राइट ब्रदर्स से लेकर स्वदेशी तेजस तक, जरूर जानें विमानन का इतिहास, विज्ञान और सैन्य सफर

हथियार और खिलौने
07-08-2026 09:40 AM
राइट ब्रदर्स से लेकर स्वदेशी तेजस तक, जरूर जानें विमानन का इतिहास, विज्ञान और सैन्य सफर

क्या आप जानते हैं कि, हवाई जहाज का पहला सच्चा संस्करण इंग्लैंड में सर जॉर्ज कैली (Sir George Caley) द्वारा बनाया गया था। उन्नीसवीं सदी तक निश्चित पंख और प्रोपेलेंट (Propellent) प्रणाली वाले विमान के डिजाइन नहीं थे। इसी समय, 1874 में फेलिक्स डू टेम्पल (Felix Du Temple) भाप से चलने वाले मोनोप्लेन (Monoplane) के साथ संचालित उड़ान का प्रयास करने वाले पहले व्यक्ति बने। किसी विमान में पहली निरंतर एवं नियंत्रित उड़ान, 1903 में राइट ब्रदर्स (Wright Brothers) द्वारा हासिल की गई थी। 1905 फ़्लायर (Flyer), तीन-अक्ष नियंत्रण वाला पहला विमान था, और भविष्य के सभी विमानों का आधार बना।

1889 में लॉरेंस हार्ग्रेव (Lawrence Hargrave) ने रोटरी इंजन का आविष्कार किया, जो संचालित उड़ान के लिए एक बड़ा कदम था। संचालित उड़ान ने अधिक नियंत्रण और अधिक सीमा की अनुमति दी, और उड़ान को परिवहन का एक व्यवहार्य तरीका बना दिया। जल्द ही लोग विमानन का अध्ययन करने लगे। फिर कुछ वर्षों बाद, 1914 में इगोर सिकोरस्की (Igor Sikorsky) ने एक बड़ा चार इंजन वाला बाइ-प्लेन (Bi–plane) बनाया, जो एक पायलट और एक सह-पायलट के लिए दोहरे नियंत्रण, केबिन प्रकाश व्यवस्था, बिस्तर और शौचालय के साथ लंबी दूरी तक उड़ान भरने में सक्षम था। इसका उपयोग निजी और सैन्य भूमिकाओं के लिए किया जाता था।

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प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, सशस्त्र बलों के लिए हवा से हमला करने में सक्षम होना एक रोमांचक अवधारणा थी। 1914 तक, विमानों को काफी परिष्कृत किया गया था। जबकि, दूसरे विश्व युद्ध तक विमानों में हथियारों के रूप में भी काफी सुधार हो चुका था। तब लड़ाके और बमवर्षक विमान आम हो गए थे। विश्व युद्ध के बाद, ऐसे स्टील्थ विमान (Stealth Planes) बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिन्हें रडार द्वारा पहचाना नहीं जा सकता था।  इसके अलावा, सुपरसोनिक विमान 1947 से महत्वपूर्ण बने हैं। लेकिन बेहतर डिजाइनों की बदौलत, अब सुपरसोनिक उड़ान में नए सिरे से दिलचस्पी बढ़ी है।

दरअसल, उड़ान हासिल करने और उसे बनाए रखने के लिए, एक हवाई जहाज चार बुनियादी वायुगतिकीय बलों के सावधानीपूर्वक संतुलन पर निर्भर करता है: लिफ्ट (Lift), वेट (Weight), थ्रस्ट (Thrust), और ड्रैग (Drag)। किसी विमान को सुचारू रूप से उड़ान भरने के लिए, इन बलों को संतुलित होना चाहिए।

1. थ्रस्ट: यह विमान के प्रोपेलर (Propeller) या जेट इंजन द्वारा उत्पन्न वायुगतिकीय बल है, जो आकाश में हवाई जहाज को आगे धकेलता या खींचता है।

2. ड्रैग: यह थ्रस्ट का विरोधी बल है। ड्रैग वह घर्षण और वायु प्रतिरोध है, जो वायुमंडल में उड़ते समय विमान को धीमा करने की कोशिश करता है। खिंचाव को कम करने और उच्च गति बनाए रखने के लिए, विमानों को वायुगतिकीय बनाया जाता है (जैसे कि, उड़ान भरने के बाद उनके लैंडिंग गियर को वापस लेना)। किसी विमान को आगे बढ़ने और उसकी गति बनाए रखने या बढ़ाने के लिए, थ्रस्ट, ड्रैग के बराबर या उससे अधिक होना चाहिए।

3. वेट: यह हवाई जहाज के द्रव्यमान पर गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे की ओर लगने वाला बल है। भारी वाणिज्यिक विमानों में काफी वजन होता है, जो उन्हें पृथ्वी की ओर खींचता है।

4. लिफ्ट: यह ऊपर की ओर जाने वाला विरोधी बल है, जो वजन पर काबू पाता है, और हवाई जहाज को हवा में बनाए रखता है। विमान को ऊपर उठाने या उसकी ऊंचाई बनाए रखने के लिए, लिफ्ट, वजन के बराबर या उससे अधिक होना चाहिए। लिफ्ट तभी मौजूद हो सकता है, जब किसी ठोस वस्तु और गतिशील तरल पदार्थ (वायु) के बीच गति में सापेक्ष अंतर हो। विमान का पंख आने वाले वायु प्रवाह को विभाजित करने के लिए एयरफ़ॉइल (Airfoil) के रूप में कार्य करता है।

एयरफ़ॉइल आकार और हवा की गति: विमानों के पंख को विशेष रूप से आकार दिया जाता है, और वह झुका हुआ होता है। इससे पंख के शीर्ष पर बहने वाली हवा का मार्ग संकीर्ण हो जाता है, जिससे वह नीचे से गुजरने वाली हवा की तुलना में तेज़ गति से बहती है।

बर्नौली का सिद्धांत (Bernoulli’s principle): द्रव गतिकी के अनुसार, जैसे-जैसे हवा की गति बढ़ती है, उसका दबाव कम हो जाता है। चूंकि पंख के ऊपर बहने वाली हवा तेजी से चलती है, यह पंख के नीचे धीमी गति से बहने वाली हवा की तुलना में कम दबाव डालती है। दबाव में यह अंतर ऊपर की ओर दबाव पैदा करता है, जिसे लिफ्ट के रूप में जाना जाता है।

आकाश में दिशा बदलने और संचालन करने के लिए, पायलट एयरफ़ोइल के आकार को बदलते हैं, और विशिष्ट नियंत्रण प्रणालियों का उपयोग करके, बलों के संतुलन को समायोजित करते हैं।

पूरे इतिहास में, वाणिज्यिक प्रौद्योगिकियां अक्सर सैन्य प्रगति से विकसित हुई हैं। हवाई जहाज के विकास में भी, यही नियम लागू होता है। उड़ान भरने की क्षमता का उपयोग, सबसे पहले खोज करने वाले विमानों को विकसित करने के लिए किया गया था। फिर, एक बार जब लोगों ने उन विमानों को मार गिराने की तकनीक विकसित कर ली, तो लड़ाकू विमान पेश किए गए। इस कारण, विमानों को हल्का, तेज़ और अधिक चुस्त बनाना पड़ा, जिससे राष्ट्रो को नवाचार करना पड़ा।

इससे अंततः ऐसे विमान तैयार हुए जो व्यावसायिक उपयोग के लिए पर्याप्त सुरक्षित और विश्वसनीय थे। प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद, पूरी दुनिया में वाणिज्यिक विमान सेवाएं उभरने लगीं। हवाई यात्रा में नवाचार का अगला बड़ा दौर 1940 के दशक में द्वितीय विश्व युद्ध के साथ हुआ। बोइंग (Boeing) विमान, जो पहले छोटे मेल वाहक और वाणिज्यिक विमान थे, तब सैन्य परिदृश्य में प्रवेश कर गए।

प्रथम विश्व युद्ध में पहले हवाई जहाजों का उपयोग किए जाने के बाद से, सैन्य विमानन ने एक लंबा सफर तय किया है। प्रोपेलर-चालित बाइप्लेन से लेकर गुप्त लड़ाकू विमानों तक, सैन्य विमानों की तकनीक पिछली शताब्दी में काफी विकसित हुई है। सैन्य वैमानिकी के शुरुआती दिनों में, विमान अपेक्षाकृत सरल मशीनें थीं। आम तौर पर, वे पिस्टन इंजन (Piston engine) द्वारा संचालित बाइप्लेन थे, और हवाई लड़ाई के लिए मशीन गन से लैस थे। ये विमान दुश्मन की गोलाबारी के प्रति संवेदनशील थे, और कम ऊंचाई पर ही उड़ सकते थे। हालांकि, वे खोज करने और जमीनी हमले की भूमिकाओं में अत्यधिक प्रभावी साबित हुए।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद अधिक शक्तिशाली इंजनों की शुरूआत और वायुगतिकी में प्रगति के कारण तेज और अधिक गतिशील विमानों का विकास हुआ। फिर, प्रोपेलर-चालित लड़ाकू विमान द्वितीय विश्व युद्ध में प्रमुख बन गए। ये विमान उच्च गति और ऊंचाई पर उड़ान भरने में सक्षम थे, तथा वे रडार और रॉकेट जैसी उन्नत हथियार प्रणालियों से लैस थे।

1940 के दशक के अंत में जेट-संचालित विमानों के विकास ने सैन्य विमानन में एक महत्वपूर्ण मोड़ लाया। जेट इंजन, पिस्टन इंजन की तुलना में अधिक शक्तिशाली और कुशल थे, जिससे विमान बहुत अधिक गति और ऊंचाई पर उड़ सकते थे। बाद में, 1980 के दशक में स्टील्थ तकनीक (Stealth technology) के विकास ने सैन्य विमानन में क्रांति ला दी। स्टील्थ तकनीक को रडार पर विमान का पता लगाना कठिन बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया था, और इसने अत्यधिक उन्नत लड़ाकू जेट के विकास की अनुमति दी। ये विमान उन्नत एवियोनिक्स (Avionics), सेंसर और हथियार प्रणालियों से लैस हैं, जो उन्हें दुनिया के सबसे सक्षम लड़ाकू विमानों में से एक बनाते हैं।

सैन्य विमान प्रौद्योगिकी के भविष्य में, यह संभावना है कि, विमान प्रौद्योगिकी का विकास जारी रहेगा, तथा प्रोपेलेंट, सामग्री और एवियोनिक्स में नई प्रगति के साथ और भी अधिक उन्नत लड़ाकू विमान तैयार होंगे। सैन्य विमान प्रौद्योगिकी का विकास, मानव जगत की सरलता और नवीनता का प्रमाण है, और यह सभी देशों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहेगा।

इसी का एक उदाहरण, हमारे देश का लड़ाकू विमान - एचएएल तेजस (HAL Tejas) है। यह एक भारतीय एकल इंजन, 4.5 जनरेशन, एवं डेल्टा विंग वाला बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान है, जिसे एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी द्वारा डिजाइन किया गया है। इसे भारतीय वायु सेना (आईएएफ) और भारतीय नौसेना के लिए, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा निर्मित किया गया है। इस विमान ने 2001 में अपनी पहली उड़ान भरी थी, और इसने 2015 में भारतीय वायुसेना के साथ सेवा में प्रवेश किया। यह विमान अपनी जेनरेशन के सुपरसोनिक लड़ाकू विमानों में सबसे छोटा और हल्का है।

1980 के दशक में, भारतीय वायु सेना मिग-21 जैसे पुराने लड़ाकू विमानों का संचालन कर रही थी। मिग-21, 1963 से भारतीय वायुसेना का मुख्य आधार रहा है। फिर, 1983 में भारत सरकार ने भारतीय वायुसेना के पुराने बेड़े को बदलने के लिए एक नया हल्का लड़ाकू विमान विकसित करने के प्रारंभिक लक्ष्य के साथ लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (Light Combat Aircraft) कार्यक्रम की स्थापना की थी। इसी कार्यक्रम के चलते तेजस विमान का विकास किया गया।

संदर्भ

1. https://tinyurl.com/ynspwfdj 

2. https://tinyurl.com/56rcxnku 

3. https://tinyurl.com/yry42yvz 

4. https://tinyurl.com/2dtcj2uw 

5. https://tinyurl.com/yb5368kf 

6. https://tinyurl.com/5b4wn7y5 

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