रसायन विज्ञान हमारे जीवन के हर हिस्से से जुड़ा हुआ है। सुबह उठकर इस्तेमाल किए जाने वाले टूथपेस्ट से लेकर हमारे भोजन, कपड़ों, दवाओं और वाहनों के ईंधन तक, हर जगह रासायनिक प्रक्रियाएं काम कर रही हैं। यहां तक कि हम जो हवा सांस के ज़रिए लेते हैं और जो पानी पीते हैं, वह भी हमारे पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने के लिए रासायनिक प्रतिक्रियाओं से गुज़रता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस जटिल विज्ञान की शुरुआत कहां से हुई और कैसे इसने आधुनिक रूप लिया?
प्राचीन काल में कैसे हुई रसायन विज्ञान की शुरुआत?
इतिहासकारों के अनुसार, 'केमिस्ट्री' और 'अल्केमी' (alchemy) यानी कीमियागिरी शब्द मिस्र के प्राचीन नाम 'खेम' (chem) से लिए गए हैं। ईसा पूर्व 1000 तक, प्राचीन सभ्यताओं ने ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था जो आगे चलकर रसायन विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का आधार बनीं। कीमियागिरी रसायन विज्ञान की वह शाखा थी जिसमें तत्वों की छिपी हुई प्रकृति का अध्ययन किया जाता था।
दवाओं और जड़ी-बूटियों का विचार ईसा पूर्व 1000 से भी पहले के प्राचीन भारतीय वेदों में मिलता है। वहीं, चीनी कीमियागिरी का मानना था कि ब्रह्मांड में केवल पांच तत्व हैं - लकड़ी, आग, पृथ्वी, धातु और जल। इन्हें पाँच रंगों, पाँच दिशाओं और पाँच धातुओं जैसे सोना, चांदी, सीसा, तांबा और लोहे से जोड़ा गया था। इसके नतीजे में चीनी कीमियागिरी की हर तकनीक में पाँच चरणों को दोहराया जाता था। लगभग 420 ईसा पूर्व में, एम्पेडोकल्स (Empedocles) ने कहा था कि सभी पदार्थ चार मूलभूत तत्वों से बने हैं - पृथ्वी, आग, हवा और पानी। इसके बाद अरस्तू (Aristotle) ने तत्वों के गुणों का विचार विकसित किया और बताया कि विभिन्न प्रकार के पदार्थ गर्म, ठंडे, गीले और सूखे गुणों के एक विशिष्ट संतुलन पर निर्भर करते हैं।
आधुनिक रसायन विज्ञान के जनक कौन थे?
रसायन विज्ञान को एक व्यवस्थित विज्ञान बनाने का श्रेय फ्रांसीसी वैज्ञानिक एंटोनी लेवोज़ियर को जाता है, जिन्हें आधुनिक रसायन विज्ञान का पिता कहा जाता है। 1789 में, उन्होंने द्रव्यमान संरक्षण का नियम स्थापित किया। लेवोज़ियर (Lavoisier) ने ही सबसे पहले यह साबित किया कि ऑक्सीजन दहन यानी जलने की प्रक्रिया में एक प्रमुख तत्व है और उन्होंने ही इस तत्व को इसका नाम दिया था। उन्होंने रासायनिक पदार्थों के नामकरण की आधुनिक प्रणाली भी विकसित की। उनकी वैज्ञानिक खोजों में उनकी पत्नी मैरी-ऐनी (Mary Anne) का भी बड़ा योगदान था, जिन्होंने उनके प्रयोगों के चित्र बनाए और उनके लिए अंग्रेज़ी के दस्तावेज़ों का अनुवाद किया।

लेवोज़ियर एक वैज्ञानिक होने के साथ-साथ एक फाइनेंसर और प्रशासक भी थे। उन्होंने कृषि उत्पादन पर व्यापक प्रयोग किए और वज़न और माप को एकीकृत करने वाले आयोग में भी काम किया, जिससे मीट्रिक प्रणाली को अपनाया जा सका। हालांकि, फ्रांसीसी क्रांति के दौरान 1794 में उन्हें उनके ससुर और अन्य कर संग्रहकर्ताओं के साथ गिलोटिन (Guillotine) से फांसी दे दी गई।
पीरियोडिक टेबल का निर्माण कैसे हुआ?
तत्वों को एक क्रम में व्यवस्थित करने की दिशा में कई वैज्ञानिकों ने काम किया। 1789 में लेवोज़ियर ने तत्वों को धातु और गैर-धातु के रूप में समूहित करने का प्रयास किया था। इसके बाद जर्मन भौतिक विज्ञानी जोहान वोल्फगैंग डोबेराइनर (Johann Wolfgang Döbereiner) ने समान भौतिक और रासायनिक गुणों वाले तत्वों को तीन-तीन के समूह में रखा।

1860 में जर्मनी में हुए पहले अंतरराष्ट्रीय रसायन विज्ञान सम्मेलन में एक बड़ी सफलता मिली, जब तत्वों के परमाणु भार को हाइड्रोजन से तुलना करके तय करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद ब्रिटिश रसायनज्ञ जॉन न्यूलैंड्स (John Newlands) ने अष्टक नियम दिया। लेकिन सबसे क्रांतिकारी बदलाव 1869 में आया, जब रूसी रसायन वैज्ञानिक दिमित्री मेंडेलीव (Dmitri Mendeleev) ने आधुनिक पीरियोडिक टेबल का ढांचा तैयार किया। उन्होंने ज्ञात रासायनिक तत्वों को उनके बढ़ते परमाणु भार के क्रम में व्यवस्थित किया। मेंडेलीव की दूरदर्शिता इतनी सटीक थी कि उन्होंने अपनी टेबल में कुछ खाली जगहें छोड़ दीं और भविष्य में खोजे जाने वाले तत्वों के गुणों की पहले ही भविष्यवाणी कर दी। जब बाद में गैलियम (Gallium), स्कैंडियम (Scandium) और जर्मेनियम (Germanium) जैसे तत्व खोजे गए, तो मेंडेलीव की भविष्यवाणी बिल्कुल सच साबित हुई।
परमाणु क्रमांक की खोज ने कैसे बदली रसायन की दुनिया?
19वीं सदी तक उप-परमाणु कणों की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं थी। लेकिन 1913 में अंग्रेज़ भौतिक विज्ञानी हेनरी मोसले (Henry Moseley) ने एक्स-रे का उपयोग करके तत्वों की तरंग दैर्ध्य को मापा और इन मापों को उनके परमाणु क्रमांक से जोड़ा। मोसले ने साबित किया कि किसी तत्व के प्रमुख गुण उसके परमाणु भार से नहीं, बल्कि परमाणु क्रमांक से तय होते हैं। उन्होंने पीरियोडिक टेबल को परमाणु क्रमांक के आधार पर पुनर्व्यवस्थित किया, जिससे पुरानी कमियां दूर हो गईं। इसे मोसले का नियम कहा गया। मोसले का करियर बहुत छोटा रहा, क्योंकि 1914 में प्रथम विश्व युद्ध छिड़ने पर वे सेना में शामिल हो गए और 27 वर्ष की अल्पायु में तुर्की के गैलीपोली में एक स्नाइपर की गोली का शिकार हो गए।
ट्रांसयूरेनियम तत्वों की खोज में ग्लेन टी. सीबोर्ग का क्या योगदान रहा?
रसायन विज्ञान के विस्तार में अमेरिकी परमाणु रसायनज्ञ ग्लेन टी. सीबोर्ग (Glenn T. Seaborg) का नाम बेहद अहम है। उन्हें मुख्य रूप से यूरेनियम से भारी तत्वों यानी ट्रांसयूरेनियम (Transuranium) तत्वों को अलग करने और पहचानने के लिए जाना जाता है। 1941 में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर प्लूटोनियम की खोज की। इसके अलावा उन्होंने अमेरिसियम (Americium), क्यूरियम (Curium), बर्केलियम (Berkelium), कैलिफोर्नियम (Californium), आइंस्टीनियम (Einsteinium), फर्मियम (Fermium), मेंडेलेवियम (Mendelevium) और नोबेलियम (Nobelium) जैसे कई नए तत्वों की खोज की।

सीबोर्ग ने पीरियोडिक टेबल में एक्टिनाइड (Actinide) अवधारणा पेश की, जो मेंडेलीव के बाद पीरियोडिक टेबल में सबसे बड़ा बदलाव था। इस अभूतपूर्व कार्य के लिए उन्हें 1951 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके सम्मान में एक तत्व का नाम सीबोर्गियम (Seaborgium) रखा गया। यह पहली बार था जब किसी जीवित वैज्ञानिक के नाम पर किसी तत्व का नामकरण हुआ।
भारतीय रसायन विज्ञान के पितामह कौन हैं?
जब हम रसायन विज्ञान के इतिहास की बात करते हैं, तो भारत के महान वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय का नाम गर्व से लिया जाता है। उन्हें भारतीय रसायन विज्ञान का जनक कहा जाता है। बचपन से ही मेधावी रहे प्रफुल्ल चंद्र राय ने एडिनबर्ग विश्वविद्यालय से अपनी उच्च शिक्षा पूरी की।
उन्हें अकार्बनिक और कार्बनिक नाइट्राइट पर उनके गहन शोध के लिए जाना जाता है और उन्हें मास्टर ऑफ नाइट्राइट्स (Master of Nitrites) की उपाधि दी गई थी। 1896 में उन्होंने एक स्थिर यौगिक मरक्यूरस नाइट्राइट की खोज की, जिसने धातुओं के नाइट्राइट की संरचना और संश्लेषण के शोध की नींव रखी। वे न केवल एक बेहतरीन वैज्ञानिक थे, बल्कि वे प्राचीन भारतीय विज्ञान और आधुनिक विज्ञान को एक साथ जोड़ने के प्रबल पक्षधर भी थे। उनकी लिखी पुस्तक 'ए हिस्ट्री ऑफ हिंदू केमिस्ट्री' (A History of Hindu Chemistry) उनके इसी दृष्टिकोण का परिचायक है।

हमारे दैनिक जीवन में रसायन विज्ञान का क्या महत्व है?
आज रसायन विज्ञान हमारी दिनचर्या का एक अभिन्न अंग बन चुका है। हम जो खाना खाते हैं, उसमें मौजूद प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा को समझने में रसायन विज्ञान मदद करता है। बाज़ार में मिलने वाले ठंडे पेय पदार्थों और आइसक्रीम में मिठास लाने के लिए एस्पार्टेम (Aspartame), सुक्रालोज़ (Sucralose) और नियोटेम (Neotame) जैसी कृत्रिम मिठास का इस्तेमाल होता है। दवाओं के निर्माण में रसायन विज्ञान की बदौलत ही हम संक्रमण से लड़ने वाले एंटीबायोटिक्स और दर्द निवारक दवाएं बना पाए हैं।
हमारे घरों में इस्तेमाल होने वाले साबुन और डिटर्जेंट भी रासायनिक प्रतिक्रियाओं का ही परिणाम हैं। साबुन बनाने की प्रक्रिया में वसा या तेल की क्षार के साथ प्रतिक्रिया होती है, जिसे साबुनीकरण कहा जाता है। पानी में घुलने पर साबुन मिसेल बनाता है, जो गंदगी और तेल को फंसाकर बाहर निकाल देता है। सफाई में एनायनिक (Anionic) डिटर्जेंट जैसे सोडियम लॉरिल सल्फेट (Sodium Lauryl Sulfate) और कैटायनिक (Cationic) डिटर्जेंट जैसे सेटिलपिरिडिनियम क्लोराइड (Cetylpyridinium Chloride) का व्यापक उपयोग होता है।
सौंदर्य प्रसाधनों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए पैराबेंस (Parabens), फेनोक्सीथेनॉल (Phenoxyethanol) और सोर्बिक एसिड (Sorbic Acid) जैसे प्रिजर्वेटिव्स मिलाए जाते हैं, जो बैक्टीरिया और फंगस को पनपने से रोकते हैं। इसी तरह, त्वचा को सूरज की हानिकारक यूवीए और यूवीबी किरणों से बचाने के लिए सनस्क्रीन में खास रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, जो त्वचा को झुर्रियों और सनबर्न जैसी समस्याओं से बचाते हैं।
कुल मिलाकर, प्राचीन कीमियागिरी की रहस्यमयी दुनिया से निकलकर रसायन विज्ञान आज एक ऐसा व्यावहारिक विज्ञान बन चुका है, जिसके बिना आधुनिक जीवन की कल्पना करना भी असंभव है। यह ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने के साथ-साथ हमारे दैनिक जीवन को आसान और सुरक्षित बनाने में एक निर्णायक भूमिका निभा रहा है।
संदर्भ
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