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प्रिय इंदौरवासियों, हमारा शहर इंदौर न केवल अपनी बेमिसाल स्वच्छता, जीवंत संस्कृति और ख़ास खान-पान के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, बल्कि इसका अपना एक अत्यंत गौरवशाली और ऐतिहासिक अतीत भी रहा है। भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौर में इंदौर ने देश को एक नई वैचारिक, भाषाई और सामाजिक दिशा देने में बेहद अहम भूमिका निभाई थी। जब महात्मा गांधी ने भारत की भाषाई पहचान को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने का संकल्प लिया, तब उन्होंने मध्य भारत के इस ऐतिहासिक शहर इंदौर को अपने हिंदी संबंधी प्रयासों के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में देखा। वर्ष 1918 और 1935 में महात्मा गांधी के इंदौर दौरों ने न केवल हिंदी (या हिंदुस्तानी) को भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि यहाँ के कृषि और ग्रामीण सुधारों को भी देश के सामने एक मिसाल के रूप में पेश किया। गांधीजी के इन दौरों और उनके द्वारा इंदौर के विषय में लिखे गए विचारों ने इस शहर के इतिहास में एक ऐसा स्वर्णिम अध्याय जोड़ा है, जिस पर हर इंदौरवासी को गर्व होना स्वाभाविक है।

आज हम समझेंगे कि महात्मा गांधी के 1918 और 1935 के इंदौर दौरों ने हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने के आंदोलन में क्या ऐतिहासिक भूमिका निभाई। फिर, हम जानेंगे कि इंदौर का 'इंसिट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री' (Institute of Plant Industry) कैसे कृषि सुधारों और कम्पोस्ट खाद निर्माण की 'इंदौर प्रक्रिया' (Indore Process) का एक विश्व प्रसिद्ध केंद्र बना। इसके बाद, हम महात्मा गांधी द्वारा अपनी प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका 'हरिजन' (Harijan) में इंदौर के कृषि व जैविक सुधारों पर लिखे गए विचारों को विस्तार से देखेंगे। अंत में, हम यह भी समझेंगे कि कैसे इंदौर के इन प्रयोगों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था, तकनीकी सुधारों और वैचारिक स्वराज के निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया।
राष्ट्रभाषा हिंदी का आंदोलन और इंदौर के ऐतिहासिक दौरे
भारत की भाषाई पहचान और राजनीतिक स्वाधीनता के बीच के फ़ासले को मिटाने के लिए महात्मा गांधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने का ऐतिहासिक आह्वान किया था। इस राष्ट्रीय आंदोलन की वास्तविक नींव इंदौर की पावन धरा पर ही रखी गई थी। वर्ष 1918 में जब महात्मा गांधी इंदौर आए, तो उन्होंने यहाँ आयोजित 'हिंदी साहित्य सम्मेलन' के आठवें अधिवेशन की अध्यक्षता की थी। इंदौर के इस ऐतिहासिक मंच से ही गांधीजी ने हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके इस आह्वान ने पूरे देश में एक नई चेतना का संचार किया।

इसके बाद वर्ष 1935 में महात्मा गांधी एक बार फिर इंदौर पधारे और यहाँ आयोजित 24वें हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिस्सा लिया। गांधीजी का यह स्पष्ट मानना था कि जब तक देश की अपनी एक सर्वसम्मत संपर्क भाषा नहीं होगी, तब तक राष्ट्रीय एकता और पूर्ण स्वराज का सपना अधूरा रहेगा। इंदौर इस भाषाई आंदोलन के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभरा और देश के उत्तर और दक्षिण, पूर्व और पश्चिम के बीच एक मज़बूत सेतु का कार्य किया। गांधीजी के इन दोनों दौरों ने इंदौर को राष्ट्रभाषा आंदोलन के प्रमुख केंद्रों में स्थान दिलाया। इंदौर की जनसभाओं में दिए गए उनके भाषणों ने यहाँ के नागरिकों में राष्ट्रप्रेम और स्वदेशी भाषा के प्रति निष्ठा को मजबूत किया।
'इंसिट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री' और कम्पोस्ट खाद की ‘इंदौर प्रक्रिया’
महात्मा गांधी का इंदौर से जुड़ाव केवल भाषाई आंदोलन तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वे यहाँ के वैज्ञानिक और कृषि सुधारों से भी गहरे प्रभावित थे। इंदौर में स्थित 'इंस्टिट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री' (Institute of Plant Industry) उस समय कृषि अनुसंधान का एक अग्रणी और प्रतिष्ठित संस्थान था। वर्ष 1924 में ब्रिटिश कृषि विज्ञानी अल्बर्ट हावर्ड (Albert Howard) को इस संस्थान का निदेशक और मध्य भारत व राजपूताना की रियासतों का कृषि सलाहकार नियुक्त किया गया था। अल्बर्ट हावर्ड और भारतीय रसायनज्ञ वाई. डी. वाड (Y. D. Wad) ने भारतीय किसानों की पारंपरिक खेती के तरीक़ों और फ़सलों का गहराई से अध्ययन किया।

भारतीय कृषकों के अनुभवों और पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक रूप से सुव्यवस्थित करके उन्होंने एक नई तकनीक विकसित की, जिसे दुनिया भर में 'इंदौर प्रक्रिया' के नाम से जाना गया। इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य कृषि अवशेषों, फ़ार्म के कचरे, मवेशियों के गोबर और मानव मल (नाइट-सॉइल) का उपयोग करके उच्च गुणवत्ता वाली कम्पोस्ट खाद (Humus) तैयार करना था। वर्ष 1931 में अल्बर्ट हावर्ड और वाई. डी. वाड की पुस्तक 'द वेस्ट प्रोडक्ट्स ऑफ एग्रीकल्चर: देयर यूटिलाइजेशन एज़ ह्यूमस' (The Waste Products of Agriculture: Their Utilisation as Humus) ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित हुई। इस शोध में भारतीय कृषकों की पारंपरिक कृषि पद्धतियों और अनुभवों को व्यवस्थित रूप से समझने और उनका उपयोग करने का प्रयास दिखाई देता है।
पत्रिका 'हरिजन' में गांधीजी के लेख और इंदौर के प्रयोग
महात्मा गांधी ने इंदौर के इस कृषि प्रयोग को ग्रामीण पुनरुद्धार और सफ़ाई के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना। अप्रैल 1935 में जब गांधीजी इंदौर के दौरे पर थे, तब उन्होंने यहाँ आयोजित एक ग्रामीण शिल्प प्रदर्शनी में भाग लिया। हालाँकि उस समय बेमौसम बारिश से प्रदर्शनी को कुछ नुक़सान पहुँचा था, लेकिन गांधीजी ने इंदौर के इन प्रयासों को गहराई से देखा और समझा। 23 अप्रैल 1935 को गांधीजी ने इंसिट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री का प्रत्यक्ष अवलोकन भी किया।

इसके बाद, 17 अगस्त 1935 को महात्मा गांधी ने अपनी प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका 'हरिजन' के अंक में इंदौर के इस संस्थान द्वारा जारी किए गए पत्रक (Leaflet) को लगभग पूरा का पूरा पुनर्मुद्रित (Reprint) किया। 'कम्पोस्ट मैन्योर' (Compost Manure) शीर्षक से लिखे गए इस लेख में गांधीजी ने इंदौर प्रक्रिया से कम्पोस्ट खाद बनाने की पूरी विधि अपने पाठकों के सामने रखी। गांधीजी ने ख़ास तौर पर यह लेख गाँव के कार्यकर्ताओं और हरिजन भाइयों के लिए प्रकाशित किया था, जो गोबर और गंदगी उठाने का कार्य करते थे, ताकि वे अपने इस श्रम को वैज्ञानिक और आर्थिक रूप से उपयोगी बना सकें।
इंदौर के इस खाद निर्माण पत्रक में पुरुषों के लिए 7 आने और महिलाओं के लिए 5 आने दैनिक मजदूरी की दर भी दर्ज थी। गांधीजी द्वारा इंदौर के इस वैज्ञानिक पर्चे को अपनी पत्रिका में जगह देना इस बात का प्रमाण था कि वे इंदौर की धरती से निकले नवाचारों को पूरे देश के गाँवों तक पहुँचाना चाहते थे।
वैचारिकस्वराज, तकनीकी सुधार और श्रम की गरिमा
गांधीजी का इंदौर के साथ यह संवाद केवल कृषि तकनीक तक सीमित नहीं था, बल्कि यह उनके स्वराज और तकनीकी सुधार के व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा था। गांधीजी ऐसे यंत्रीकरण के समर्थक थे, जो आम इंसान और ग्रामीण कारीगरों की मदद करे। इसका एक उदाहरण 'अखिल भारतीय चरखा संघ' (All-India Spinners' Association) द्वारा आयोजित चरखा डिज़ाइन प्रतियोगिताएं थीं।
वर्ष 1919 और 1920 में रेवाशंकर जगजीवन झावेरी द्वारा 5,000 रुपये का पुरस्कार घोषित किया गया था, जिसका उद्देश्य एक ऐसा उन्नत चरखा बनाना था जो सिंगर सिलाई मशीन (Singer Sewing Machine) की तरह आम कताई करने वालों के जीवन को आसान बना सके। बाद में वर्ष 1929 में इस पुरस्कार राशि को बढ़ाकर 1,00,000 रुपये (लगभग 7,700 पाउंड) कर दिया गया था। जिस प्रकार चरखा प्रतियोगिता में देश भर के कारीगरों के ज्ञान को एक प्रामाणिक मंच दिया गया, ठीक उसी प्रकार इंदौर प्रक्रिया के ज़रिए भारतीय किसानों के पारंपरिक ज्ञान को एक अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।
गांधीजी ने इंदौर के इस वैज्ञानिक ज्ञान को अपने आंदोलन का हिस्सा बनाकर यह संदेश दिया कि ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों और किसानों का कार्य किसी भी मायने में कमतर नहीं है। इंदौर के संस्थान ने जिस तरह कचरे और अपशिष्ट पदार्थों को बहुमूल्य कम्पोस्ट खाद में बदलने का मार्ग दिखाया, उसने गांधीजी के ग्राम स्वराज और आत्मनिर्भरता के सपने को एक व्यावहारिक धरातल प्रदान किया।
संदर्भ
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