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जौनपुर की सड़कों और बगीचों में अक्सर एक छोटी सी, साल्मन जैसे गुलाबी-नारंगी रंग की तितली उड़ती दिखाई देती है, जिसे 'स्मॉल साल्मन अरब' कहा जाता है। 'पिएरिडी' (Pieridae) परिवार से ताल्लुक रखने वाली यह तितली अपनी विशेष रंगत और कठोर परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता के लिए जानी जाती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका साल्मन नाम इसके पंखों के गुलाबी आभा वाले रंग के कारण पड़ा है, जबकि 'अरब' शब्द शुरुआती प्रकृतिवादियों द्वारा इसके विशिष्ट वर्गीकरण के लिए इस्तेमाल किया गया था।
यह तितली भारत में कहां पाई जाती है?
स्मॉल साल्मन अरब (वैज्ञानिक नाम: Colotis amata) मुख्य रूप से मध्य एशिया से लेकर भारतीय उपमहाद्वीप तक फैली हुई है। भारत में यह मध्य, दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में प्रचुरता में पाई जाती है। बंगाल तितली डेटाबेस और अन्य शोधों के अनुसार, यह तितली विशेष रूप से तटीय क्षेत्रों, ज्वारीय मिट्टी के मैदानों और शुष्क इलाकों में देखी जाती है। जौनपुर जैसे शहरों में, यह बाग-बगीचों, सड़क किनारे की वनस्पतियों और खाली पड़े शहरी भूखंडों में अपना बसेरा बनाती है। इसकी उड़ान जमीन के काफी करीब, कमजोर लेकिन दिशात्मक होती है।

स्मॉल साल्मन अरब का आवास कैसा होता है?
अन्य तितलियों के विपरीत, जो घने जंगलों पर निर्भर रहती हैं, स्मॉल साल्मन अरब को खुले और शुष्क स्थान पसंद हैं। यह गर्म और शुष्क क्षेत्रों, बबूल (Acacia) के झाड़-झंखाड़, घास के मैदानों और कृषि भूमि में आसानी से देखी जा सकती है। यह समुद्र तल से लेकर लगभग 1200 मीटर की ऊंचाई तक निवास करती है। 'लर्न बटरफ्लाई' पोर्टल के अनुसार, ये तितलियाँ अक्सर धूप सेंकने के लिए झाड़ियों पर अपने पंख फैलाकर बैठती हैं।
कैसे चलती है इसकी जीवन यात्रा?
इस तितली का जीवन चक्र बेहद दिलचस्प और तेज होता है। आंध्र प्रदेश के पूर्वी घाटों में किए गए एक शोध (जुलाई 2025) के अनुसार, यह एक 'मल्टीवोल्टाइन' (Multivoltine) प्रजाति है, जिसका अर्थ है कि यह साल भर प्रजनन करती है। इसका पूरा जीवन चक्र अंडे से वयस्क बनने तक मात्र 24 से 28 दिनों में पूरा हो जाता है।
अंडे: मादा तितली एक बार में 8 से 15 अंडों के समूह को मेजबान पौधे की कोमल पत्तियों या कांटों पर देती है। ये अंडे हल्के पीले रंग के होते हैं, जो 3 से 4 दिनों में फूट जाते हैं।
इल्ली (Larva): अंडे से निकलने के बाद लार्वा पांच चरणों (Instars) से गुजरता है। शुरुआती दिनों में इसका रंग क्रीम जैसा होता है, जो बाद में गहरे घास जैसे हरे रंग में बदल जाता है। यह अवस्था 15 से 17 दिनों तक चलती है।
प्यूपा: पूरी तरह विकसित होने के बाद, लार्वा भोजन बंद कर देता है और प्यूपा में बदल जाता है। यह अवस्था 5 से 9 दिनों की होती है।

कौन से पौधे इसके जीवन का आधार हैं?
स्मॉल साल्मन अरब का जीवन मुख्य रूप से 'साल्वाडोरा' (Salvadora) परिवार के पौधों पर निर्भर है। इनमें 'साल्वाडोरा पर्सिका' (पीलू) और 'साल्वाडोरा ओलियोइड्स' प्रमुख हैं। चूंकि साल्वाडोरा खारी मिट्टी में भी उग सकता है, इसलिए ये तितलियाँ गुजरात जैसे तटीय क्षेत्रों और लवणीय भूमि में बहुत अधिक पाई जाती हैं। जौनपुर में, यह 'माएरुया एपेटाला' (Maerua apetala) जैसे पौधों पर भी आश्रित रहती है, जो इसके लार्वा के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।
शहरी माहौल में यह तितली इतनी सफल क्यों है?
जहाँ अधिकांश तितलियाँ बढ़ते शहरीकरण के कारण विलुप्त हो रही हैं, वहीं स्मॉल साल्मन अरब ने खुद को इंसानी बस्तियों के अनुकूल ढाल लिया है। इसकी इस सफलता के पीछे कई कारण हैं। पहला, इसके मेजबान पौधे (जैसे साल्वाडोरा) खराब या प्रदूषित मिट्टी में भी उग जाते हैं। दूसरा, यह तितली वन-विशेषज्ञ प्रजातियों की तुलना में अधिक तापमान और कम नमी को सहन कर सकती है। इसकी त्वरित प्रजनन क्षमता इसे प्रतिकूल परिस्थितियों से तेजी से उबरने में मदद करती है।
इस नन्ही प्रजाति के सामने क्या चुनौतियां हैं?
अनुकूलन क्षमता के बावजूद, स्मॉल साल्मन अरब खतरों से मुक्त नहीं है। तेजी से होता शहरी विस्तार और सघन कृषि इसके प्राकृतिक आवास को नष्ट कर रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में 'लैंडस्केपिंग' के नाम पर जंगली झाड़ियों और देशी पौधों को हटाना इनके प्रजनन स्थलों को कम कर देता है।
एक बड़ा खतरा कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग है। कीटनाशक न केवल सीधे तौर पर इल्लियों और तितलियों को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि इनके अमृत स्रोतों और मेजबान पौधों को भी जहरीला बना देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जौनपुर जैसे शहरों में इन देशी पौधों का संरक्षण नहीं किया गया, तो भविष्य में यह लचीली प्रजाति भी स्थानीय स्तर पर विलुप्त हो सकती है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/22sbv2va
2. https://tinyurl.com/25s9btr6
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