दुनिया भर में 32 देशों का एक ऐसा सैन्य गठबंधन चर्चा में है, जो शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के ख़िलाफ़ बना था, लेकिन आज अपने ही सबसे बड़े सदस्य देश अमेरिका की नीतियों की वजह से ऐतिहासिक संकट का सामना कर रहा है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध ने जहां एक तरफ़ इस गठबंधन को अपनी सैन्य ताक़त बढ़ाने पर मजबूर किया है, वहीं अमेरिकी नेतृत्व के नए बयानों और रक्षा ख़र्च की चेतावनियों ने नेटो के भविष्य पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नेटो क्या है और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसे क्यों बनाया गया?
नेटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन की स्थापना साल 1949 में अमेरिका, कनाडा और पश्चिमी यूरोप के कई राष्ट्रों द्वारा मिलकर की गई थी। इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य सोवियत संघ के ख़िलाफ़ सामूहिक सुरक्षा प्रदान करना था। यह पहला ऐसा शांतिकालीन सैन्य गठबंधन था जिसमें अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध के बाहर शामिल हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध की भारी तबाही के बाद, यूरोप के देश अपनी चरमराई अर्थव्यवस्थाओं को फिर से बनाने और अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे थे। उस वक़्त युद्ध से तबाह हुए परिदृश्य में उद्योगों को फिर से स्थापित करने और खाद्य उत्पादन को बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता की सख़्त ज़रूरत थी।

इसके साथ ही, एक बार फिर से ताक़तवर होते जर्मनी या सोवियत संघ की घुसपैठ के ख़िलाफ़ यूरोप को सुरक्षा आश्वासनों की भी दरकार थी। अमेरिका का मानना था कि पूरे यूरोप में कम्युनिस्ट विस्तार को रोकने के लिए एक आर्थिक रूप से मज़बूत, हथियारों से लैस और एकजुट यूरोप बेहद ज़रूरी है। इसी रणनीति के तहत तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री जॉर्ज मार्शल ने यूरोप को बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता देने का प्रस्ताव रखा। इसे यूरोपीय रिकवरी प्रोग्राम या 'मार्शल प्लान' कहा गया, जिसने न केवल यूरोपीय आर्थिक एकीकरण को सुगम बनाया बल्कि अमेरिका और यूरोप के बीच साझा हितों को भी मज़बूत किया। जब सोवियत संघ ने इस मार्शल प्लान में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया और अपने पूर्वी यूरोपीय सहयोगी देशों को भी यह आर्थिक सहायता लेने से रोक दिया, तो यूरोप में पूर्व और पश्चिम के बीच की खाई और गहरी हो गई।
साल 1947 और 1948 के दौरान कई ऐसी भू-राजनीतिक घटनाएं हुईं जिन्होंने पश्चिमी यूरोप के देशों को अपनी भौतिक और राजनीतिक सुरक्षा के प्रति चिंतित कर दिया। ग्रीस में चल रहे गृह युद्ध और तुर्की में बढ़ते तनाव के कारण तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन को यह ऐलान करना पड़ा कि अमेरिका दोनों देशों को आर्थिक और सैन्य सहायता प्रदान करेगा। इसी बीच चेकोस्लोवाकिया में सोवियत समर्थित तख्तापलट हुआ और जर्मनी की सीमाओं पर एक कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में आ गई। साल 1948 के मध्य में सोवियत प्रीमियर जोसेफ स्टालिन ने पश्चिमी देशों के संकल्प को परखने के लिए पश्चिम बर्लिन की नाकेबंदी कर दी, जिससे अमेरिका और सोवियत संघ सीधे टकराव के कगार पर आ गए थे। इन घटनाओं ने ट्रूमैन प्रशासन को पश्चिमी यूरोप की सुरक्षा के लिए एक ठोस यूरोपीय-अमेरिकी गठबंधन बनाने पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया।
सामूहिक रक्षा में इसका उद्देश्य क्या है और इसके सदस्य कौन हैं?
बढ़ते तनाव और सुरक्षा चिंताओं के जवाब में पश्चिमी यूरोपीय देश सामूहिक सुरक्षा समाधान पर विचार करने के लिए आगे आए। मार्च 1948 में ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्ज़मबर्ग ने ब्रुसेल्स संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि ने सामूहिक रक्षा का आधार तय किया, जिसके तहत यदि इनमें से किसी एक राष्ट्र पर हमला होता है, तो अन्य देश उसकी रक्षा के लिए बाध्य होंगे। महीनों की लंबी बातचीत और अमेरिकी कांग्रेस में कई बहसों के बाद, आख़िरकार 1949 में नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते में यह सहमति बनी कि किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमले को सभी पर हमला माना जाएगा। इस संधि के मूल 12 सदस्य अमेरिका, कनाडा, बेल्जियम, डेनमार्क, फ्रांस, आइसलैंड, इटली, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल और यूनाइटेड किंगडम थे।
यह सामूहिक रक्षा व्यवस्था औपचारिक रूप से केवल यूरोप या उत्तरी अमेरिका में होने वाले हमलों पर लागू होती थी और इसमें औपनिवेशिक क्षेत्रों के संघर्षों को शामिल नहीं किया गया था। बाद में कोरियाई युद्ध के छिड़ने से नेटो सदस्यों ने तेज़ी से एक केंद्रीकृत मुख्यालय के ज़रिए अपने रक्षा बलों को एकीकृत और समन्वित करना शुरू कर दिया। साल 1952 में ग्रीस और तुर्की को नेटो में शामिल किया गया और 1955 में पश्चिमी जर्मनी भी इसका हिस्सा बन गया। पश्चिमी जर्मनी के प्रवेश के जवाब में सोवियत संघ ने अपना अलग 'वारसॉ ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन' (वारसॉ पैक्ट) बनाया। 1950 के दशक में नेटो का सैन्य सिद्धांत 'बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई' के इर्द-गिर्द घूमता था, जिसका मतलब था कि किसी भी हमले का जवाब अमेरिका बड़े परमाणु हमले से देगा।
शीत युद्ध की ज़रूरतों के लिए बना यह गठबंधन उस संघर्ष के ख़त्म होने के बाद भी न सिर्फ़ क़ायम रहा, बल्कि इसका लगातार विस्तार हुआ है। वर्तमान में नेटो के सदस्यों की संख्या 32 तक पहुंच गई है, जिनमें कई पूर्व सोवियत राज्य भी शामिल हैं। आज यह दुनिया का सबसे बड़ा शांतिकालीन सैन्य गठबंधन है। इसका मुख्यालय ब्रुसेल्स में है और यह आम सहमति पर आधारित गठबंधन है जहां सभी फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। हाल के वर्षों में रूस के बढ़ते ख़तरे को देखते हुए स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों ने भी अपनी पारंपरिक सैन्य गुटनिरपेक्ष नीति को छोड़कर नेटो की सदस्यता हासिल कर ली है। फिनलैंड अप्रैल 2023 में शामिल हुआ, जिससे रूस के साथ नेटो की सीमा दोगुनी हो गई, और तुर्की व हंगरी के राजनीतिक विवादों के सुलझने के बाद मार्च 2024 में स्वीडन भी इसका पूर्ण सदस्य बन गया।

रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक सुरक्षा में नेटो की क्या भूमिका है?
शीत युद्ध के बाद नेटो ने अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना शुरू किया। 1990 के दशक की शुरुआत में यूगोस्लाविया के विघटन और बोस्निया में जातीय संघर्ष के दौरान नेटो ने पहली बार अहम भूमिका निभाई और अप्रैल 1994 में अपने इतिहास के पहले लड़ाकू अभियान में बोस्नियाई सर्ब विमानों को मार गिराया। इसके इतिहास में पहली और इकलौती बार 'आर्टिकल 5' का इस्तेमाल अमेरिका पर हुए 9/11 के आतंकी हमलों के बाद किया गया था। इसके परिणामस्वरूप अफ़ग़ानिस्तान में एक बड़ा मिशन शुरू हुआ, जिसमें 50 गठबंधन और भागीदार देशों के 130,000 से ज़्यादा सैनिकों ने हिस्सा लिया। यह ऐतिहासिक सैन्य अभियान साल 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के साथ समाप्त हुआ।
साल 2022 की शुरुआत में रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए हमले ने यूरोप के पूरे सुरक्षा ढांचे को हिला कर रख दिया। यूक्रेन हालांकि नेटो का सदस्य नहीं है, लेकिन अमेरिका सहित कई नेटो देशों ने उसे अभूतपूर्व मात्रा में सैन्य सहायता प्रदान की है। इसमें टैंक, भारी तोपखाने, सशस्त्र ड्रोन और विमान भेदी प्रणालियां जैसे आधुनिक हथियार शामिल हैं। हालांकि, नेटो नेताओं ने सीधे तौर पर रूस के साथ सीधे संघर्ष में उलझने या 'नो-फ्लाई ज़ोन' लागू करने से बचने की पूरी कोशिश की है। फिर भी, रूस ने कड़ी चेतावनी दी है कि इस सहायता को देकर नेटो सहयोगी परमाणु युद्ध के भड़कने का भारी जोखिम उठा रहे हैं। यूक्रेन लगातार पूर्ण नेटो सदस्यता हासिल करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा होना मुश्किल है।
रूसी आक्रामकता ने नेटो को अपनी पूर्वी सीमाओं पर रक्षा प्रणाली मज़बूत करने के लिए विवश कर दिया है। 2014 के बाद से नेटो ने अपने सैन्य अभ्यास काफ़ी बढ़ा दिए हैं और बुल्गारिया, एस्टोनिया, हंगरी, लातविया, लिथुआनिया, पोलैंड, रोमानिया और स्लोवाकिया में नए कमांड सेंटर खोले हैं। 2017 में नेटो ने बाल्टिक राज्यों और पोलैंड में बहुराष्ट्रीय युद्ध समूहों को तैनात करना शुरू किया और रोमानिया में एक नया बहुराष्ट्रीय बल बनाया। इसके अलावा, गठबंधन ने अपनी पूर्वी सीमाओं पर हवाई गश्त में इज़ाफ़ा किया है। जून 2025 में द हेग, नीदरलैंड्स में होने वाले नेटो शिखर सम्मेलन में यह उम्मीद की जा रही है कि भविष्य के हमलों से बचने के लिए वायु और मिसाइल रक्षा प्रणाली में चार सौ प्रतिशत की वृद्धि को मंज़ूरी दी जाएगी।
क्या अमेरिका नेटो के भविष्य के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन गया है?
जहां एक तरफ़ नेटो रूस से मिल रही सैन्य चुनौतियों का सामना कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ सत्ता में लौटे अमेरिकी प्रशासन के रवैये ने गठबंधन के भीतर एक अभूतपूर्व संकट पैदा कर दिया है। आज यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका ही नेटो के भविष्य के लिए नंबर एक ख़तरा बनकर उभरा है। जनवरी 2025 में कार्यभार संभालने के बाद, डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने यूक्रेन के लिए अपने समर्थन को कमज़ोर कर दिया है, कुछ सैन्य सहायता को अस्थायी रूप से रोक दिया है और मॉस्को के बजाय कीव पर संघर्ष विराम के लिए रियायतें देने का ज़्यादा दबाव बनाया है। फ़रवरी 2025 में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने यूक्रेन के नेटो में शामिल होने की संभावना को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया।
रक्षा ख़र्च को लेकर भी अमेरिका और अन्य नेटो सदस्यों के बीच मतभेद चरम पर हैं। ट्रम्प प्रशासन अब नेटो सदस्यों से अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 5 प्रतिशत रक्षा पर ख़र्च करने की मांग कर रहा है, जिसमें से 3.5 प्रतिशत मुख्य रक्षा ख़र्च और 1.5 प्रतिशत रक्षा-संबंधी व्यय होना चाहिए। मार्च 2025 में उन्होंने यहां तक सुझाव दे दिया कि जो सदस्य देश रक्षा ख़र्च में पर्याप्त योगदान नहीं दे रहे हैं, अमेरिका उनकी रक्षा नहीं करेगा। ट्रम्प प्रशासन के इस बदलते रुख और बार-बार दी जा रही चेतावनियों ने यूरोप के देशों में अपनी सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा कर दी है।
इसके अलावा, ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति की ताज़ा बयानबाज़ी ने पूरे गठबंधन को गहरे असमंजस में डाल दिया है। वेनेज़ुएला में ऑपरेशन के बाद, अमेरिका ने कथित तौर पर ग्रीनलैंड को अपने अगले हस्तक्षेप के स्थान के रूप में चिह्नित किया है। ग्रीनलैंड अमेरिका, कनाडा और आर्कटिक की रक्षा के लिए एक अहम रणनीतिक स्थिति रखता है और अमेरिकी अंतरिक्ष कमान (स्पेस कमांड) का मुख्य केंद्र भी है। लेकिन अगर अमेरिका वास्तव में ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने के लिए सैन्य आक्रमण करता है, तो यह तकनीकी रूप से नेटो संधि के आर्टिकल 5 को ट्रिगर कर देगा, जिसके तहत सभी सदस्य देशों को डेनमार्क की रक्षा के लिए आना होगा।
इस संभावित ख़तरे के जवाब में डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि डेनमार्क ग्रीनलैंड पर किसी भी क़दम का कड़ा विरोध करेगा। डेनिश सेना को 1952 के एक निर्देश की भी याद दिलाई गई है जो उन्हें उच्च कमान के आदेशों का इंतज़ार किए बिना डेनिश क्षेत्र पर किसी भी हमले का तुरंत जवाब देने की शक्ति देता है। आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों के कारण वहां नेटो की मौजूदगी पहले से ही बढ़ रही है। जानकारों का कहना है कि अगर अमेरिका इसी तरह नेटो के उन बहुपक्षीय सिद्धांतों से दूर जाता रहा जिन पर इस गठबंधन की नींव रखी गई थी, तो नेटो को जल्द ही अपनी भविष्य की रणनीति को फिर से परिभाषित करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/h2oqj3a
2. https://tinyurl.com/2zqqdpcm
3. https://tinyurl.com/29fhngv4
4. https://tinyurl.com/29wmjhvh
5. https://tinyurl.com/28fvhs79
6. https://tinyurl.com/22bk59me
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