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इतिहास के पन्नों को पलटें तो हम पाते हैं कि 1450 से 1780 ईस्वी के बीच का समय उत्तर भारत के लिए उथल-पुथल और नवनिर्माण का दौर था । यह वह कालखंड था जब दिल्ली की गद्दी पर बैठी महाशक्तियों और उभरते हुए क्षेत्रीय राज्यों के बीच उपजाऊ नदी घाटियों और व्यापारिक शहरों पर कब्जा करने की होड़ मची थी । दरअसल, यह संघर्ष केवल सत्ता का नहीं, बल्कि संसाधनों पर नियंत्रण का था। जैसे-जैसे केंद्रीय सत्ता और क्षेत्रीय क्षत्रप अपनी ताकत बढ़ा रहे थे, गंगा-यमुना की इन उपजाऊ घाटियों का सामरिक महत्व बढ़ता जा रहा था। इसी रस्साकशी के बीच, घने जंगलों और नदियों के किनारे एक नया शहर आकार ले रहा था, जिसे आज हम 'शाहजहांपुर' के नाम से जानते हैं । इस लेख में हम मुगल बादशाह शाहजहां के दौर में इस शहर की नींव पड़ने से लेकर 1774 में मीरानपुर कटरा के ऐतिहासिक युद्ध तक के सफर को तय करेंगे ।
क्या थी 1647 की वह घटना जिसने शाहजहांपुर की नींव रखी?
शाहजहांपुर की स्थापना की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है । भरोसेमंद रिपोर्टों के अनुसार बात 1647 ईस्वी की है, जब मुगल बादशाह शाहजहां का शासन अपने चरम पर था । उस समय बादशाह के दो वफादार सिपहसालार, दिलेर खान और बहादुर खान, अपनी सेना के साथ इस इलाके से गुजर रहे थे । इतिहासकार बताते हैं कि मुगल साम्राज्य के लिए यह क्षेत्र केवल एक जंगल नहीं, बल्कि एक सुरक्षा चुनौती बन चुका था, क्योंकि यह क्षेत्र तब घने जंगलों से ढका हुआ था और यहाँ कानून का नहीं, बल्कि बागी जमींदारों का राज चलता था ।
इन दोनों भाइयों ने देखा कि यहाँ के विद्रोही मुगलों के लिए सिरदर्द बने हुए हैं । उन्होंने फैसला किया कि वे इस विद्रोह को कुचलेंगे। दिलेर खान और बहादुर खान ने बागी ताकतों पर हमला किया और उन्हें परास्त कर दिया । अपनी जीत से उत्साहित होकर, उन्होंने बादशाह शाहजहां से इस जगह पर एक किला बनाने और एक शहर बसाने की अनुमति मांगी । उनका उद्देश्य यहाँ एक ऐसा 'सुरक्षा नोड' (Security Node) स्थापित करना था, जहाँ से पूरे इलाके पर नजर रखी जा सके। बादशाह ने न केवल मंजूरी दी, बल्कि उन्हें यह जागीर भी सौंप दी । अपनी वफादारी का सबूत देते हुए, इन दोनों भाइयों ने इस नए शहर का नाम अपने बादशाह के नाम पर 'शाहजहांपुर' रखा ।
क्या भूगोल ने तय की थी शहर की तकदीर?
किसी भी शहर के बसने और फलने-फूलने में भूगोल सबसे बड़ी भूमिका निभाता है । यह शहर 'गर्रा' (जिसे देवहा भी कहा जाता है) नदी के किनारे बसाया गया । विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार, 17वीं और 18वीं सदी में नदियाँ यातायात और व्यापार का मुख्य मार्ग तंत्र थीं। गर्रा नदी की मौजूदगी ने शाहजहांपुर को खेती और व्यापार के लिए एक आदर्श जगह बना दिया ।
भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो शाहजहांपुर की स्थिति बेहद महत्वपूर्ण थी। यह बरेली जैसे बड़े केंद्रों के बीच स्थित था, जिससे यह माल की आवाजाही, खेती और बाजार के विकास के लिए एक प्राकृतिक केंद्र बन गया। नदी के कारण यहाँ की जमीन उपजाऊ थी, जिससे अनाज की पैदावार बंपर होती थी । दिलेर खान द्वारा बसाए गए 52 कबीलों ने इस भौगोलिक लाभ का पूरा फायदा उठाया और धीरे-धीरे यह सैन्य छावनी एक समृद्ध शहर में तब्दील होने लगी ।
मुगलिया सल्तनत के कमजोर पड़ने पर कैसे बदला रोहिलखंड का समीकरण?
18वीं सदी की शुरुआत के साथ ही उत्तर भारत की राजनीतिक फिजा बदलने लगी थी। जैसे-जैसे मुगल दरबार की पकड़ ढीली पड़ने लगी, एक नई क्षेत्रीय शक्ति का उदय हुआ—'रोहिलखंड'। बरेली इस नए रोहिला राज्य का केंद्र बनकर उभरा और शाहजहांपुर भी इस नए शक्ति-समीकरण (Power Block) का एक अभिन्न अंग बन गया। अब यह शहर केवल मुगलों की जागीर नहीं, बल्कि रोहिला सरदारों की रणनीतिक योजनाओं का हिस्सा था। रोहिलखंड का यह दौर अपने आप में एक अलग अध्याय है, जहाँ स्थानीय नवाबों और सरदारों ने अपनी स्वायत्तता के लिए कड़ा संघर्ष किया।

23 अप्रैल 1774: मीरानपुर कटरा के युद्ध ने कैसे पलट दिया इतिहास?
इतिहास में कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जो सब कुछ बदल देती हैं । शाहजहांपुर के लिए वह तारीख थी- 23 अप्रैल 1774। शाहजहांपुर से कुछ ही दूरी पर स्थित 'मीरानपुर कटरा' के मैदान में एक ऐसा युद्ध लड़ा गया जिसने रोहिलखंड के इतिहास पर हमेशा के लिए पूर्णविराम लगा दिया । इसे 'पहला रोहिला युद्ध' कहा जाता है । इस युद्ध में एक तरफ रोहिला सरदार हाफिज रहमत खान थे, और दूसरी तरफ अवध के नवाब शुजा-उद-दौला, जिन्हें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना का समर्थन प्राप्त था ।
यह युद्ध केवल दो सेनाओं की टक्कर नहीं थी, बल्कि यह कंपनी-समर्थित राजनीति (Company-backed politics) का भारत में एक बड़ा उदाहरण था। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार इस भीषण युद्ध में रोहिलों की हार हुई और उनके महान नेता हाफिज रहमत खान मारे गए । इस युद्ध ने शाहजहांपुर और पूरे रोहिलखंड का भाग्य बदल दिया । रोहिलों का स्वतंत्र शासन समाप्त हो गया और यह क्षेत्र अवध के नवाब के अधीन आ गया ।
आज के शाहजहांपुर में कितनी जिंदा है उस दौर की विरासत?
आज जब हम शाहजहांपुर की गलियों से गुजरते हैं, तो हमें उस दौर की झलक मिलती है । दिलेर खान और बहादुर खान द्वारा बनाए गए किले के अवशेष, पुराने मोहल्ले और लोगों की जुबान पर चढ़ी कहानियां उस दौर को जीवंत करती हैं । हाल ही में स्थानीय स्तर पर नामों को लेकर होने वाली चर्चाएं हमें याद दिलाती हैं कि इतिहास केवल किताबों में बंद रहने वाली चीज नहीं है, बल्कि यह हमारे वर्तमान और पहचान का हिस्सा है ।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2dm5qatq
https://tinyurl.com/2dhuljfg
https://tinyurl.com/28lha93v
https://tinyurl.com/2am2gj8m
https://tinyurl.com/242vnam7
https://tinyurl.com/2ckurfp2