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पश्चिमी घाट के घने जंगलों में एक ऐसी तितली पाई जाती है जिसके पंखों की चमक किसी मयूर (मोर) के समान प्रतीत होती है। वैज्ञानिक रूप से पपिलियो बुद्धा (Papilio buddha) के नाम से जानी जाने वाली यह तितली न केवल अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसे केरल सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर 'राज्य तितली' (State Butterfly) भी घोषित किया गया है। इसका नाम 'मालाबार बैंडेड पीकॉक' इसके मूल निवास स्थान यानी मालाबार तट, इसके पंखों पर मौजूद विशिष्ट पट्टियों (Bands) और मोर जैसे गहरे इंद्रधनुषी रंगों के कारण पड़ा है।
यह तितली भारत में कहाँ पाई जाती है?
मालाबार बैंडेड पीकॉक विशेष रूप से भारत के पश्चिमी घाट में पाई जाने वाली एक स्थानिक (Endemic) प्रजाति है। यह पहाड़ियों, घने जंगलों और कभी-कभी खुले ग्रामीण इलाकों में भी देखी जा सकती है। 'पिक्चर इंसेक्ट' (Picture Insect) के डेटा के अनुसार, इनके वयस्क होने पर ये उष्णकटिबंधीय वर्षावनों और कृषि क्षेत्रों के पास भी विचरण करते देखे जाते हैं। इनका पंख विस्तार लगभग 107 से 155 मिलीमीटर तक होता है, जो इन्हें क्षेत्र की बड़ी तितलियों में से एक बनाता है।

इस तितली का प्रजनन चक्र कैसा होता है?
इस तितली का जीवन चक्र और प्रजनन पूरी तरह से पश्चिमी घाट की वनस्पति पर निर्भर करता है। मादा तितली अपने अंडे देने के लिए बहुत सावधानी से विशिष्ट पौधों का चुनाव करती है।
1. अंडे और लार्वा: मादा तितली आमतौर पर 'रुटेशिया' (Rutaceae) परिवार के पौधों, जैसे कि जेंथो जाइलम रेटा (Zanthoxylum rhetsa) की पत्तियों के नीचे अकेले अंडे देती है। कुछ दिनों बाद इनमें से लार्वा (इल्ली) निकलता है, जिसका मुख्य काम केवल भोजन करना और बढ़ना होता है।
2. कैटरपिलर की सुरक्षा: इनका कैटरपिलर हरे रंग का होता है जिसके शरीर पर सफेद धारियां और छोटे सफेद धब्बे होते हैं। सुरक्षा के लिए इनके पास 'ओस्मेटेरियम' (Osmeterium) नामक एक अंग होता है, जो खतरा महसूस होने पर दुर्गंध छोड़ता है ताकि शिकारियों को दूर रखा जा सके।
3. मेटाबॉर्फोसिस: पर्याप्त वृद्धि के बाद, कैटरपिलर एक 'प्यूपा' (Chrysalis) का रूप ले लेता है। यह प्यूपा अक्सर किसी टहनी या पत्ती से जुड़ा होता है और गहरे हरे रंग का होता है। इसी अवस्था के भीतर तितली का कायाकल्प होता है और अंततः एक वयस्क तितली बाहर निकलती है।
मालाबार बैंडेड पीकॉक का मुख्य आहार क्या है?
एक वयस्क तितली के रूप में, यह मुख्य रूप से फूलों के अमृत पर निर्भर रहती है। शोध के अनुसार, यह लैंटाना (Lantana), हिबिस्कस (Hibiscus), जैस्मिनम (Jasminum), इक्सोरा (Ixora) और ट्राइडैक्स (Tridax) जैसे फूलों के पास मंडराती पाई जाती है। इसके विपरीत, इनका लार्वा (कैटरपिलर) अरिस्टोलोचिया (Aristolochia) प्रजाति की पत्तियों को खाता है। अपने लंबे 'प्रोबोसिस' (Proboscis) या सूंढनुमा मुंह की मदद से यह फूलों की गहराई से अमृत चूसने में सक्षम होती है।

पारिस्थितिकी तंत्र में इसकी क्या भूमिका है?
मालाबार बैंडेड पीकॉक केवल एक सुंदर जीव ही नहीं है, बल्कि यह वन पारिस्थितिकी तंत्र में एक सक्रिय 'पॉलिनेटर' (Pollinator) की भूमिका निभाता है। जब यह अमृत की तलाश में एक फूल से दूसरे फूल पर जाती है, तो इसके शरीर पर लगे सूक्ष्म बाल अनजाने में पराग कणों को स्थानांतरित कर देते हैं। 'जर्नल ऑफ एंटोमोलॉजी' के अनुसार, यह प्रक्रिया पौधों के प्रजनन और जंगलों के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पश्चिमी घाट का संरक्षण क्यों आवश्यक है?
मालाबार बैंडेड पीकॉक जैसी स्थानिक प्रजातियों का अस्तित्व सीधे तौर पर पश्चिमी घाट की जैव विविधता से जुड़ा है। यह पर्वत श्रृंखला दुनिया के सबसे समृद्ध 'बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट' में से एक है। वनों की कटाई, कृषि विस्तार और बुनियादी ढांचे के विकास के कारण इनके प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। यदि जंगल नष्ट होते हैं, तो न केवल यह तितली, बल्कि उन पर निर्भर रहने वाले परागण चक्र, पोषक तत्व चक्र और संपूर्ण वन पुनर्जनन प्रक्रिया बाधित हो जाएगी। इस हॉटस्पॉट को बचाना न केवल अद्वितीय प्रजातियों के अस्तित्व के लिए, बल्कि क्षेत्र की जलवायु स्थिरता और जल संसाधनों की सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/25ob3r49
2. https://tinyurl.com/22sqn7hc
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