क्या आप जानते हैं, आज कृषि विस्तार से हमारे महत्वपूर्ण वन और पशु कैसे प्रभावित होते हैं?

भूमि और मिट्टी के प्रकार : कृषि योग्य, बंजर, मैदान
19-05-2026 10:19 AM
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क्या आप जानते हैं, आज कृषि विस्तार से हमारे महत्वपूर्ण वन और पशु कैसे प्रभावित होते हैं?

चलिए आज समझते हैं कि, कृषि भूमि के विस्तार से वनों की कटाई कैसे होती है, और किस प्रकार जानवरों के आवासों का नुकसान होता है। फिर, हम देखेंगे कि इससे जैव विविधता, वनस्पतियां और जीव कैसे प्रभावित होते हैं। उसके बाद, हम मानव-वन्यजीव संघर्ष और गहन कृषि पद्धतियों के प्रभावों की जांच करेंगे। हम यह भी पता लगाएंगे कि, उर्वरक और कीटनाशक जैसे रसायन पारिस्थितिक तंत्र को कैसे नुकसान पहुंचाते हैं। जबकि, लेख के अंत में हम पर्यावरण संरक्षण के साथ कृषि को संतुलित करने के महत्व को समझेंगे।

वनों की कटाई से तात्पर्य, वनों से अन्य भूमि उपयोगों के लिए पेड़ काटना, या पेड़ों के आवरण को दीर्घकालिक तौर पर 10% से कम करना है। यह कटाई जलवायु अस्थिरता और जैव विविधता हानि में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता है। इसलिए, आज यह दुनिया के सामने खड़े सबसे गंभीर पर्यावरणीय मुद्दों में से एक है।

वनों की कटाई प्राकृतिक और मानव-प्रेरित घटनाओं के कारण होती है। जंगल की आग तथा तूफान और सूखे जैसी प्राकृतिक घटनाएं जंगलों को नष्ट कर सकती हैं। हालांकि, वनों की कटाई अक्सर व्यावसायिक या मानवीय जरूरतों के लिए की जाती है। वनों की कटाई के प्रमुख कारणों में से एक कृषि भूमि का विस्तार है, जो इनकी कटाई में 70% से अधिक योगदान देता है। खेती के लिए जंगल के विशाल क्षेत्रों को साफ़ करना, कटाई और ईंधन की लकड़ी का उपयोग, आदि प्राथमिक गतिविधियां वनों की कटाई में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। 

दूसरी ओर, निर्वाह खेती, जिसमें किसान अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए फसलें उगाते हैं, एवं वाणिज्यिक कृषि, जो निर्यात या देशज उपयोग के लिए फसलें उगाती है, दोनों ही सैकड़ों से हजारों हेक्टेयर जंगल कटाई के लिए जिम्मेदार हैं। निर्वाह खेती कई देशों में आम है, और यह लाखों लोगों के लिए अपने परिवार का भरण-पोषण करने का एकमात्र तरीका है। इन क्षेत्रों में किसान आमतौर पर पेड़ों को काटकर और उन्हें जलाकर, भूमि के छोटे भूखंडों को साफ करते हैं। दुर्भाग्य से, यह प्रथा टिकाऊ नहीं है, क्योंकि जब खेती की मिट्टी बंजर हो जाती है, तब किसानों को भूमि के अन्य हिस्सों से पेड़ काटने पड़ते हैं और यह प्रक्रिया चलती रहती है । दूसरी ओर, वाणिज्यिक कृषि में सोया और पाम तेल जैसी नकदी फसलों के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए, जंगल के विशाल क्षेत्रों को साफ करना शामिल है।

वनों की कटाई के लिए ज़िम्मेदार कुछ शीर्ष कृषि उत्पाद -  पाम तेल, सोया, गोमांस और लकड़ी हैं। पाम तेल के बागान, विशेष रूप से दक्षिण पूर्व एशिया और मध्य अफ्रीका में उष्णकटिबंधीय वनों की कटाई का एक प्रमुख चालक रहे हैं। और सोयाबीन की खेती दक्षिण अमेरिका में उष्णकटिबंधीय वर्षावनों की कटाई का एक महत्वपूर्ण कारक है।

इस प्रकार हो रहे कृषि विस्तार से जैव विविधता को भी खतरा है। वनों का कृषि भूमि में रूपांतरण, उनके निवास स्थानों में गिरावट का प्रमुख कारण है। 1990 के बाद, दुनिया भर में प्राथमिक वनों का क्षेत्रफल 80 मिलियन हेक्टेयर से अधिक कम हो गया है। इसके परिणामस्वरूप, निवास स्थान का विनाश, विखंडन और अंततः विलुप्ति हुई है। 1962 और 2017 के बीच, विश्व स्तर पर लगभग 340 मिलियन हेक्टेयर नई फसल भूमि और 470 मिलियन हेक्टेयर प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को चरागाहों में परिवर्तित कर दिया गया, जिससे ये महत्वपूर्ण तंत्र नष्ट हो गए। दूसरी ओर, कीटनाशकों, उर्वरकों और रसायनों के अत्यधिक उपयोग वाली ये औद्योगिक कृषि पद्धतियां, भूजल और जल प्रणालियों को प्रदूषित करती है, जिससे जलीय और स्थलीय प्रजातियां भी प्रभावित होती हैं।  

प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) द्वारा खतरे के रूप में पहचानी गई 25,000 प्रजातियों में से लगभग 13,382 प्रजातियां, मुख्य रूप से कृषि भूमि की कटाई और क्षरण के कारण खतरे में हैं।  और, लगभग 3,019 प्रजातियां शिकार और मछली पकड़ने, एवं 3,020 प्रजातियां खाद्य प्रणाली से होने वाले प्रदूषण से प्रभावित होती हैं। इसके अलावा, मूल जंगलों या वनस्पति की तुलना में कृषि भूमि में काफी कम कार्बन जमा होता है।  भूमि-उपयोग में परिवर्तन, दीर्घावधि में 17 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित कर सकता है। इससे जलवायु संकट बिगड़ सकता है, और पारिस्थितिक तंत्र बाधित होकर जैव विविधता को खतरा हो सकता है। 

इस प्रकार, कृषि विस्तार ने आवासों को खंडित कर दिया है, पारिस्थितिक तंत्र को अलग कर दिया है, और इससे अंतःप्रजनन, संसाधनों की कमी और सीमित गतिशीलता के कारण प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा बढ़ गया है। 
पशुओं के आवासों का खंडन, मानव-पशु संघर्ष को भी बढ़ाता है। मानव-पशु संघर्ष को, मानव और वन्यजीवों के बीच आने या होने वाले किसी भी तरह के संबंध के रूप में परिभाषित किया गया है। इसके परिणामस्वरूप मानवीय सामाजिक-आर्थिक या सांस्कृतिक जीवन, वन्यजीव आबादी के संरक्षण और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह संघर्ष, सिर्फ शारीरिक हमलों के बारे में नहीं, बल्कि स्थान और संसाधनों के लिए एक जटिल प्रतिस्पर्धा के बारे में भी है।  

जैसा कि हमने ऊपर पढ़ा है, प्राकृतिक तंत्रों को खेतों, सड़कों और बस्तियों में बदलने से, वन्यजीवों के निवास स्थान सीधे तौर पर नष्ट हो जाते हैं, और इनका विखंडन होता है। जैसे-जैसे इन क्षेत्रों और पशु प्रवास गलियारों में मानव आबादी फैलती है, वहां यह मानव और पशुओं में भिड़ंत को मजबूर करती है। राजमार्ग, रेलवे और नहरों जैसे रैखिक बुनियादी ढांचे भी प्राकृतिक आवासों को खराब करते हैं। इससे पशुओं का वाहनों से टकराव बढ़ता है और बिजली के झटके से उनकी मृत्यु भी होती है।

चलिए, अब एक अन्य कारक पर गौर करते हैं। मोनोक्रॉपिंग (Monocropping) या एकल फसल, भूमि के एक ही खंड पर साल दर साल एक ही फसल उगाने की प्रथा है। पाम तेल और सोया एकल फसल के ही उदाहरण है। इस अभ्यास से, मिट्टी में पोषक तत्वों और कार्बनिक पदार्थों की कमी हो जाती है और भूमि का क्षरण हो सकता है। एकल फसल, भूमि उर्वरता में ऐसी समस्याएं निर्माण करती है, जिनके लिए रासायनिक उर्वरकों के उपयोग की आवश्यकता होती है। साथ ही, मिट्टी के कवक, कीड़े और अन्य उपद्रवी जीवों को नियंत्रित करने हेतु कीटनाशकों के उपयोग की भी आवश्यकता होती है। इससे मिट्टी के लाभकारी सूक्ष्मजीव कम हो जाते हैं, और समय के साथ पौधों की वृद्धि भी कम होती है। कुछ प्रकार के नाइट्रोजन उर्वरक, मिट्टी के अम्लीकरण का कारण भी बन सकते हैं। उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से, मिट्टी में लवण का निर्माण, भारी धातु दूषितकरण, और नाइट्रेट का संचय भी हो सकता है, जो जल प्रदूषण का एक स्रोत है और मनुष्यों के लिए भी हानिकारक भी है।

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दूसरी ओर, कीटनाशकों का संपर्क कैंसर, अंतःस्रावी व्यवधान, न्यूरोटॉक्सिसिटी, गुर्दे और यकृत की क्षति, प्रजनन एवं जन्म दोष और असंख्य प्रजातियों में विकासात्मक परिवर्तनों से जुड़ा हुआ है। कीटनाशकों के संपर्क में आने से, किसी जीव का व्यवहार भी बदल सकता है, जिससे उसकी जीवित रहने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। ये रसायन मिट्टी के सूक्ष्मजीवों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, जिससे उनकी विविधता, प्रचुरता और कार्य प्रभावित होते हैं। कीटनाशकों के अवशेष मिट्टी में लाभकारी बैक्टीरिया की विविधता और बहुतायत को कम कर सकते हैं। इसके अलावा, कीटनाशकों का बार-बार उपयोग सूक्ष्मजीव आबादी संरचना को बदल सकता है।

इन कारकों की वजह से, आज टिकाऊ एवं धारणीय कृषि पद्धतियों की ओर रुख बढ़ रहा है। टिकाऊ कृषि का उद्देश्य, भूमि के दीर्घकालिक स्वास्थ्य और उत्पादकता को सुनिश्चित करते हुए, खाद्य उत्पादन के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना है। ऐसी प्रथाएं, प्राकृतिक आवासों के संरक्षण को प्राथमिकता देती है। बड़े पैमाने पर भूमि की सफ़ाई से बचकर और हानिकारक रसायनों के उपयोग को कम करके, किसान पारिस्थितिक तंत्र की अखंडता को बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।  इससे वन्यजीवों को सुरक्षित आश्रय मिल सकता है। विविध तथा अच्छी तरह से प्रबंधित पारिस्थितिकी तंत्र, विभिन्न प्रजातियों के लिए अधिक लचीले और सहायक होते हैं। कृषि वानिकी और बहु फसल जैसी स्थायी कृषि पद्धतियां, जैव विविधता को प्रोत्साहित करती हैं, और ऐसे आवास बनाती हैं, जो पौधों और जानवरों की एक श्रृंखला को बनाए रख सकते हैं।

टिकाऊ कृषि, स्वस्थ मिट्टी बनाए रखने और जल संसाधनों के संरक्षण पर केंद्रित है। इससे न केवल फसल की पैदावार को फायदा होता है, बल्कि आस-पास के जल निकायों को संरक्षित करने, प्रदूषण को रोकने और जलीय पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा में भी मदद मिलती है। इसके अलावा, जैविक खेती प्राकृतिक विकल्पों को प्राथमिकता देती हैं, जिससे मिट्टी, पानी और पारिस्थितिकी तंत्र में रासायनिक  दूषितकरण का खतरा कम होता है।


संदर्भ 
1.    https://tinyurl.com/23j6ktwk 
2.    https://tinyurl.com/2xtaect7 
3.    https://tinyurl.com/y6h525av 
4.    https://tinyurl.com/f55858sd 
5.    https://tinyurl.com/582fnjn9 
6.    https://tinyurl.com/n6r756zv 
7.    https://tinyurl.com/4ny3hhd4   

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