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जब हम शाहजहांपुर की गलियों से गुजरते हैं, तो सबसे पहले हमारी नजर यहाँ की इमारतों, मकानों और दीवारों पर पड़ती है। यह हमारे शहर की 'बाहरी त्वचा' है। लेकिन क्या आपने कभी रुककर सोचा है कि शाहजहांपुर का यह बाहरी आवरण आखिर किस चीज से बना है? शाहजहांपुर की वास्तुकला की कहानी किसी बड़े आर्किटेक्ट के नक्शे से नहीं, बल्कि एक बहुत ही बुनियादी सवाल से शुरू होती है कि हम अपने सिर पर जो छत और चारों तरफ जो दीवार खड़ी कर रहे हैं, उसकी मिट्टी कहाँ से आई है? यह कहानी धूप में सूखी मिट्टी से लेकर आग की भट्ठी में तपकर लाल हुई ईंटों तक के सफर की है।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि इंसान ने घर बनाना कैसे सीखा। शुरुआत में लोग 'मडब्रिक' यानी कच्ची ईंटों का इस्तेमाल करते थे। यह गीली मिट्टी और भूसे का मिश्रण होता था, जिसे सांचे में ढालकर धूप में सुखा लिया जाता था। लेकिन धूप में सूखी ईंटों की एक सीमा थी-वे बारिश और बाढ़ का सामना ज्यादा देर तक नहीं कर सकती थीं। सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब इंसान ने 'फायरिंग' यानी पकाने की तकनीक सीखी। जब उसी मिट्टी को आग में पकाया गया, तो वह पत्थर जैसी सख्त हो गई। पक्की ईंट का मतलब सिर्फ एक मजबूत दीवार नहीं था, बल्कि यह इस बात का ऐलान था कि "हम यहाँ रहने आए हैं।" पक्की ईंटों से घर बनाना 'स्थायित्व' का प्रतीक बन गया। शाहजहांपुर के पुराने पक्के मकान इसी बात के गवाह हैं कि हम खानाबदोश जिंदगी छोड़कर एक जगह बसने का फैसला कर चुके थे।
हमारे घरों की दीवारों में लगी मिट्टी आखिर आती कहाँ से है?
ईंटें हवा में नहीं बनतीं, उनके लिए खास तरह की मिट्टी चाहिए होती है। और यहीं पर शाहजहांपुर का भूगोल सबसे अहम भूमिका निभाता है। हमारा जिला गंगा के मैदानी इलाके का हिस्सा है और यहाँ की जमीन 'जलोढ़' मिट्टी से बनी है। गर्रा और अन्य नदियों ने लाखों सालों में यहाँ बाढ़ के मैदान तैयार किए हैं। इन मैदानों में गाद और चिकनी मिट्टी की मोटी परतें जमी हैं। यही वह मिट्टी है जो ईंट बनाने के लिए सबसे बेहतरीन होती है।
नदियाँ न केवल खेती के लिए पानी देती थीं, बल्कि घर बनाने के लिए जरूरी गाद और मिट्टी भी मुहैया कराती थीं। इसलिए, जब हम शाहजहांपुर के उन पुराने मोहल्लों को देखते हैं जो नदियों के करीब हैं, तो हमें समझ आता है कि वहां की इमारतों में इस्तेमाल हुई सामग्री कहीं दूर से नहीं आई, बल्कि उसी नदी के किनारे से उठाई गई थी। सरकारी दस्तावेज भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि शाहजहांपुर में ईंट बनाने वाली मिट्टी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यह दस्तावेज भूविज्ञान को सीधे हमारे घरों की दीवारों से जोड़ता है। यहाँ की जमीन के नीचे ही वह कच्चा माल मौजूद है जो भट्टों में तपकर लाल ईंट बनता है। यह "नदी से दीवार तक" की सबसे मजबूत कड़ी है।
आज के दौर में ईंट पकाने का तरीका कैसे बदल गया है?
मिट्टी मिल गई, लेकिन उसे ईंट कैसे बनाया जाता है? अब पुराने पारंपरिक भट्ठों की जगह नई 'जिग-जैग' तकनीक ले रही है। यह प्रक्रिया न केवल ईंधन की बचत करती है, बल्कि प्रदूषण भी कम करती है। आज हमारे शहर का जो 'बाहरी स्वरूप' बन रहा है, उसके पीछे एक पूरा विज्ञान और दक्षता का गणित काम करता है। यही प्रक्रिया तय करती है कि ईंट कितनी लाल और कितनी मजबूत होगी। यह दिखाता है कि कैसे हम कुदरती मिट्टी को अपनी अकलमंदी से एक मजबूत ढांचे में बदल रहे हैं।
क्या 'शहर की त्वचा' बनाने की हमें कोई कीमत चुकानी पड़ती है?
लेकिन इस निर्माण यात्रा का अंत हमेशा आसान नहीं होता। आज के दौर में ईंट-भट्टों को कड़े नियमों का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही में शाहजहांपुर विकास प्राधिकरण (SDA) ने कार्रवाई करते हुए उन ईंट-भट्टों को सील करना शुरू किया है जो मानकों का पालन नहीं कर रहे थे। यह कार्रवाई बताती है कि "शहर की त्वचा" बनाने की एक कीमत है। प्रदूषण के नियम और प्रशासनिक सख्ती अब इस उद्योग का हिस्सा बन गए हैं।
अंत में, शाहजहांपुर की वास्तुकला को देखने का नजरिया बदलना होगा। जब आप अगली बार किसी पक्की दीवार पर हाथ रखें, तो याद करें कि यह महज एक बेजान ढांचा नहीं है। यह उसी गर्रा और रामगंगा की लाई हुई मिट्टी है, जिसे इंसान ने अपनी बुद्धि और आग की ताकत से 'अमर' बना दिया है।
संदर्भ
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