विशाल समुद्र में भी लड़ाकू विमानों को आधार प्रदान करने तथा उड़ने या उतरने हेतु पथ प्रदान करके, युद्धपोत (Warship) रोमांचक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। आज हम उनके बारे में ही पढ़ेंगे। युद्धपोत, सैन्य बलों की समुद्री पानी से तटीय क्षेत्रों तक आवाजाही को सुनिश्चित करते हैं, जहां उन्हें उतारा जा सकता है और दुश्मन ताकतों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। वे दुश्मन के हमले से व्यापारिक जहाज़ों की रक्षा करते हैं; दुश्मन को सैन्य बलों के परिवहन के लिए समुद्र का उपयोग करने से रोकते हैं; एवं उनके व्यापारी जहाज़ों पर हमला भी कर सकते हैं। नौसैनिक जहाजों का उपयोग नाकाबंदी में भी किया जाता है, यानी, दुश्मन को युद्ध के लिए आवश्यक वस्तुओं को समुद्र के रास्ते आयात करने से रोका जा सकता है।
इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए, नौसेना जहाजों को प्राचीन काल से ही व्यापारिक जहाजों की तुलना में अधिक तेज़, मजबूत और आक्रामक हथियार ले जाने में सक्षम बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। जबकि, आधुनिक युग में क्राफ़्ट (Craft) शब्द, उन छोटे सतही जहाजों को सूचित करने लगा है, जो आमतौर पर तटीय जल में संचालित होते हैं।

सबसे पुराने युद्धपोत लगभग 5,000 साल पहले ग्रीस और मिस्र में उभरे थे। पहले रिकॉर्ड किए गए युद्धपोतों का उपयोग नील नदी पर किया गया था। मूल रूप से वे सरकंडों से बने होते थे, और बाद में लकड़ी के समुद्री जहाजों में विकसित हुए। तब, संकीर्ण एवं तेज़ ‘लंबे जहाज’ (युद्धपोत) और चौड़े एवं भारी ‘गोल जहाज’ (व्यापारी जहाज) अलग–अलग थे।
ग्रीक नौसैनिक शक्ति, ट्राइरेम (Triremes) के विकास के साथ चरम पर थी, जिसने युद्धपोतों की मदद से 480 ईसा पूर्व में सलामिस की लड़ाई (Battle of Salamis) जीती थी। ट्राइरेम, अधिकतम मानव बाहुबल, भारी कील द्वारा समर्थित एक कांस्य मेढ़ा और दुश्मन के जहाजों पर चढ़ने हेतु नौसैनिकों के लिए एक पुल पर निर्भर था। बाद में विभिन्न देशों में चली हथियारों की होड़ के कारण बड़े पैमाने पर मल्टी-बैंक्ड जहाज (Multibanked ships) आए, और अस्थायी लकड़ी के बुर्जों के साथ-साथ भारी मिसाइल हथियारों की शुरूआत हुई।
भारी तोपखाने की शुरूआत के लिए मजबूत एवं बड़ी पतवार की आवश्यकता थी। इनमें से कुछ जहाज, हवा के द्वारा भी संचालित होते थे, क्योंकि इनकी पाल पर बड़े कपड़े लगाए जाते थे। फिर कुछ वर्षों बाद, जहाज पाल से भाप इंजन की ओर परिवर्तित हुए, और उन्होंने अंततः पानी के नीचे मौजूद प्रोपेलर (Propeller) को अपनाया। क्योंकि लकड़ी के पतवार, अब विस्फोटक गोलों का सामना नहीं कर सकते थे। शुरुआत में, नौसेनाओं ने लकड़ी के जहाजों पर लोहे की परतें चढ़ाई, जिससे लोहे की परत वाले जहाजों का विकास हुआ। अंततः, युद्धपोतों का निर्माण पूरी तरह से लोहे और स्टील से किया जाने लगा।
फिर, भाप टर्बाइनों और आंतरिक दहन इंजनों ने पारंपरिक भाप इंजनों की जगह ले ली, और नौसेनाएं कोयला जलाने से तेल जलाने की ओर परिवर्तित हो गईं। इससे युद्धपोतों की गति और परिचालन सीमा में काफी सुधार हुआ।
सन 1850 से लेकर वर्तमान समय तक, नौसैनिक विकास में तकनीकी नवाचारों और बदलती युद्ध रणनीतियों के कारण महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में लकड़ी के नौकायन जहाजों से लेकर, भाप से चलने वाले जहाजों में परिवर्तन हुआ, जिससे लोहे से बने युद्धपोतों की शुरुआत हुई। इसी सदी के अंत तक, युद्धपोत प्रमुख नौसैनिक बल बन गए, लेकिन बीसवीं सदी में पनडुब्बियों, विमानों और विमान वाहकों के उद्भव के साथ एक आदर्श बदलाव देखा गया।
प्रथम विश्व युद्ध ने टॉरपीडो (Torpedoes) और डिस्ट्रॉयर (Destroyers) जैसे जहाजों को उत्प्रेरित किया, जबकि द्वितीय विश्व युद्ध में विमानवाहक पोत ने युद्धपोतों को प्रतिस्थापित करते हुए, नौसैनिक रणनीतियों को नया आकार दिया। युद्ध के बाद के युग में, परमाणु ऊर्जा की शुरूआत ने पनडुब्बियों और विमान वाहक में क्रांति ला दी, जिससे विस्तारित संचालन और अधिक क्षमताओं की अनुमति मिली। इसके अतिरिक्त, निर्देशित हथियारों और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के उदय ने नौसैनिक क्षमताओं को बदल दिया।

दरअसल, विमान वाहक युद्धपोत चार बुनियादी कार्य करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं:
1. विदेशों में विभिन्न प्रकार के विमानों का परिवहन करना।
2. हवाई जहाजों को लॉन्च और लैंड कराना।
3. सैन्य अभियानों के लिए एक गतिमान नियंत्रण केंद्र के रूप में कार्य करना। और,
4. कर्मी दल को घर जैसा आश्रय देना।
इन कार्यों को पूरा करने हेतु युद्धपोत पर एक जहाज, एक वायु सेना आधार, एवं एक छोटे शहर के तत्वों को संयोजित करने की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, इसमें निम्नलिखित तत्व शामिल होते हैं:
1. उड़ान डेक (Deck) – यह जहाज के शीर्ष पर एक सपाट सतह है, जहां विमान उड़ान भर सकता है और उतर सकता है।
2. हैंगर डेक (Hanger deck) – विमान उपयोग में न होने पर यहां रखे जाते हैं। यह मुख्य डेक के नीचे स्थित होता है।
3. आइलैंड (Island) - यह उड़ान डेक के शीर्ष पर स्थित एक इमारत है, जहां से अधिकारी उड़ान और जहाज संचालन को निर्देशित कर सकते हैं।
4. चालक दल के रहने और काम करने के लिए कमरे।
5. नाव को एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने, और पूरे जहाज के लिए बिजली उत्पन्न करने के लिए एक बिजली संयंत्र और प्रोपेलेंट प्रणाली।
6. भोजन और ताज़ा पानी उपलब्ध कराने वाली प्रणालियां, रेडियो और टेलीविजन स्टेशन, अखबार केंद्र, मलप्रवाह-पद्धति, कचरा व्यवस्थापन प्रणाली, आदि।
7. पतवार - यह जहाज का मुख्य भाग है, जो पानी में तैरता है। पानी की रेखा के नीचे रहने वाला पतवार का भाग, गोल और अपेक्षाकृत संकीर्ण होता है, जबकि पानी के ऊपर का भाग विस्तृत डेक बनाने के लिए बड़ा होता है।
इन सुविधाओं के कारण, सैनिकों और शस्त्रागारों के परिवहन हेतु वाहनों के रूप में जहाजों के उपयोग से लेकर, स्वचालित हथियारों को पेश करने तक, नौसैनिक युद्ध में काफी प्रगति हुई है। समुद्र में एक रणनीतिक योजना और सामरिक कार्यान्वयन, नौसैनिक युद्ध में जीत हासिल करने में मदद कर सकता है। हालांकि, इसका गलत उपयोग रोकना भी महत्वपूर्ण था। अतः ‘नौसैनिक युद्ध कानून’ सामने आया। इसकी उत्पत्ति का पता 1856 में लगाया जा सकता है। इसमें कई नियम शामिल किए गए, एवं संशोधन भी हुए। अंततः नौसैनिक युद्ध के लिए पहले जिनेवा कन्वेंशन (Geneva Conventions), 1949 में निर्धारित नियमों को अपनाना गया। इस कन्वेंशन को फिर एक बार संशोधित किया गया, और 1907 में हेग कन्वेंशन (Hague Convention) द्वारा प्रतिस्थापित किया गया।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित विमान वाहक बड़े थे, और उनमें बख्तरबंद उड़ान डेक थे। आधुनिक काल में आए जेट विमानों ने अपने अधिक वजन, धीमी गति, उच्च लैंडिंग गति और अधिक ईंधन खपत के कारण कुछ समस्याएं पैदा की थी, लेकिन इनसे निपटते हुए भी, वैसे युद्धपोत बनाए गए। उदाहरण के लिए, 24 सितंबर, 1960 को संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा पहला परमाणु-संचालित वाहक – एंटरप्राइज़ (Enterprise) लॉन्च किया था। ऐसी संयुक्त क्षमताओं वाले वाहकों को ‘बहुउद्देशीय वाहक’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
इसके अलावा, अमेरिकी नौसेना के ‘यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड (USS Gerald R. Ford)’ परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत को 2017 में कमीशन किया गया था। यह गेराल्ड आर. फोर्ड श्रेणी का प्रमुख जहाज है, और 1 लाख टन से अधिक वजन के विस्थापन और 1,106 फीट (337 मीटर) की लंबाई के साथ अब तक का सबसे बड़ा युद्धपोत है।

इसी कड़ी में, भारत ने भी अपने पहले स्वदेशी विमान वाहक - विक्रांत को लॉन्च करके एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। इसे भारतीय नौसेना के आन्तरिक वॉरशिप डिज़ाइन ब्यूरो (Warship Design Bureau) द्वारा डिज़ाइन किया गया है। जबकि बंदरगाह, शिपिंग और जलमार्ग मंत्रालय के तहत सार्वजनिक शिपयार्ड - कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा इसका निर्माण किया गया है। विक्रांत को अत्याधुनिक स्वचालन सुविधाओं के साथ बनाया गया है। यह भारत के समुद्री निर्माण इतिहास में अब तक बना, सबसे बड़ा जहाज है।
इस जहाज में बड़ी संख्या में स्वदेशी उपकरण और मशीनरी हैं। नौसेना में विक्रांत जहाज के शामिल होने से, भारत को दो परिचालन विमान वाहक मिलेंगे, जिससे देश की समुद्री सुरक्षा में काफी सुधार होगा। यह देश के "आत्मनिर्भर भारत" के लक्ष्य का एक शानदार उदाहरण है, और सरकार की "मेक इन इंडिया" पहल को गति देता है। विक्रांत पोत के साथ, भारत देशज स्तर पर विमानवाहक पोत के डिजाइन और निर्माण की विशेष क्षमता वाले देशों के एक विशिष्ट समूह में शामिल हो गया है, जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन शामिल हैं।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/mpm4fwhr
2. https://tinyurl.com/5f4ue3yz
3. https://tinyurl.com/ydpvfsj3
4. https://tinyurl.com/3eapnvfe
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