

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