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अक्सर हम खूबसूरती का मतलब सिर्फ बाहरी चमक-दमक या सजावट से लगा लेते हैं। लेकिन, भारतीय सोच इससे कहीं गहरी है। हमारे यहाँ 'रस' का सिद्धांत है, जो हमें समझाता है कि कोई भी इमारत या कलाकृति सिर्फ अपनी बनावट से सुंदर नहीं होती, बल्कि उस अहसास से सुंदर होती है जो उसे देखकर हमारे भीतर पैदा होता है। इसे आसान शब्दों में समझें तो, जब हम किसी ऐतिहासिक इमारत को देखते हैं, तो हमें सिर्फ पत्थर नहीं दिखते, बल्कि उनसे जुड़ी गर्व, करुणा या भक्ति की भावना महसूस होती है। शाहजहाँपुर को समझने के लिए भी हमें इसी 'नजरिये' की जरूरत है।
शाहजहाँपुर की खूबसूरती कोरी या सतही नहीं है; इस पर इतिहास की कई परतें चढ़ी हुई हैं। इतिहास गवाह है कि इस शहर की नींव मुगल काल में पड़ी थी। उस दौर में शहर बसाने के तौर-तरीकों और वास्तुकला में नज़ाकत (बारीकी) का बहुत ख्याल रखा जाता था। आज भी जब हम पुराने शहर की गलियों से गुजरते हैं, तो उस पुराने दौर की झलक साफ महसूस होती है। यही ऐतिहासिक बनावट आज भी शहर की पहचान है, जो शाहजहाँपुर को एक अलग और खास रूप देती है।
शाहजहाँपुर में स्मारकों का मतलब सिर्फ पर्यटन नहीं, बल्कि 'यादें' हैं। यहाँ के दर्शनीय स्थल आजादी की लड़ाई की जीती-जागती मिसाल हैं। शहर का 'शहीद द्वार' और 'राम प्रसाद बिस्मिल स्मारक' यहाँ के माथे पर तिलक की तरह सजते हैं। जब कोई शहीद द्वार के नीचे से निकलता है, तो उसे सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं दिखता, बल्कि उन क्रांतिकारियों की याद आती है जिन्होंने देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी। सच कहें तो, इस शहर की असल सुंदरता यहाँ की देशभक्ति में ही है।
खासकर, 'अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल स्मारक' की बात करें, तो यह जगह प्रकृति और इतिहास का एक सुंदर मिलन है। यह स्मारक महान क्रांतिकारी बिस्मिल जी को श्रद्धांजलि तो है ही, साथ ही शहर के बीचों-बीच बना एक शांत और हरा-भरा पार्क भी है। यहाँ का शांत माहौल हमें सिखाता है कि अपने नायकों का सम्मान कैसे किया जाए—सिर्फ मूर्तियों में नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवंत माहौल में जहाँ आकर मन को शांति मिले।
पत्थरों के स्मारकों से अलग, शाहजहाँपुर की रौनक यहाँ के मेलों और त्योहारों में भी बदलती रहती है। हमारे त्योहार शहर को एक सजी-धजी आर्ट गैलरी में बदल देते हैं। हाल ही में हुआ 'शाहजहाँपुर महोत्सव 2025' इसका बेहतरीन उदाहरण है। 9 से 12 अक्टूबर 2025 तक चले इस महोत्सव ने शहर की फिजा ही बदल दी थी। सजे हुए मंच, रोशनी और कलाकारों की प्रस्तुतियों ने रोजमर्रा की जिंदगी में एक नई उमंग भर दी। ऐसे आयोजन बताते हैं कि शहर केवल इमारतों से नहीं, बल्कि उसमें रहने वाले लोगों के उत्साह से बनता है।
अगर कोई शाहजहाँपुर की आत्मा को समझना चाहे, तो उसे इस शहर में पैदल सैर जरूर करनी चाहिए। एक पर्यटक अपनी यात्रा 'शहीद द्वार' से शुरू करे, फिर 'राम प्रसाद बिस्मिल स्मारक' की शांति को महसूस करे और अंत में यहाँ के ऐतिहासिक मंदिरों के दर्शन करे। यह सैर सिर्फ घूमना नहीं है, बल्कि शाहजहाँपुर के अतीत और वर्तमान को एक साथ जीने का तरीका है। यह हमें बताता है कि कैसे यह शहर अपने इतिहास को सहेजते हुए आज के दौर का जश्न मनाता है।
अंत में, सवाल यह है कि हम इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसे बचाएं?
इसके लिए हमें अपने शहर की देख-रेख पर गंभीरता से ध्यान देना होगा। हमारे शहर के भित्ति चित्रों, ऐतिहासिक दरवाजों और मंदिरों की कला को सहेजना होगा। जो चीजें शाहजहाँपुर को खास बनाती हैं, उनकी सुरक्षा के साथ-साथ बेहतर लाइटिंग और साफ-सफाई से उन्हें और निखारना होगा। शहर की सुंदरता को बनाए रखना सिर्फ प्रशासन का काम नहीं, बल्कि हम सभी नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है।
संदर्भ
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https://tinyurl.com/244b4fch
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